सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
भूमिका। ९ की इतनी श्रीवृद्धि हुई है,–वही भारत इस समय ज्ञानके लिये युरोपके समीप भि- क्षा प्रार्थी, वही सुविज्ञ भारत इस समय सूत्रसञ्चालित क्रीडापुत्तलीकी नाई निरव- च्छिन्न जडभावापन्न वही भारत इससमय हिताहित बोधशून्य चित्तमें युरोपके अनुकरण करनेम व्यतिव्यस्त है। अमृतलाभकी आशासे आज युरोपीय पण्डितवर्ग बद्धपरिकर होकर भारतके अतुलनीय गौरवका निदानभूत सस्कृतसाहित्य समुद्रमन्थन करते हैं–जान भारतके अतीतज्ञानका अक्षयभण्डार युरोपीय पण्डितोंके अविचलित यत्न, अदम्य उत्साह और दृढतर अध्यवसायमें, जीवनीशक्तिरहित, निमीलितनेत्र और मोहनिद्राशायित भारतवासीके सम्मुखमें उपस्थापित रहा है, भारतवासी निश्चेष्टभावसे उस विस्मयच- क्तित हृदयमे चाहकर देखते हैं। भारतके भूतपूर्व गौरव महिमाके प्रसङ्ग अपने २ देशमें मुक्त कण्ठमे प्रचार पुरःसर, युरोपके मनस्वी पण्डितवर्ग कृतार्थमान्य होते हैं। मृतसञ्जीवनी विद्याप्रभावसे विलुप्तप्राय मस्कृतसाहित्यको पुनर्जीवितकर, भारतके निर्जीव और निष्पन्ददेहमें मृदुमन्द वेगसे ये लोग जीवनीशक्तिके तडितालोक सञ्चालित करते हैं, एव भारतके पूर्वतन अपूर्व कीर्तिकलाप द्वार २ पर डङ्का बजाकर मोहनिद्रामे चिराभिभूत भारतवासीको जगाकर सचेत करते हैं। पुरा तत्त्वा- नुसन्धायी शास्त्रज्ञ युरोपीय पण्डितोंको सौ सौ धन्यवाद, हम लोग उनके प्रदर्शित युक्ति, तर्क, विचार, शक्ति और गवेषणके प्रभावसे, भारतके अनेक अपरिज्ञेयत- त्त्वार्थपय परिज्ञानसे समर्थ होते हैं। सस्कृत साहित्यकी नाई अनन्त रत्नराजिपरिपूर्ण साहित्य ससारम दुर्लभ है। देवभाषा सस्कृतकी नाई मधुरभाषा पृथिवीमें कहीं नहीं है। सस्कृतभाषा और सस्कृतसाहित्य जगत्में सबसे श्रेष्ठ पदपर अधिष्ठित है। सस्कृत साहित्यके अक्षय- भण्डारमे क्या २ अमूल्य रत्नराजि सन्निविष्ट है, सो केवल सस्कृतभाषाम ग्रन्थोंके होनेसे सर्वसाधारणको सम्यक्तया ज्ञात नहीं। आज मैं उन्हीं सस्कृतके अनेक रत्नोंमेंसे “सर्वदर्शनसग्रह” नामक ग्रन्थके भा- षानुवादको कर पाठकोंको अवलोकन कराता हू । इस भारतवर्षम बहुत दिनांसे वैदिकमतके विरुद्ध अनेक बौद्ध, चार्वाक, आर्हत, जैन आदि मत प्रचारित हैं और प्रतिदिन इन मतोंके अतिरिक्त नये २ सम्प्रदाय वा मत बढते जाते हैं, परन्तु उक्त बौद्ध, आदिके ग्रन्थोंको सर्व साधारण लोग नहीं देखते इस कारण प्रत्येक मवान २ मतोंका हाल सब नहीं जानते । सस्कृतमें उक्तप्रतोंके सिद्धान्त वर्णनके लिये श्रीम- ध्वाचार्यजीने “ सर्वदर्शनसग्रह ” नामक ग्रन्थ प्रणयन किया है। जो सस्कृतमं होनेके कारण सर्व साधारणको सुविख्यात नहीं। पर यह ग्रन्थ ऐसा प्रयोजनीय है
( १० ) भूमिका । कि जितने पण्डित और धर्मके सूक्ष्मभेद जिज्ञासु व्यक्ति हैं। प्रायः सबही इसको एक एक प्रति रखते हैं। इसमे क्रमसे १ चार्वाकदर्शन, २ बौद्धदर्शन, ३ आर्हतदर्शन, ४ रामानुजदर्शन, ५ पूर्णप्रज्ञदर्शन वा वेदान्तदर्शन, ६ नकुलीशपाशुपतदर्शन, ७ शै वदर्शन, ८ प्रत्यभिज्ञादर्शन, ९ रसेश्वरदर्शन, १० औलूक्यदर्शन ११ अक्षपाददर्श न १२ जैमिनीदर्शन १३ पाणिनिदर्शन १४ सांख्यदर्शन १५ पातञ्जलदर्शन इन पन्द्रह दर्शन वा मत या सम्प्रदाय या सिद्धान्तोंका पूर्णतया वर्णन है। इस एकही ग्रन्थके पढनेसे उक्त पन्द्रह मतोंके अनेक ग्रन्थोंके सारभागका बोध होता है। दर्शन शास्त्रोंका अनुवाद करना बहुत कठिन है उसपरभी प्राकृतभाषामे तो ओरभी कठिन है पर जहांतक सरल करते बना अनुवाद किया है-सज्जन पाठकगण अनुवादके दोष परित्यागपूर्वक-मूलके आशयको समझकर इस ग्रन्थसे लाभ उठावेंगे तो मेर । परिश्रम सफल होगा। इसमें पहिली बार उदयनारायणसिंहने इसका अनुवाद किया फिर उसमे जो त्रुटि थी उसको बराबर करके दूसरी बार गोविन्दसूरीने अनुवाद किया है। अलमिति बुद्धिमद्वर्येषु ।
स्थान-मधुरापुर, | प्रथमअनुवादक- डाक विष्टपुर, | उदयनारायणसिंह, जिला, मुजफ्फरपुर. | द्वितीयअ.-गोविन्दसूरी.
॥ श्री ॥ सर्वदर्शनसंग्रहस्य विषयानुक्रमणिका । ═════════════════════ संख्या विषया.. पृष्ठाङ्काः १ चार्वाकदर्शनम् .. १ २ बौद्धदर्शनम् .. ११ ३ आर्हतदर्शनम् .. ४७ ४ रामानुजदर्शनम् .. ८४ ५ पूर्णप्रज्ञदर्शनम् .. १२१ ६ नकुलीशपाशुपतदर्शनम् .. १४८ ७ शैवदर्शनम् .. १७४ ८ प्रत्यभिज्ञादर्शनम् .. १६७ ९ रसेश्वरदर्शनम् .. १७८ १० औलूक्यदर्शनम् .. १८६ ११ अक्षपाददर्शनम् .. २०० १२ जैमिनीयदर्शनम् .. २१६ १३ पाणिनिदर्शनम् .. २३७ १४ सांख्यदर्शनम् .. २५६ १५ पातञ्जलदर्शनम् .. २६६ इति विषयानुक्रमणिका समाप्ता ।
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श्री । अथ सर्वदर्शनसंग्रहः । भाषाटीकासमेतः । अथ चार्वाकदर्शनम् । नित्यज्ञानाश्रयं वन्दे निःश्रेयसनिधिं शिवम् । येनैव जातं मह्यादि तेनेवेदं सकर्तृकम् ॥ १ ॥ टीकाकारकृत मङ्गलाचरण । नत्वा श्री मद्ध्यग्रीवं विद्यारण्यविनिर्मितम् ॥ व्याचष्टे प्राकृतगिरा सर्वदर्शनसङ्ग्रहम् ॥ १ ॥ ग्रन्थसमाप्ति तथा ग्रन्थप्रचारके प्रतिबन्धक दुरितकी शान्तिके लिये करत हुए मंगलका शिष्यशिक्षाके लिये उल्लेख करते हैं—"नित्यज्ञानेत्यादि" नित्य जे ज्ञान उसका आश्रय और निश्रेयस जो मोक्ष उसका निधि अर्थात् मोक्षको देने- वाले शिव (महेश्वर) को मैं वन्दना करता हूँ जिनसे पृथिव्यादि जगत् उत्पन्न है। अतएव उन्हीं महेश्वरसे यह जगत् सकर्तृक भी है। यहां पर नित्य ज्ञान पदसे जीवकी व्यावृत्ति की गई आश्रय पदसे ईश्वरको ज्ञानस्वरूपत्वका निषेध किया गया योगरूढि शिवपदसे प्रतिपादनीय देवताविशेषका कल्याण गुणाकरत्व और 'येनैव' इत्यादिस 'यतो वा इमानि भूतानि" इत्यादि श्रुतिप्रतिपादित जगत्कारणत्व और परब्रह्मत्व सूचित किया गया ॥ १ ॥ पारं गतं सकलदर्शनसागराणा- मात्मोचितार्थचरितार्थितसर्वलोकम् । श्रीशार्ङ्गपाणितनयं निखिलागमज्ञं सर्वज्ञविष्णुगुरुमन्वहमाश्रयेऽहम् ॥ २ ॥ देवता नमस्कारके अनन्तर "यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ" इत्यादि श्रुतप्रतिपादित गुरुप्रपत्तिरूप मंगलको करते हैं "पारङ्गतेत्यादि"—समस्त दर्शन रूपी समुद्रके पारङ्गत और आत्मोचित तत्त्वोपदेशसे कृतकृत्य किया संसारको जिन्होंने तम्भूत शार्ङ्गपाणिके पुत्र सर्वज्ञ विष्णुका मैं आश्रयण करता हूँ ॥ २ ॥
(२) सर्वदर्शनसंग्रहः। [चार्वाक- श्रीमत्सायणदुग्धाब्धिकौस्तुभेन महौजसा। क्रियते माधवार्येण सर्वदर्शनसंग्रहः ॥ ३ ॥ श्रीसायणवंशरूपी क्षीरसमुद्रमें कौस्तुभमणिके समान महाप्रतापी माधवाचार्य सर्वदर्शन संग्रह ग्रन्थको करते हैं ॥ ३ ॥ पूर्वेषामतिदुस्तराणि सुतरामालोड्य शास्त्राण्यसौ श्रीमत्सायणमाधवः प्रभुरुपन्यासत्सतं प्रीतये। दूरोत्सारितमत्सरेण मनसा शृण्वन्तु ते तत्सज्जना माल्यं कस्य विचित्रपुष्परचितं प्रीत्यै न सञ्जायते ॥ ४ ॥ सायण वंशोद्भव महामान्य श्रीमाधवाचार्यने पूर्वजोंके अतीव दुर्बोध शास्त्रको सम्यक् प्रकार मथन करके सज्जनोंके प्रमोदार्थ सर्वदर्शन संग्रहका उपन्यास किया सज्जन गण निर्मत्सरचित्तसे उसका श्रवण करें, क्योंकि विचित्र फूलोंसे बनी हुई माला किस के मनको आह्लादकारक न होगी ॥ ४ ॥ अथ कथं परमेश्वरस्य निःश्रेयसप्रदत्वमभिधीयते बृहस्पति- मतानुसारिणा नास्तिकशिरोमणिना चार्वाकेण दूरोत्सारितत्वात्। दुरुच्छेदं हि चार्वाकस्य चेष्टितम्। प्रायेण सर्वप्राणिनस्तावत् "यावज्जीवं सुखं जीवेन्नास्ति मृत्योरगोचरः। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः" इति लोकगाथामनुरुन्धाना नीतिकाsingleमशास्त्रानुसारेणार्थकामावेव पुरुषार्थौ मन्यमानाः पारलौकिकमर्थमपह्नुवानाश्चार्वाकमत- मनुवर्त्तमाना एवानुभूयन्ते अत एव तस्य चार्वाकमतस्य लोका- यतमित्यन्वर्थमपरं नामधेयम् ॥५॥ विषयोन्मुख चित्तोंको देहात्माभिमानादिक स्वाभाविक होनेसे तत्प्रतिपादक सब मतका निषेध्य होनेके कारण प्रथम चार्वाकमतोपन्यास करते हैं--"अथेत्यादि परमेश्वरको मोक्षप्रद कैसे कहते हो? क्योंकि सुरगुरुमतानुयायी नास्तिक शिरोमणि चार्वाकने इसको अत्यन्त दूषित किया है। चार्वाकमतका निराकरण भी अशक्य है। क्योंकि प्रायः सभी लोग "मृत्युसे कोई भी बच नहीं सकते अतः जब तक जीवे तब तक सुखपूर्वक जीवे। जलाकर भस्म किये हुये देहकी पुनः उत्पत्ति कहांसे होगी" इस लोकोक्त्यनुसार नीति शास्त्र तथा कामशास्त्रमे प्रतिपादित काम और अर्थको
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( ३ ) रूपार्थ मानकर स्वर्गादि पारलौकिक सुखको निराकरण करनेवाले चार्वाकमतावलम्बी ही देख पड़ते हैं अत एव चार्वाकका लोकायत यह दूसरा नाम है । लोकप्रसिद्धसे [अ]तिरिक्त पदार्थ न माननेसे लोकायत कहाता है ॥ ५ ॥ तत्र पृथिव्यादीनि भूतानि चत्वारि तत्त्वानि तेभ्य एव देहाका- रपरिणतेभ्यः किण्वादिभ्यो मदशक्तिवत् चैतन्यमुपजायते तेषु विनष्टेषु सत्सु स्वयं विनश्यति । तदिह विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति स न प्रेत्य संज्ञास्ती ति तत् चैतन्यविशिष्टदेह एवात्मा देहातिरिक्त आत्मनि प्रमाणा- भावात् प्रत्यक्षैकप्रमाणवादितया अनुमानादेरनङ्गीकारेण प्रामा- ण्याभावात् ॥ ६ ॥ रा : उनके मतमें पृथिवी, जल, तेज, वायु, चार ही तत्त्व हैं । देहरूपसे परिणत इन्ही चारोंसे चैतन्य उत्पन्न होता है । जैसे मादक द्रव्योंसे मदशक्ति उत्पन्न होती है प्रत्येक में अविद्यमान भी मदशक्ति समुदायसे उत्पन्न होती है । इन तत्त्वोंका नाश होनेपर वह आत्मा स्वयं नष्ट होता है । “विज्ञानस्वरूप आत्मा इन तत्त्वोंसे उत्पन्न होकर उसीमें नष्ट होता है मरनेपर परलोकमें कोई नाम नही रहतो । चैतन्यविशिष्ट देहसे अतिरिक्त आत्मामें कोई प्रमाण नहीं । केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । अनुमानादिके प्रामाण्यमें कोई युक्ति नहीं ॥ ६ ॥ ( अङ्गनालिङ्गनादिजन्यं सुखमेव पुरुषार्थः । न चास्य दुःखसं- भिन्नतया पुरुषार्थत्वमेव नास्तीति मन्तव्यम् । अवर्जनीयतया प्राप्तस्य दुःखस्य परिहारेण सुखमात्रस्यैव भोक्तव्यत्वात् । तद्यथा मत्स्यार्थी सशल्कान् सकण्टकान् मत्स्यानुपादत्ते स यावदादेयं तावदादाय निवर्त्तते । यथा वा धान्यार्थी सपलालानि धान्या- न्याहरति स यावदादेयं तावदादाय निवर्त्तते । तस्माद्दुःखभ- यान्नानुकूलवेदनीयं सुख त्यक्तुमुचितम् । नहि मृगाः सन्तीति शालयो नोप्यन्ते, नहि भिक्षुकाः सन्तीति स्थाल्यो नाधिश्री- यन्ते यदि कश्चिद् भीरुदृष्ट सुखं त्यजेत् तर्हि स पशुवन्मूर्खो भवेत् ॥ ७ ॥ )
(२) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ चार्वाक- श्रीमत्सायणदुग्धाब्धिकौस्तुभेन महौजसा । क्रियते माधवार्येण सर्वदर्शनसंग्रहः ॥ ३ ॥ श्रीसायणवंशरूपी क्षीरसमुद्रमें कौस्तुभमणिके समान महाप्रतापी माधवाचार्य सर्वदर्शन संग्रह ग्रन्थको करते हैं ॥ ३ ॥ पूर्वेषामतिदुस्तराणि सुतरामालोड्य शास्त्राण्यसौ श्रीमत्सायणमाधवः प्रभुरुपन्यास्थत्सतां प्रीतये । दूरोत्सारितमत्सरेण मनसा शृण्वन्तु ते तत्सज्जना माल्यं कस्य विचित्रपुष्परचितं प्रीत्यै न सञ्जायते ॥ ४ ॥ सायण वंशोद्भव महामान्य श्रीमाधवाचार्यने पूर्वजोके अतीव दुर्बोध शास्त्रको सम्यक् प्रकार मथन करके सज्जनोंके प्रमोदार्थ सर्वदर्शन संग्रहका उपन्यास किया सज्ज- नगण निर्मत्सरचित्तसे उसका श्रवण करे, क्योंकि विचित्र फूलोंसे बनी हुई माला किस के मनको आह्लादकारक न होगी ॥ ४ ॥ अथ कथं परमेश्वरस्य निःश्रेयसप्रदत्वमभिधीयते बृहस्पति- मतानुसारिणा नास्तिकशिरोमणिना चार्वाकेण दूरोत्सारितत्वात् । दुरुच्छेदं हि चार्वाकस्य चेष्टितम् । प्रायेण सर्वप्राणिनस्तावत् “यावज्जीवं सुखं जीवेन्नास्ति मृत्योरगोचरः । भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः” इति लोकगाथामनुरुन्धाना नीतिकामशास्त्रानुसारेणार्थकामावेव पुरुषार्थौ मन्यमानाः पारलौकिकमर्थमपह्नुवानाश्चार्वाकमत- मनुवर्त्तमाना एवानुभूयन्ते अत एव तस्य चार्वाकमतस्य लोका- यतमित्यन्वर्थमपरं नामधेयम् ॥ ५ ॥ विषयोन्मुख चित्तोंको देहात्माभिमानादिक स्वाभाविक होनेसे तत्प्रतिपादक सब मतका निषेध होनेके कारण प्रथम चार्वाकमतोपन्यास करते हैं--“अथेत्या- परमेश्वरको मोक्षप्रद कैसे कहते हो ? क्योंकि सुरगुरुमतानुयायी नास्तिक शिरोमणि चार्वाकने इसको अत्यन्त दूषित किया है । चार्वाकमतका निराकरण भी अशक्य है । क्योंकि प्रायः सभी लोग “मृत्युसे कोई भी बच नहीं सकते अतः जब तक जीवे तन तक सुखपूर्वक जीवे । जलाकर भस्म किये हुये देहकी पुन. उत्पत्ति कहासे होगी ” इस लोकोक्त्यनुसार नीति शास्त्र तथा कामशास्त्रमें प्रतिपादित काम और अर्थको
र्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ३ ) पार्थ मानकर स्वर्गादि पारलौकिक सुखको निराकरण करनेवाले चार्वाकमतावलम्बी देख पडते हैं अत एव चार्वाकका लोकायत यह दूसरा नाम है । लोकप्रसिद्धसे तिरिक्त पदार्थ न माननेसे लोकायत कहाता है ॥ ५ ॥ तत्र पृथिव्यादीनि भूतानि चत्वारि तत्त्वानि तेभ्य एव देहाका रपरिणतेभ्यः किण्वादिभ्यो मदशक्तिवत् चैतन्यमुपजायते तेषु विनष्टेषु सत्सु स्वयं विनश्यति। तदिह विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति स न प्रेत्य सञ्ज्ञास्ती ति तत् चैतन्यविशिष्टदेह एवात्मा देहातिरिक्त आत्मनि प्रमाणा- भावात् प्रत्यक्षैकप्रमाणवादितया अनुमानादेरनङ्गीकारेण प्रामा- ण्याभावात् ॥ ६ ॥ उनके मतमें पृथिवी, जल, तेज, वायु, चार ही तत्त्व हैं । देहरूपसे परिणत इन्हीं रोंसे चैतन्य उत्पन्न होता है । जैसे मादक द्रव्योंसे मदशक्ति उत्पन्न होती है प्रत्येक में अविद्यमान भी मदशक्ति समुदायसे उत्पन्न होती है । इन तत्त्वोंका नाश होनेपर व आत्मा स्वयं नष्ट होता है । “विज्ञानस्वरूप आत्मा इन तत्त्वोंसे उत्पन्न होकर सर्मे नष्ट होता है मरनेपर परलोकमें कोई नाम नहीं रहता । चैतन्यविशिष्ट देहसे अतिरिक्त आत्मामें कोई प्रमाण नहीं । केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । अनुमानादिके प्रामाण्यमें कोई युक्ति नहीं ॥ ६ ॥ अङ्गनालिङ्गनादिजन्य सुखमेव पुरुषार्थः । न चास्य दुःखसं- भिन्नतया पुरुषार्थत्वमेव नास्तीति मन्तव्यम् । अवर्जनीयतया प्राप्तस्य दुःखस्य परिहारेण सुखमात्रस्यैव भोक्तव्यत्वात् । तद्यथा मत्स्यार्थी सशल्कान् सकण्टकान् मत्स्यानुपादत्ते स यावदादेयं तावदादाय निवर्त्तते । यथा वा धान्यार्थी सपलालानि धान्या- न्याहरति स यावदादेयं तावदादाय निवर्त्तते । तस्माद्दुःखभ- यान्नानुकूलवेदनीयं सुखं त्यक्तुमुचितम् । नहि मृगाः सन्तीति शालयो नोप्यन्ते, नहि भिक्षुकाः सन्तीति स्थाल्यो नाधिश्री- यन्ते यदि कश्चिद् भीरुदृष्ट सुखं त्यजेत् तर्हि स ५ भवेत् ॥ ७ ॥
[ चार्वाक- सर्वदर्शनसंग्रहः। (४) अङ्गनालिङ्गनादि जन्य सुख ही पुरुषार्थ है । यदि कहो तादृश सुख दुःखाभि- श्रित होनेसे पुरुषार्थ नही हो सकता यह भी नही, क्योंकि नान्तरीकतया अनिवार्य- रूपसे प्राप्त दुःखको परित्याग कर सुखमात्रका ग्रहण होता है । जिस प्रकार मत्स्यार्थी काँटा और छिलका सहित मत्स्योको पकडते हैं परन्तु जितना अंश उपयुक्त हो उतना लेकर बाकीको छोड देते हैं अथवा जैसे धान्यार्थी सपलाल धान्यको लाकर अपेक्षित अन्नमात्रको ग्रहण कर बाकी पलालको छोड देते हैं । अत दुःखके डरसे सुखको छोड देना उचित नही मृगके डरसे धान ही न बोये जाँय, भिक्षुकोंके भयसे पाक भी न किया जाय ऐसा नही होता । यदि कोई उत्पौक हुए सुखको त्याग दे तो उसको पशुके समान मूर्ख समझना चाहिए ॥ ७ ॥ तदुक्तम्-“त्याज्यं सुखं विषयसङ्गमजन्म पुंसां दुःखोपसृष्टमिति मूर्खविचारणेषा । व्रीहीन् जिहासति सितोत्तमतण्डुलाढ्यान् को नाम भोस्तुषकणोपहितान् हितार्थी” ॥ ८ तस्येति- कहा भी है-विषयभोगसे जायमान सुख दुःखमिश्रित होनेसे त्याज्य हेतद् का विचार है कौन विचारशील तुषकणोसे आच्छादित होनेके कारण उत्तम तण्डुलोंसे युक्त धान्यको छोड देगा ॥ ८ ॥ ननु पारलौकिकसुखाभावे बहुवित्तव्ययशरीरायाससाध्ये अग्नि- होत्रादौ विद्यावृद्धाः कथं प्रवर्त्तिष्यन्ते इति चेत् । तदपि न प्रमा- णकोटिं प्रवेष्टुमीष्टे अनृतव्याघातपुनरुक्तदोषैर्दूषिततया वैदिकम्म- न्यैरेव धूर्तवकै परस्परं कर्म्मकाण्डप्रामाण्यवादिभिर्ज्ञानकाण्डस्य ज्ञानकाण्डप्रामाण्यवादिभिः कर्म्मकाण्डस्य च प्रतिक्षिप्तत्वेन त्रय्या धूर्त्तप्रलापमात्रत्वेन अग्निहोत्रादेर्जीविकामात्रप्रयोजनत्वात् तथा चाभाणक -“अग्निहोत्रं त्रयो वेदास्त्रिदण्डं भस्मगुण्ठनम् । बुद्धिपौरुषहीनानां जीविकेति बृहस्पतिः” ॥ ९ ॥ यदि पारलौकिक स्वर्गादि सुख नही हो तो बहुत धन व्यय एवं शरीरश्रमसा अग्निहोत्रादि कर्मोमे बडे २ विद्वान् लोग क्यो प्रवृत्त होते हैं यह भी प्रमाण वीमें प्रवेश नहीं कर सकता क्योंकि वैदिकाभिमानी धूताने ही परस्पर अन घात, पुनरुक्त, दोषोंमे दूषित किया है जैसे ज्ञानकाण्डप्रामाण्यवादियोंने कर्मक और कर्मकाण्डमाम्...पादियाने ज्ञानकाण्डको दूषित किया है । नृगूपत्रु
दर्शनम् ] . भाषाटीकासमेतः । ( ५ ) त्मक वेदत्रय धूर्तोके कल्पित हैं । अग्निहोत्रादिक भी जीविकाके लिये है ॥ अग्निहोत्र, वेदत्रय, सन्यास और भस्मलेपन यह सब बुद्धि और पराक्रमसे हीनोंकी जीविकामात्र है। यह बृहस्पति का कहना है ॥ ९ ॥ अत एव कण्टकादिजन्यं दुःखमेव नरकं लोकसिद्धो राजा परमेश्वर देहोच्छेदो मोक्षः। देहात्मवादे च 'कृशोऽहं कृष्णोऽहम्' इत्यादि सामानाधिकरण्योपपत्तिः । 'मम शरीरम्' इति व्यव- हारो 'राहोः शिरः' इत्यादिवदौपचारिकः॥ १० ॥ संक्षेपतः इस मतका सिद्धांत यह है कि कण्टकादिजन्य दुःख ही नरक है, लोकप्रसिद्ध राजा ही ईश्वर है, देहोच्छेद अर्थात् मरण ही मुक्ति है, देहात्मवादमे ही मैं कृश हूं स्थूल हूं श्याम हूं इत्यादि सामानाधिकरण्य उपपन्न होता है ॥ सामानाधि- करण्य उसको कहते हैं कि जो विभिन्न धर्म्मविशिष्ट एकधर्मीका वाचक हो देहात्मवादमें मेरा देह इत्यादि व्यवहार भी राहुका शिर, शिलापुत्रकका शरीर इत्यादिवत् औप- चारिक हो सकता है ॥ १० ॥ तदेतत् सर्वं समग्राहि- “अत्र चत्वारि भूतानि भूमिवार्यनलानिलाः चतुर्भ्यः खलुभूतेभ्यश्चैतन्यमुपजायते ॥ किण्वादिभ्यः समेतेभ्यो द्रव्येभ्यो मदशक्तिवत् । अहं स्थूल कृशोऽस्मीति सामानाधिकरण्यतः ॥ देहः स्थौल्यादियोगाच्चस एवात्मा न चापरः । मम देहोऽयमित्युक्तिः सम्भवेदौपचारिकी” इति ॥ ११॥ उक्त बातोंको चार्वाकोंने संग्रह करके कहा है- पृथिव्यादि चार ही तत्त्व हैं और ही तत्त्वोंमें मादक द्रव्यसमुदायसे मदशक्तिवत् चैतन्य उत्पन्न होता है । मैं ल हूं, कृश हूं इत्यादि देहाभेद व्यवहारसे देह ही आत्मा है। मेरा देह इत्यादि व्य- ार भी उपचारसे होता है ॥ ११ ॥ स्यादेतत्-स्यादेष मनोरथो यद्यनुमानादेः प्रामाण्यं न स्यात् अस्ति च प्रामाण्यं कथमन्यथा धूमोपलम्भादनन्तरं धूमध्वजे प्रेक्षावतां प्रवृत्तिरुपपद्येत । नद्यास्तीरे फलानि सन्तीति वचन- श्रवणसमनन्तर फलार्थिनां नदीतीरे प्रवृत्तिरिति । तदेतन्मनो-
१. चार्वाक दर्शन (लोकायतिक मत)
(६) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ चार्वाक-
पगतमनुमानप्रामाण्यवादिभिः व्याप्तिश्चोभयनिधोपाधिविधुरः सम्बंधः । स च स्वसत्तया चक्षुरादिवन्नांगभाव भजते किन्तु ज्ञा- ततया । कः खलु ज्ञानोपायो भवेत् । न तावत् प्रत्यक्षम् तच्च बाह्यमान्तर वाभिमतम्। न प्रथमः । तस्य सम्प्रयुक्तविषयज्ञानज- नकत्वेन विद्यमाने प्रसगसम्भवेपि भूतभविष्यतोस्तदसम्भ- वेन सर्वोपसंहारवत्याप्तेर्दुर्ज्ञानत्वात् । न च व्याप्तिज्ञान सा- मान्यगोचरमिति मन्तव्य, व्यक्त्योरविनाभावाभावप्रसगात्॥१२॥ “स्यादेतत् इति” यह मनोरथ तन सिद्ध हो जन अनुमानादिका प्रामाण्य ही न हो किंतु अनुमानका प्रामाण्य अवश्य मानना होगा, अन्यथा धूम देखकर धूमध्वज अग्निके विषयमे बुद्धिमानोकी प्रवृत्ति कैसे हो सकती है । एव शब्द प्रमाणन माननेमे नदीके किनारे पाँच फल हैं इस वाक्यको सुनकर फलार्थियों की फलाहरणप्रवृत्ति भी कैसे होगी । यह भी मनोराज्यमान है । क्योकि व्याप्तिप्रकारक पक्षधर्मताशाली लिङ्गज्ञानको अनुमितिके प्रति कारण अनुमान प्रामाण्यवादियोने माना है यथा जहार अग्नि है वहार धूम है यह व्याप्ति हे वह्रिव्याप्य धूम, यह व्याप्तिप्रकारक ज्ञान है । वह्नि व्याप्य धूमवान् पर्वत यह व्याप्तिप्रकारक पक्षधर्मताज्ञान है इसीको परामर्श भी कहते हैं ॥ अनन्तर “पर्वतो वह्निमान् धूमात्” ऐसी अनुमिति होती है। शङ्केत निश्चित भेदसे द्विविध उपाधिरहित सम्बन्ध व्याप्ति है । वह सम्बन्ध चक्षुगादिके समान स्वसत्तामात्रसे। कार्यसाधक नही होता किन्तु ज्ञात होनेमे हाता है । व्याप्तिज्ञानका उपाय प्रत्यक्ष हो ही नही सकता क्या कि बाह्य और आन्तर (मानस) भेदस प्रत्यक्ष दो प्रकारका चक्षुरादि बहिरिन्द्रियज य प्रत्यक्ष बाह्य है वह विषयन्द्रिय सयोगसे होता है । विद्य मान (धूम वह्न्यादे) विषय क साथ इन्द्रियसम्बन्ध होनेपर भी भूत भविष्यत् के साथ सम्बन्धका असम्भव होनेसे निखिल वह्नि धूमका अव्यभिचरित व्याप्तिग्रह दुर्ज्ञेय होगा ॥ यदि कहो निखिल धूम वह्निका प्रत्यक्ष न होनेपर भी धूमादिवृत्ति धूमत्वादि एक सामान्यद्वारा सम्बन्ध (व्याप्ति) ज्ञानका सम्भव होगा यह भी नहीं क्योंकि सामान्यत्व धूमत्व वह्नित्वका व्याप्तिग्रह अर्थात् धूमत्ववह्नित्व- का अविनाभाव (व्याप्ति) गृहीत होनेपर भी व्यक्ति (धूम अग्नि) की व्याप्तिग्रहका अभाव प्रसङ्ग होगा ॥ १२ ॥ नापि चरमः । अन्तःकरणस्य बहिरिन्द्रियतन्त्रत्वेन बा- ऽर्थे स्वातन्त्र्येण प्रवृत्त्यनुपपत्तेः ॥ तदुक्तम्- 'चक्षुर युक्तविषय परतन्त्र वहिर्मन इति ॥ १३ ॥ १ 'पर्वत अग्निवाला है कार्ने धूम होनेसे'
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । (७) मानस प्रत्यक्ष भी नहीं कह सकते अन्तःकरण स्वतन्त्ररूपसे बाह्यार्थका ज्ञान नहीं कर सकता किन्तु चक्षुरादि परतन्त्र ही करता है यथा मनको चक्षुरादिका संयोग और चक्षुरादिको विषयका संयोग होनेपर प्रत्यक्ष होता है ऐसा नियम है “चक्षुरादिके विषयको ग्रहण करनेमें मन चक्षुरादि परतन्त्र ही प्रवृत्त होते हैं।” ऐसा कहा भी है ॥१३॥ ( नाप्यनुमानं व्याप्तिज्ञानोपायः, तत्र तत्राप्येवमिति अनव- स्थादौस्थ्यप्रसङ्गात् । नापि शब्दस्तदुपायः, काणादमतानुसारे- णानुमान एवान्तर्भावात् अनन्तर्भावे वा वृद्धव्यवहाररूपलिङ्गाव- गतिः सापेक्षतया प्रागुक्तदूषणलङ्घनाज्झालत्वात् ॥ १४॥ अनुमान भी व्याप्तिज्ञानका उपाय नहीं हो सकता एक व्याप्तिज्ञानके लिये अनु- मान करे तो उसमें भी व्याप्तिज्ञानकी अपेक्षा, उसके लिये अनुमानान्तर, उसके लिये पुनः व्याप्तिज्ञानापेक्षा, एवं क्रमसे अनवस्था होगी । शब्द भी व्याप्तिज्ञानका उपाय नहीं क्योंकि वैशेषिकके मतमें शब्द भी अनुमानमें अन्तर्भूत है अत एव- "शब्दोपमानयोर्नैव पृथक् प्रामाण्यमर्हति । अनुमाने गतार्थत्वादिति वैशेषिक मतम् ॥” इत्यादि वैशेषिकोंने कहा भी है। शब्दको अनुमानमे अन्तर्भाव न माननेपर भी वृद्ध व्यवहाररूप लिङ्गसापेक्ष होनेसे पूर्वोक्त अनवस्था तदवस्थ होगी। यथा एक वृद्ध 'गौ को लावो' ऐसा किसी भृत्यसे कहते हैं उसको सुनकर भृत्य गौको लाता है उसको देखकर समीपस्थ बालकको शक्तिग्रह होता है यह शब्दकी शक्तिग्रहका क्रम है ॥ १४ ॥ धूमधूमध्वजयोरविनाभावोऽस्तीति वचनमात्रे मन्वादिवद् विश्वासाभावाच्च ।' अनुपदिष्टविनाभावस्य पुरुषस्यार्थान्तरदर्श- नेनार्थान्तरानुमित्यभावे स्वार्थानुमानकथायाः कथाशेषत्व- प्रसङ्गाच्च ॥ १५ ॥ केवल अग्निके विना धूम नहीं रहता यह वचन मनुवचनके समान विश्वासास्पद भी नहीं होगा । धूम अग्निके अविनाभूत अर्थात् अग्निकी सत्ताके विना धूमकी सत्ता नहीं रहती है इसी प्रकार जिस पुरुषको उपदेश नहीं हुआ हो उस पुरुषको धूमको देख- कर अग्नि आदि अर्थान्तरका अनुमान भी असम्भव है एव स्वार्थानुमानका अञ्जलि प्रदान हो जायगा । तात्पर्य-अनुमान स्वार्थपरार्थ भेदसे दो प्रकार है। स्वय यदि धूमकी व्याप्ति ग्रहणकर पश्चात् धूम देखकर व्याप्ति स्मरणपूर्वक पर्वतमें वह्निका अनुमान करतो
(८) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः। [ चार्वाक- है वह स्वार्थानुमान है जिसने स्वयं व्याप्तिग्रहण किया हो उसको बोध करानेके लिय पञ्चावयव वाक्यका प्रयोग करता हो वह परार्थानुमान है प्रकृतेमे स्वयं व्याप्ति-ग्रह न करनेसे स्वार्थानुमान परकीय वाक्यम विश्वास न होनेसे परार्थानुमान दोनों दूरत. परास्त हो गये ॥ १५ ॥ उपमानादिकं तु दूरापास्तं तेषां संज्ञासंज्ञिसम्बन्धादिबोधक- त्वेनानौपाधिकत्वसम्बन्धबोधकत्वासम्भवात् ॥ १६ ॥ उपमान भी व्याप्तिग्रहका उपाय नहीं हो सकता क्योंकि संज्ञा संज्ञि भाव सम्बन्ध को उपमान कहते हैं यथा गौके सदृश गवय है इस वाक्यको सुनकर वनम तादृश जन्तुको देखनेसे यह गवय है ऐसा उपमान होता है गवयपद संज्ञा तादृश वस्तु संज्ञी दोनोंकी शक्ति सम्बन्ध है-परन्तु यह भी निरुपाधिक सम्बन्ध बाधनमें असमर्थ है॥१६॥ किञ्च उपाध्यभावोऽपि दुरवगम उपाधीनां प्रत्यक्षत्वनियमा- सम्भवेन प्रत्यक्षाणामभावस्य प्रत्यक्षत्वेऽपि अप्रत्यक्षाणामभाव स्याप्रत्यक्षतया अनुमानाद्यपेक्षायामुक्तदूषणानिवृत्तेः ॥१७॥ उपाधिका अभाव भी दुर्ज्ञेय है-क्योंकि पूर्वोक्त प्रकार समस्त उपाधिका प्रत्यक्ष सम्भव न होनेसे, अभाव प्रत्यक्षके प्रतियोगि प्रत्यक्ष कारण है, विद्यमान उपाधिके अभावका प्रत्यक्ष होनेपर भी अतीत अनागत और वर्तमान भी अप्रत्यक्ष उपाधिके अभावका प्रत्यक्ष सम्भव नहीं है अतः तादृश अभावप्रत्यक्षके लिये अनुमानकी अपेक्षा करें तो उसमें भी व्याप्ति ज्ञानकी अपेक्षा होगी उसके लिए उपाध्यभाव ज्ञानकी अपेक्षा एवं क्रमसे अनवस्था तदवस्थ होगी ॥ १७ ॥ अपि च=साधनाव्यापकत्वे सति साध्यसमव्याप्तिरिति तल्लक्षण मङ्गीकर्त्तव्यम् । तदुक्तम्- "अव्याप्तसाधनो यः साध्यसमव्याप्ति- रुच्यते स उपाधिः" इति ॥ शब्देऽनित्यत्वे साध्ये सकर्तृकत्व घटत्वमश्रावणताञ्च व्यावर्तयितुमुपात्तान्यत्र क्रमतो विशेषणानि त्रीणि ॥ १८ ॥ उपाधि लक्षणमे भी व्याप्तिज्ञानापेक्षा कहते हैं "अपिचेति" साधनाव्यापकत्वेति इसमें तीन पद हैं साधनाव्यापकत्व १-साध्य २-सम ३-तीनोंका प्रयोजन- "शब्दो ऽनित्यः कृतकत्वात्"-यह सद्धेतु है । यदि साधनाव्यापकत्व नहीं कहता तो सकर्तृकत्व हो जायगा साधनाव्यापकत्व कहा तो सकर्तृकत्व-कार्यत्वका अव्यापक न हुआ। जहां कार्यत्व है वहां सर्वत्र सकर्तृकत्व है अतः उसमें अतिव्याप्ति वारणके लिए,,
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ९ ) साधनाव्यापकत्वरूप विशेषण चरितार्थ हुआ । साध्यव्यापकत्व नहीं कहते तो घट त्वमें अतिव्याप्ति होगी-क्या कि घटत्व घटमात्रहीमे रहेगा कार्यत्व अनित्य वस्तुमात्र में रहेगा अतः साधनाव्यापकत्व होगया साध्यव्यापक करते हैं तो घटत्व अनित्यत्वका व्यापक नहीं हुआ सम नहीं कहते तो अश्रावणत्वमें अतिव्याप्ति होगी साधनका अव्या पक और साध्यका व्यापक भी अश्रावणत्व है साध्य सम कहते हैं तो साध्य समनियत व्याप्ति नहीं हुई क्योकि अश्रावणत्व अनित्यत्वरूप साध्य अन्यत्र नित्य आकाशादिम भी रहता है । “ वह्निमान् धूमात् ” इत्यादिम आर्द्वेन्धनसंयोगरूप उपाधिम साधना- व्यापकत्व साध्यसमव्यापकत्व होनेसे लक्षणसमन्वय हुआ ॥ १८ ॥ तस्मादिदमनवद्य समासमेत्यादिनोक्तमाचार्यैश्चेति ॥ १९ ॥ उक्तार्थम आचार्यसम्मति कहते हैं कि समासमेति - “समासमाविनाभाववेकत्र स्तो यदा तदा । समेन यदि नो व्याप्तस्तयोहीनोऽप्रयोजकः” इति ॥ व्याप्ति दो प्रकारकी है एक समव्याप्ति और दूसरी असमव्याप्ति यथा गन्धवत्त्व पृथिवीत्व दोनोंकी परस्पर व्याप्ति सम व्याप्ति है । दोनामे से एक की व्याप्ति हो दूसरेकी नहीं हो वह असमव्याप्ति है यथा वह्निधूमकी व्याप्ति धूमकी वह्निके साथ व्याप्ति है किन्तु वह्निकी धूमके साथ व्याप्ति नहीं क्यो कि तप्त लोहपिण्डमें अग्नि है धूम नहीं । अविनाभावका अर्थ व्याप्ति है सम व्याप्ति और असमव्याप्ति दोनों एकस्थल में हो तो सम और असम अर्थात् धूम और अग्निके मध्यमे ही न अर्थात् असम अग्नि समधूमके साथ यदि व्याप्त न हो अर्थात् अग्नि धूमसे व्याप्त न हो तो हीन अग्नि अप्रयोजक अर्थात् धूमरूप साध्यका हेतु नहीं होसकती ॥ १९ ॥ तत्र विध्यध्यवसायपूर्वकत्वान्निषेधाध्यवसायस्योपाधिज्ञाने जाते तदभावविशिष्टसम्बन्धरूप व्याप्तिज्ञानं व्याप्तिज्ञानाधीन चोपा- धिज्ञानमिति परस्पराश्रयवज्रप्रहारदोषो वज्रलेपायते। तस्मादवि- नाभावस्य दुर्बोधतया नानुमानाद्यवकाशः। धूमादिज्ञानानन्त- रमग्न्यादिज्ञाने प्रवृत्तिः प्रत्यक्षमूलतया भ्रान्त्या वा युज्यते ॥२०॥ उक्त अन्योन्याश्रयको उपपादन करते हैं तत्रेत्यादिसे- ऐसा नियम है कि अभावज्ञानम प्रतियोगीज्ञान कारण होता है एव निषेधज्ञानम मे विधिज्ञान कारण होनेसे उपाधिज्ञान होनेपर उपाधिभाव सहित व्याप्ति ज्ञान होगा व्याप्ति ज्ञानानन्तर उपाधिज्ञान इति अन्योन्याश्रय दोष भी अपरिहरणीय है । अन्यो- न्याश्रयका लक्षण “स्वज्ञानाधीनज्ञानवत्त्व” है स्वपदसे उपाधिके अभावका ग्रहण है उसके
( १० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ बौद्ध ानके अधीन व्याप्तिज्ञान है। अतः अविनाभाव दुर्ज्ञेय होनेसे अनुमानादिका अवकाश नहीं। यदि कहो अनुमानका प्रामाण्य ही नहीं तो धूमादि (हेतु) ज्ञानसे अग्न्यादि साध्य) ज्ञानमे प्रवृत्ति कैसे होती है-कहीं २ प्रत्यक्षद्वारा कही ० भ्रान्तिसे होती से कहेगे ॥ २० ॥ क्वचित् फलप्रतिलम्भस्तु मणिमन्त्रौषधादिवत् याहच्छिकः अत- स्तत्तु साध्यमदृष्टादिकं मपि नास्ति । नन्वदृष्टानिष्टौ जगद्वै- चित्र्यमाकस्मिकं स्यादिति चेत् न तद्भद्रम् "अग्निरुष्णो जलं शीतं शीतस्पर्शस्तथानिलः । केनेदं चित्रितं तस्मात् स्वभावात्तद्व्यवस्थितिरिति" ॥ २१ ॥ भ्रान्तिज्ञानसे प्रवृत्त पुरुषको शुक्ति रजत आदिमे फलकी सिद्धि नहीं होती, प्रकृते अग्न्यादिरूप फल प्राप्त होता है। सो क्यों ? वह यहच्छासे (अकस्मात) ही होता यथा मणि मन्त्र औपधादिसे फल होता है-यदि मणि मन्त्र औष्यादिसे निश्चित फ मिलता हो तो एक ही रोगके लिए अनेक औषधियोंको बदल बदल कर क्यों दे[ते] इससे मालूम होता है-रोगनिवृत्त्यादि फल अकस्मात् ही होता है। अतः मन्त्रा[प्रत्य-] अदृष्टादिक भी नहीं, यदि कहो अदृष्ट न मानो तो ससारकी विचित्रता (कोई सुखी कोई दु इत्यादि) न होगी-यह भी नहीं क्योकि यह सब स्वभावसे होते हैं। अग्निको उष्ण, जल शीत, वायुको शीतस्पर्श-विचित्र रूप किसने बनाया अर्थात् किसने नही, यह सब स्व वसे ही होते हैं ॥ २१ ॥ तदेतत् सर्वं बृहस्पतिनाप्युक्तम् । "न स्वर्गो नापवर्गो वा नैवात्मा पारलौकिकः । नैव वर्णाश्रमादीनां क्रियाश्च फलदायिकाः ॥ अग्निहोत्रं त्रयो वेदास्त्रिदण्डं भस्मगुण्ठनम् । बुद्धिपौरुषहीनानां जीविका धातृनिर्मिता ॥ पशुश्चेन्निहतः स्वर्गं ज्योतिष्टोमे गमिष्यति । स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हिंस्यते ॥ २२ ॥ बृहस्पतिने भी [कहा है कि न स्व]र्ग है न मोक्ष है परलोकका सुखभोगनेवाला आ[त्मा] [भी नहीं, वर्णाश्रमादिकी क्रिया] भी फलदायक नहीं है ॥ अग्निहोत्र त्र[यो] [बुद्धि] और पराक्रम शून्यके लिये ब्राह्म[ण]
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( ११ ) जीविकामात्र बनाये हैं ॥ ज्योतिष्टोम यागमें मारे हुए पशु यदि स्वर्गको जायगा तो याग करने- वाले अपने पिताको यज्ञमें क्यों नहीं मारते जिससे पिता भी स्वर्ग पहुँच जाय ॥ २२ ॥ मृतानामपि जन्तूनां श्राद्धं चेत्तृप्तिकारणम् । गच्छतामिह जन्तूनां व्यर्थं पाथेयकल्पनम् ॥ स्वर्गस्थिता यदा तृप्तिं गच्छेयुस्तत्र दानतः । प्रासादस्योपरिस्थानामत्र कस्मान्न दीयते ॥ यावज्जीवेत् सुखं जीवेदृणं कृत्वा घृतं पिवेत् । भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥ यदि गच्छेत्पर लोकं देहादेष विनिर्गतः । कस्माद् भूयो न चायाति बन्धुस्नेहसमाकुलः ॥ २३ ॥ श्राद्ध करनेमें मरे हुए प्राणियोंकी तृप्ति होती है तो परदेश जानेवाले पाथेय (मार्गके भोज्य)को क्यों लेजाते हैं घरहीमें श्राद्ध करनेसे सब तृप्त हो जायगे ॥ यहा पर दान करनेसे स्वर्गस्थ पितृगण तृप्त होते हों तो कोठे पर बैठ विराजमानके नामस भी यहींसे क्यों नहीं दे देते हो वह तृप्त तो हो ही जायगे और नीचे उतरनेका कष्ट भी न होगा ॥ जबतक जीवे तबतक सुख भोगे । ऋण लेकर भी घृत पीवे देह जलकर भस्म होजानेपर पुन' उसकी उत्पत्ति कहासे हो सकती है ॥ यदि कोई आत्मा इस देहसे निकलकर लोकान्तरमें जाता हो तो बन्धुस्नेहसे व्याकुल होकर पुनः क्यों नहीं घर आता हैं आता तौनहीं अत देहसेभिन्न आत्मा नहीं है । देह ही है सो यहां नष्ट होगया ॥२३॥ ततश्च जीवनोपायो ब्राह्मणैर्विहितस्त्विह । मृतानां प्रेतकार्याणि न त्वन्यद्विद्यते क्वचित् ॥ २४ ॥ अतः मेरेके लिए प्रेतकार्यादि सब ब्राह्मणोंने अपने जीवनके उपाय बनाये हैं इसके अतिरिक्त कुछ फल नहीं है ॥ २४ ॥ त्रयो वेदस्य कर्त्तारो भण्डधूर्त्तनिशाचराः । जर्फरीतुर्फरीत्यादि पण्डितानां वचः स्मृतम् ॥ अश्वस्यात्र हि शिश्नं तु पत्नीग्राह्यं प्रकीर्तितम् । भण्डैस्तद्वत्परं चैव ग्राह्यजातं प्रकीर्त्तितम् ॥ मांसानां खादनं तद्वन्निशाचरसमीरितमिति ।
( १२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ बोध- तस्माद् बहूनां प्राणिनामनुग्रहार्थं चार्वाकमतमाश्रय- णीयमिति रमणीयम् ॥ २५ ॥ इति सायणमाधवीये सर्वदर्शनसंग्रहे चार्वाकदर्शन समाप्तम् ॥ वेदको बनानेवाले धूर्त, भड ओर राक्षस यह तीन हैं । जर्फरी तुर्फरी इत्यादि ऋषियाक नाम भी पण्डिताने कल्पित किये हैं । घोडेके लिंगको पत्नी ग्रहण कं इत्यादि अश्लीलवचन भडाक कहे हुए हैं । मांसभक्षणादिक वचन राक्षसोने बनाये ह अतः अनेक जीवोंके कल्याणके लिए चार्वाकमतका अवलम्बन करना ही उत्तम है॥२५ इति सर्वदर्शनसंग्रहे चार्वाकदर्शन समाप्तम् । अथ बौद्धदर्शनम् । अत्र बौद्धैरभिधीयते— यदभ्यधायि अविनाभावो दुर्बोध इति तदसाधीयः, तादात्म्यतदुत्पत्तिभ्यामविनाभावस्य सुज्ञानत्वा । तदुक्तम्- “कार्य्यकारणभावाद्वा स्वभावाद्वा नियामकात् । अविनाभावनियमो दर्शनाददर्शनादिति” ॥ १ ॥ चार्वाकमत निरूपणके नन्तर पुनर्जन्मादि निषेधरूप नास्तिकत्वादि समान होनेसे बौद्धमतका निरूपण करते हैं । चार्वाकोंका जो कथन है कि व्याप्तिज्ञान दुर्बोध है सो अयुक्त है क्योंकि उत्पत्ति एव तादात्म्य (स्वभाव) से व्याप्तिका निश्चय हो सकता है कार्य कारण भावसे अथवा स्वभावसे व्याप्ति निश्चित होसकती हे दर्शनसे अथवा अदर्शनसे भी हो सकती है । तात्पर्य यह है कि व्याप्तिग्रहमें कार्य कारण भाव नियामक है । व्याप्य व्यापकका प्रत्यक्ष अपेक्षित नही है ॥१॥ अन्वयव्यतिरेकावविनाभावनिश्चायकाविति पक्षे साध्यसाध- नयोरव्यभिचारो दुर्द्धारणो भवेत् । भूते भविष्यति वर्त्त माने अनुपलभ्यमाने च व्यभिचारशङ्काया अनिवारणात् ननु तथाविधस्थले तावकेऽपि मते व्यभिचारशङ्का दुष्परि- ऽऽ चेत् मैवं विनापि कारणं कार्यमुत्पद्यतामित्येवं विधाय १ क्र[१५]• व्याघातावधितया निवृत्तत्वात् ॥ २ ॥ १ शङ्के ४ आदाने
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( १३ ) बौद्धदर्शन ( अ०स० २ ) यदि कोई शङ्का करे कि अन्वयव्यतिरेकसे अविनाभावका निश्चय हो जायगा पुनः कार्यकारण भावको नियामक क्यों मानते हो जिस वस्तुके रहनेसे जो अवश्य रहे वह अन्वय यथा धूमके रहनेपर वह्नि अवश्य रहती है जिसके न रहने पर जो न रहे वह व्यतिरेक कहाता है । यथा अग्निके न रहनेसे धूम नहीं रहता है । उत्तर- इस पक्षमें साध्य साधनके व्यभिचाराभावका निर्णय न होगा क्यों कि अतीत अनागत, दूर व्यवहितादिस्थित वर्तमानका प्रत्यक्ष न होनेसे उसमें व्यभिचार शङ्काका कारण असम्भव है यदि कहो तादृशस्थलमे कार्यकारणभाव वादिके मतमे भी उक्त दोष समान ही है अतः एक ही पक्षमे निर्भय रहना अनुचित है । कहा है— " यत्रोभयो समो दोषः परिहारोऽपि तादृशः । नैकः पर्यनुयोक्तव्यस्तादृशार्थविचारणैरिति ” ॥ एसे नहीं कह सकते क्या कि कारणके बिना भी कार्य उत्पन्न होगा ऐसा कहना अपनी माताको वन्ध्या कहनेके समान वचन व्याघात है ॥ २ ॥ तदेव ह्याशङ्क्येत यस्मिन्नाशङ्क्यमाने व्याघातादयो नावत्तरेयुः तदुक्तम्-व्याघातावधिराशङ्केति । तस्मात्तदुत्पत्तिनिश्चयेन अवि- नाभावो निश्चीयेत तदुत्पत्तिनिश्चयश्च कार्य्यहेत्वोः प्रत्यक्षोप लम्भा्रनुपलम्भपञ्चकनिबन्धनः । कार्य्यस्योत्पत्तेः प्रागनुपलम्भः कारणोपलम्भे सत्युपलम्भः उपलम्भस्य पश्चात् कारणानुपल- म्भादनुपलम्भ इति पञ्चकारण्या धूमधूमध्वजयोः कार्यकारण- भाव। निश्चीयते ॥ ३ ॥ शङ्का यही हो सकती है जिसमे व्याघात दोष न आवे अत एव इस विषयमें उदया- र्य्यकी भी सम्मति कहते हैं। "व्याघातेति”—“शङ्काचेदनुमास्त्येव नचेच्छङ्का कुतस्तराम् व्याघातावधिराशङ्का तर्कः शङ्कानिवर्त्तकः” ॥ कालान्तर और देशान्तरमे व्यभिचार या अन्य आशङ्का हो तो अनुमान अवश्य है क्योकि अनुमानके बिना व्यभिचार भा० ०५ का ज्ञान नहीं हो सकता यदि देशान्तर और कालान्तरमे उपाधिकी आशङ्का हीं है तो अनुमान अवश्य होगा शङ्काके निवारणकी आवश्यकता ही नहीं है "वादकथा प्रमायते” शङ्कानिवर्तक कहते है "व्याघातेति” । शङ्काकी अवधि तर्क है क्योकि तर्क शङ्काका निवर्तक है-अत. उत्पत्तिके निश्चयमे अविनाभावका निश्चय होता है । उत्पत्ति- र्णय भी कार्यकारणका प्रत्यक्षापलम्भ अनुपम्भ्ररूप कारणपञ्चकसे निश्चित होता हे यथा उत्पत्तिके पूर्वमें कार्य उपलब्ध नही होता, कारणके उपलब्धिसे उपलब्ध होता है । उपलब्ध कार्य भी कारणके अनुपम्भ ( उपादा-
( १४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ बौद्ध नकारणनाश) के पश्चात् उपलब्ध नहीं होता, इत्यादि क्रम है उत्पत्तिके पूर्व अनुपलब्ध कारणोपलम्भ २-कार्योपलम्भ ३ कारणानुपलम्भ ४ कार्यानुपलम्भ ५ यही कारण पञ्चक है इसी प्रकार वह्निके बिना धूम उपलब्ध नहीं होता है वह्निके नष्ट होनेपर धूम भी नष्ट होजाता है । अतः धूम वह्निसे उत्पन्न और वह्निधूमकी व्याप्ति निश्चित है ॥ ३ ॥ तथा तादात्म्यनिश्चयेनाप्यविनाभावो निश्चीयते । यदि शिंशपा वृक्षत्वमतिपतेत् स्वात्मानमेव जह्यादिति विपक्षे बाधक- प्रवृत्तेः । अप्रवृत्ते तु बाधके भूयः सहभावोपलम्भेऽपि व्यभि- चारशङ्कायाः को निवारयिता ॥ ४ ॥ इस प्रकार स्वभावसे भी व्याप्ति निश्चित होती है । यथा यह शिंशपा वृक्ष है यहांपर शिंशपा यदि वृक्षत्वका अतिक्रमण करेगा अर्थात् शिंशपामें वृक्षत्व न रहेगा तो शिंशपाका स्वरूप ही नष्ट हो जायगा ऐसा बाधक होता है क्योंकि वृक्षविशेष ही शिंशपा है अतः वृक्षत्व शिंशपाका असाधारण धर्म (स्वभाव) है। स्वभावके नाशसे स्वरूप नाश होता है यथा उष्णत्व अग्निका स्वभाव है उसका नाश होनेसे अग्नि भी नष्ट होता है। यदि बाधक न हो तो बहुधा साहचर्य देखनेसे भी व्यभिचार शंकाको कोई भी वारण नहीं कर सकते॥४॥ शिंशपावृक्षयोश्च तादात्म्यनिश्चयो वृक्षोऽयं शिंशपेति सामा- नाधिकरण्यबलादुपपद्यते ॥ ५ ॥ यह शिंशपा वृक्ष है इत्यादि सामानाधिकरण्यसे शिंशपा और वृक्षका रूप करा नहीं निश्चय होता है प्रवृत्तिनिमित्त (धर्म) भिन्न होकर एक विशेष्य (धर्मी) का बोध करानेवाले दो शब्दोंको सामानाधिकरण्य कहते हैं जैसे नील घट यहा नील शब्दका प्रवृत्तिनिमित्त नील त्व है नीलत्व नीलगुण है क्योंकि नीलशब्द अर्शआद्यजन्त होनेसे नीलवान् परक है नीलवानमें नील विशेषण है त्व तलादि भावप्रत्ययका अर्थ विशेषण है क्यों "प्रकृतिजन्य बोधे प्रकारीभूतो भावः" ऐसा अनुशासन है घट शब्दका प्रवृत्तिनिमित्त घटत्व है घटत्व और नील गुण दोनों घटमें रहनेसे नील घट इन दोनोंका सामानाधिकरण्य उपपन्न होगया । एव वृक्षत्व शिंशपात्व दोनों शिंशपामें रहनेसे सामानाधिकरण्य ( तादात्म्य ) लक्षण संगत होता है। एवं मृद्-घट, धूम-धूमध्वजादि कार्यकारण भाव स्थलमें भी सामानाधिकरण्यसे तादात्म्य निश्चित होता है ॥ ५ ॥ नह्यत्यन्ताभेदे तत् सम्भवति पर्य्यायत्वेन युगपदपि प्रयोगा- योगात् नाप्यत्यन्तभेदे गवाश्वयोरनुपलब्भात् तस्मात् कार्य्या- त्मानौ कारणमात्मानमनुमापयत इति सिद्धम् ॥ ६ ॥