सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] . भाषाटीकासमेतः । ( ५ ) त्मक वेदत्रय धूर्तोके कल्पित हैं । अग्निहोत्रादिक भी जीविकाके लिये है ॥ अग्निहोत्र, वेदत्रय, सन्यास और भस्मलेपन यह सब बुद्धि और पराक्रमसे हीनोंकी जीविकामात्र है। यह बृहस्पति का कहना है ॥ ९ ॥ अत एव कण्टकादिजन्यं दुःखमेव नरकं लोकसिद्धो राजा परमेश्वर देहोच्छेदो मोक्षः। देहात्मवादे च 'कृशोऽहं कृष्णोऽहम्' इत्यादि सामानाधिकरण्योपपत्तिः । 'मम शरीरम्' इति व्यव- हारो 'राहोः शिरः' इत्यादिवदौपचारिकः॥ १० ॥ संक्षेपतः इस मतका सिद्धांत यह है कि कण्टकादिजन्य दुःख ही नरक है, लोकप्रसिद्ध राजा ही ईश्वर है, देहोच्छेद अर्थात् मरण ही मुक्ति है, देहात्मवादमे ही मैं कृश हूं स्थूल हूं श्याम हूं इत्यादि सामानाधिकरण्य उपपन्न होता है ॥ सामानाधि- करण्य उसको कहते हैं कि जो विभिन्न धर्म्मविशिष्ट एकधर्मीका वाचक हो देहात्मवादमें मेरा देह इत्यादि व्यवहार भी राहुका शिर, शिलापुत्रकका शरीर इत्यादिवत् औप- चारिक हो सकता है ॥ १० ॥ तदेतत् सर्वं समग्राहि- “अत्र चत्वारि भूतानि भूमिवार्यनलानिलाः चतुर्भ्यः खलुभूतेभ्यश्चैतन्यमुपजायते ॥ किण्वादिभ्यः समेतेभ्यो द्रव्येभ्यो मदशक्तिवत् । अहं स्थूल कृशोऽस्मीति सामानाधिकरण्यतः ॥ देहः स्थौल्यादियोगाच्चस एवात्मा न चापरः । मम देहोऽयमित्युक्तिः सम्भवेदौपचारिकी” इति ॥ ११॥ उक्त बातोंको चार्वाकोंने संग्रह करके कहा है- पृथिव्यादि चार ही तत्त्व हैं और ही तत्त्वोंमें मादक द्रव्यसमुदायसे मदशक्तिवत् चैतन्य उत्पन्न होता है । मैं ल हूं, कृश हूं इत्यादि देहाभेद व्यवहारसे देह ही आत्मा है। मेरा देह इत्यादि व्य- ार भी उपचारसे होता है ॥ ११ ॥ स्यादेतत्-स्यादेष मनोरथो यद्यनुमानादेः प्रामाण्यं न स्यात् अस्ति च प्रामाण्यं कथमन्यथा धूमोपलम्भादनन्तरं धूमध्वजे प्रेक्षावतां प्रवृत्तिरुपपद्येत । नद्यास्तीरे फलानि सन्तीति वचन- श्रवणसमनन्तर फलार्थिनां नदीतीरे प्रवृत्तिरिति । तदेतन्मनो-