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सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

दर्शनम् ] . भाषाटीकासमेतः । ( ५ ) त्मक वेदत्रय धूर्तोके कल्पित हैं । अग्निहोत्रादिक भी जीविकाके लिये है ॥ अग्निहोत्र, वेदत्रय, सन्यास और भस्मलेपन यह सब बुद्धि और पराक्रमसे हीनोंकी जीविकामात्र है। यह बृहस्पति का कहना है ॥ ९ ॥ अत एव कण्टकादिजन्यं दुःखमेव नरकं लोकसिद्धो राजा परमेश्वर देहोच्छेदो मोक्षः। देहात्मवादे च 'कृशोऽहं कृष्णोऽहम्' इत्यादि सामानाधिकरण्योपपत्तिः । 'मम शरीरम्' इति व्यव- हारो 'राहोः शिरः' इत्यादिवदौपचारिकः॥ १० ॥ संक्षेपतः इस मतका सिद्धांत यह है कि कण्टकादिजन्य दुःख ही नरक है, लोकप्रसिद्ध राजा ही ईश्वर है, देहोच्छेद अर्थात् मरण ही मुक्ति है, देहात्मवादमे ही मैं कृश हूं स्थूल हूं श्याम हूं इत्यादि सामानाधिकरण्य उपपन्न होता है ॥ सामानाधि- करण्य उसको कहते हैं कि जो विभिन्न धर्म्मविशिष्ट एकधर्मीका वाचक हो देहात्मवादमें मेरा देह इत्यादि व्यवहार भी राहुका शिर, शिलापुत्रकका शरीर इत्यादिवत् औप- चारिक हो सकता है ॥ १० ॥ तदेतत् सर्वं समग्राहि- “अत्र चत्वारि भूतानि भूमिवार्यनलानिलाः चतुर्भ्यः खलुभूतेभ्यश्चैतन्यमुपजायते ॥ किण्वादिभ्यः समेतेभ्यो द्रव्येभ्यो मदशक्तिवत् । अहं स्थूल कृशोऽस्मीति सामानाधिकरण्यतः ॥ देहः स्थौल्यादियोगाच्चस एवात्मा न चापरः । मम देहोऽयमित्युक्तिः सम्भवेदौपचारिकी” इति ॥ ११॥ उक्त बातोंको चार्वाकोंने संग्रह करके कहा है- पृथिव्यादि चार ही तत्त्व हैं और ही तत्त्वोंमें मादक द्रव्यसमुदायसे मदशक्तिवत् चैतन्य उत्पन्न होता है । मैं ल हूं, कृश हूं इत्यादि देहाभेद व्यवहारसे देह ही आत्मा है। मेरा देह इत्यादि व्य- ार भी उपचारसे होता है ॥ ११ ॥ स्यादेतत्-स्यादेष मनोरथो यद्यनुमानादेः प्रामाण्यं न स्यात् अस्ति च प्रामाण्यं कथमन्यथा धूमोपलम्भादनन्तरं धूमध्वजे प्रेक्षावतां प्रवृत्तिरुपपद्येत । नद्यास्तीरे फलानि सन्तीति वचन- श्रवणसमनन्तर फलार्थिनां नदीतीरे प्रवृत्तिरिति । तदेतन्मनो-

१. चार्वाक दर्शन (लोकायतिक मत)

(६) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ चार्वाक-

पगतमनुमानप्रामाण्यवादिभिः व्याप्तिश्चोभयनिधोपाधिविधुरः सम्बंधः । स च स्वसत्तया चक्षुरादिवन्नांगभाव भजते किन्तु ज्ञा- ततया । कः खलु ज्ञानोपायो भवेत् । न तावत् प्रत्यक्षम् तच्च बाह्यमान्तर वाभिमतम्। न प्रथमः । तस्य सम्प्रयुक्तविषयज्ञानज- नकत्वेन विद्यमाने प्रसगसम्भवेपि भूतभविष्यतोस्तदसम्भ- वेन सर्वोपसंहारवत्याप्तेर्दुर्ज्ञानत्वात् । न च व्याप्तिज्ञान सा- मान्यगोचरमिति मन्तव्य, व्यक्त्योरविनाभावाभावप्रसगात्॥१२॥ “स्यादेतत् इति” यह मनोरथ तन सिद्ध हो जन अनुमानादिका प्रामाण्य ही न हो किंतु अनुमानका प्रामाण्य अवश्य मानना होगा, अन्यथा धूम देखकर धूमध्वज अग्निके विषयमे बुद्धिमानोकी प्रवृत्ति कैसे हो सकती है । एव शब्द प्रमाणन माननेमे नदीके किनारे पाँच फल हैं इस वाक्यको सुनकर फलार्थियों की फलाहरणप्रवृत्ति भी कैसे होगी । यह भी मनोराज्यमान है । क्योकि व्याप्तिप्रकारक पक्षधर्मताशाली लिङ्गज्ञानको अनुमितिके प्रति कारण अनुमान प्रामाण्यवादियोने माना है यथा जहार अग्नि है वहार धूम है यह व्याप्ति हे वह्रिव्याप्य धूम, यह व्याप्तिप्रकारक ज्ञान है । वह्नि व्याप्य धूमवान् पर्वत यह व्याप्तिप्रकारक पक्षधर्मताज्ञान है इसीको परामर्श भी कहते हैं ॥ अनन्तर “पर्वतो वह्निमान् धूमात्” ऐसी अनुमिति होती है। शङ्केत निश्चित भेदसे द्विविध उपाधिरहित सम्बन्ध व्याप्ति है । वह सम्बन्ध चक्षुगादिके समान स्वसत्तामात्रसे। कार्यसाधक नही होता किन्तु ज्ञात होनेमे हाता है । व्याप्तिज्ञानका उपाय प्रत्यक्ष हो ही नही सकता क्या कि बाह्य और आन्तर (मानस) भेदस प्रत्यक्ष दो प्रकारका चक्षुरादि बहिरिन्द्रियज य प्रत्यक्ष बाह्य है वह विषयन्द्रिय सयोगसे होता है । विद्य मान (धूम वह्न्यादे) विषय क साथ इन्द्रियसम्बन्ध होनेपर भी भूत भविष्यत् के साथ सम्बन्धका असम्भव होनेसे निखिल वह्नि धूमका अव्यभिचरित व्याप्तिग्रह दुर्ज्ञेय होगा ॥ यदि कहो निखिल धूम वह्निका प्रत्यक्ष न होनेपर भी धूमादिवृत्ति धूमत्वादि एक सामान्यद्वारा सम्बन्ध (व्याप्ति) ज्ञानका सम्भव होगा यह भी नहीं क्योंकि सामान्यत्व धूमत्व वह्नित्वका व्याप्तिग्रह अर्थात् धूमत्ववह्नित्व- का अविनाभाव (व्याप्ति) गृहीत होनेपर भी व्यक्ति (धूम अग्नि) की व्याप्तिग्रहका अभाव प्रसङ्ग होगा ॥ १२ ॥ नापि चरमः । अन्तःकरणस्य बहिरिन्द्रियतन्त्रत्वेन बा- ऽर्थे स्वातन्त्र्येण प्रवृत्त्यनुपपत्तेः ॥ तदुक्तम्- 'चक्षुर युक्तविषय परतन्त्र वहिर्मन इति ॥ १३ ॥ १ 'पर्वत अग्निवाला है कार्ने धूम होनेसे'

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । (७) मानस प्रत्यक्ष भी नहीं कह सकते अन्तःकरण स्वतन्त्ररूपसे बाह्यार्थका ज्ञान नहीं कर सकता किन्तु चक्षुरादि परतन्त्र ही करता है यथा मनको चक्षुरादिका संयोग और चक्षुरादिको विषयका संयोग होनेपर प्रत्यक्ष होता है ऐसा नियम है “चक्षुरादिके विषयको ग्रहण करनेमें मन चक्षुरादि परतन्त्र ही प्रवृत्त होते हैं।” ऐसा कहा भी है ॥१३॥ ( नाप्यनुमानं व्याप्तिज्ञानोपायः, तत्र तत्राप्येवमिति अनव- स्थादौस्थ्यप्रसङ्गात् । नापि शब्दस्तदुपायः, काणादमतानुसारे- णानुमान एवान्तर्भावात् अनन्तर्भावे वा वृद्धव्यवहाररूपलिङ्गाव- गतिः सापेक्षतया प्रागुक्तदूषणलङ्घनाज्झालत्वात् ॥ १४॥ अनुमान भी व्याप्तिज्ञानका उपाय नहीं हो सकता एक व्याप्तिज्ञानके लिये अनु- मान करे तो उसमें भी व्याप्तिज्ञानकी अपेक्षा, उसके लिये अनुमानान्तर, उसके लिये पुनः व्याप्तिज्ञानापेक्षा, एवं क्रमसे अनवस्था होगी । शब्द भी व्याप्तिज्ञानका उपाय नहीं क्योंकि वैशेषिकके मतमें शब्द भी अनुमानमें अन्तर्भूत है अत एव- "शब्दोपमानयोर्नैव पृथक् प्रामाण्यमर्हति । अनुमाने गतार्थत्वादिति वैशेषिक मतम् ॥” इत्यादि वैशेषिकोंने कहा भी है। शब्दको अनुमानमे अन्तर्भाव न माननेपर भी वृद्ध व्यवहाररूप लिङ्गसापेक्ष होनेसे पूर्वोक्त अनवस्था तदवस्थ होगी। यथा एक वृद्ध 'गौ को लावो' ऐसा किसी भृत्यसे कहते हैं उसको सुनकर भृत्य गौको लाता है उसको देखकर समीपस्थ बालकको शक्तिग्रह होता है यह शब्दकी शक्तिग्रहका क्रम है ॥ १४ ॥ धूमधूमध्वजयोरविनाभावोऽस्तीति वचनमात्रे मन्वादिवद् विश्वासाभावाच्च ।' अनुपदिष्टविनाभावस्य पुरुषस्यार्थान्तरदर्श- नेनार्थान्तरानुमित्यभावे स्वार्थानुमानकथायाः कथाशेषत्व- प्रसङ्गाच्च ॥ १५ ॥ केवल अग्निके विना धूम नहीं रहता यह वचन मनुवचनके समान विश्वासास्पद भी नहीं होगा । धूम अग्निके अविनाभूत अर्थात् अग्निकी सत्ताके विना धूमकी सत्ता नहीं रहती है इसी प्रकार जिस पुरुषको उपदेश नहीं हुआ हो उस पुरुषको धूमको देख- कर अग्नि आदि अर्थान्तरका अनुमान भी असम्भव है एव स्वार्थानुमानका अञ्जलि प्रदान हो जायगा । तात्पर्य-अनुमान स्वार्थपरार्थ भेदसे दो प्रकार है। स्वय यदि धूमकी व्याप्ति ग्रहणकर पश्चात् धूम देखकर व्याप्ति स्मरणपूर्वक पर्वतमें वह्निका अनुमान करतो

(८) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः। [ चार्वाक- है वह स्वार्थानुमान है जिसने स्वयं व्याप्तिग्रहण किया हो उसको बोध करानेके लिय पञ्चावयव वाक्यका प्रयोग करता हो वह परार्थानुमान है प्रकृतेमे स्वयं व्याप्ति-ग्रह न करनेसे स्वार्थानुमान परकीय वाक्यम विश्वास न होनेसे परार्थानुमान दोनों दूरत. परास्त हो गये ॥ १५ ॥ उपमानादिकं तु दूरापास्तं तेषां संज्ञासंज्ञिसम्बन्धादिबोधक- त्वेनानौपाधिकत्वसम्बन्धबोधकत्वासम्भवात् ॥ १६ ॥ उपमान भी व्याप्तिग्रहका उपाय नहीं हो सकता क्योंकि संज्ञा संज्ञि भाव सम्बन्ध को उपमान कहते हैं यथा गौके सदृश गवय है इस वाक्यको सुनकर वनम तादृश जन्तुको देखनेसे यह गवय है ऐसा उपमान होता है गवयपद संज्ञा तादृश वस्तु संज्ञी दोनोंकी शक्ति सम्बन्ध है-परन्तु यह भी निरुपाधिक सम्बन्ध बाधनमें असमर्थ है॥१६॥ किञ्च उपाध्यभावोऽपि दुरवगम उपाधीनां प्रत्यक्षत्वनियमा- सम्भवेन प्रत्यक्षाणामभावस्य प्रत्यक्षत्वेऽपि अप्रत्यक्षाणामभाव स्याप्रत्यक्षतया अनुमानाद्यपेक्षायामुक्तदूषणानिवृत्तेः ॥१७॥ उपाधिका अभाव भी दुर्ज्ञेय है-क्योंकि पूर्वोक्त प्रकार समस्त उपाधिका प्रत्यक्ष सम्भव न होनेसे, अभाव प्रत्यक्षके प्रतियोगि प्रत्यक्ष कारण है, विद्यमान उपाधिके अभावका प्रत्यक्ष होनेपर भी अतीत अनागत और वर्तमान भी अप्रत्यक्ष उपाधिके अभावका प्रत्यक्ष सम्भव नहीं है अतः तादृश अभावप्रत्यक्षके लिये अनुमानकी अपेक्षा करें तो उसमें भी व्याप्ति ज्ञानकी अपेक्षा होगी उसके लिए उपाध्यभाव ज्ञानकी अपेक्षा एवं क्रमसे अनवस्था तदवस्थ होगी ॥ १७ ॥ अपि च=साधनाव्यापकत्वे सति साध्यसमव्याप्तिरिति तल्लक्षण मङ्गीकर्त्तव्यम् । तदुक्तम्- "अव्याप्तसाधनो यः साध्यसमव्याप्ति- रुच्यते स उपाधिः" इति ॥ शब्देऽनित्यत्वे साध्ये सकर्तृकत्व घटत्वमश्रावणताञ्च व्यावर्तयितुमुपात्तान्यत्र क्रमतो विशेषणानि त्रीणि ॥ १८ ॥ उपाधि लक्षणमे भी व्याप्तिज्ञानापेक्षा कहते हैं "अपिचेति" साधनाव्यापकत्वेति इसमें तीन पद हैं साधनाव्यापकत्व १-साध्य २-सम ३-तीनोंका प्रयोजन- "शब्दो ऽनित्यः कृतकत्वात्"-यह सद्धेतु है । यदि साधनाव्यापकत्व नहीं कहता तो सकर्तृकत्व हो जायगा साधनाव्यापकत्व कहा तो सकर्तृकत्व-कार्यत्वका अव्यापक न हुआ। जहां कार्यत्व है वहां सर्वत्र सकर्तृकत्व है अतः उसमें अतिव्याप्ति वारणके लिए,,

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ९ ) साधनाव्यापकत्वरूप विशेषण चरितार्थ हुआ । साध्यव्यापकत्व नहीं कहते तो घट त्वमें अतिव्याप्ति होगी-क्या कि घटत्व घटमात्रहीमे रहेगा कार्यत्व अनित्य वस्तुमात्र में रहेगा अतः साधनाव्यापकत्व होगया साध्यव्यापक करते हैं तो घटत्व अनित्यत्वका व्यापक नहीं हुआ सम नहीं कहते तो अश्रावणत्वमें अतिव्याप्ति होगी साधनका अव्या पक और साध्यका व्यापक भी अश्रावणत्व है साध्य सम कहते हैं तो साध्य समनियत व्याप्ति नहीं हुई क्योकि अश्रावणत्व अनित्यत्वरूप साध्य अन्यत्र नित्य आकाशादिम भी रहता है । “ वह्निमान् धूमात् ” इत्यादिम आर्द्वेन्धनसंयोगरूप उपाधिम साधना- व्यापकत्व साध्यसमव्यापकत्व होनेसे लक्षणसमन्वय हुआ ॥ १८ ॥ तस्मादिदमनवद्य समासमेत्यादिनोक्तमाचार्यैश्चेति ॥ १९ ॥ उक्तार्थम आचार्यसम्मति कहते हैं कि समासमेति - “समासमाविनाभाववेकत्र स्तो यदा तदा । समेन यदि नो व्याप्तस्तयोहीनोऽप्रयोजकः” इति ॥ व्याप्ति दो प्रकारकी है एक समव्याप्ति और दूसरी असमव्याप्ति यथा गन्धवत्त्व पृथिवीत्व दोनोंकी परस्पर व्याप्ति सम व्याप्ति है । दोनामे से एक की व्याप्ति हो दूसरेकी नहीं हो वह असमव्याप्ति है यथा वह्निधूमकी व्याप्ति धूमकी वह्निके साथ व्याप्ति है किन्तु वह्निकी धूमके साथ व्याप्ति नहीं क्यो कि तप्त लोहपिण्डमें अग्नि है धूम नहीं । अविनाभावका अर्थ व्याप्ति है सम व्याप्ति और असमव्याप्ति दोनों एकस्थल में हो तो सम और असम अर्थात् धूम और अग्निके मध्यमे ही न अर्थात् असम अग्नि समधूमके साथ यदि व्याप्त न हो अर्थात् अग्नि धूमसे व्याप्त न हो तो हीन अग्नि अप्रयोजक अर्थात् धूमरूप साध्यका हेतु नहीं होसकती ॥ १९ ॥ तत्र विध्यध्यवसायपूर्वकत्वान्निषेधाध्यवसायस्योपाधिज्ञाने जाते तदभावविशिष्टसम्बन्धरूप व्याप्तिज्ञानं व्याप्तिज्ञानाधीन चोपा- धिज्ञानमिति परस्पराश्रयवज्रप्रहारदोषो वज्रलेपायते। तस्मादवि- नाभावस्य दुर्बोधतया नानुमानाद्यवकाशः। धूमादिज्ञानानन्त- रमग्न्यादिज्ञाने प्रवृत्तिः प्रत्यक्षमूलतया भ्रान्त्या वा युज्यते ॥२०॥ उक्त अन्योन्याश्रयको उपपादन करते हैं तत्रेत्यादिसे- ऐसा नियम है कि अभावज्ञानम प्रतियोगीज्ञान कारण होता है एव निषेधज्ञानम मे विधिज्ञान कारण होनेसे उपाधिज्ञान होनेपर उपाधिभाव सहित व्याप्ति ज्ञान होगा व्याप्ति ज्ञानानन्तर उपाधिज्ञान इति अन्योन्याश्रय दोष भी अपरिहरणीय है । अन्यो- न्याश्रयका लक्षण “स्वज्ञानाधीनज्ञानवत्त्व” है स्वपदसे उपाधिके अभावका ग्रहण है उसके

( १० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ बौद्ध ानके अधीन व्याप्तिज्ञान है। अतः अविनाभाव दुर्ज्ञेय होनेसे अनुमानादिका अवकाश नहीं। यदि कहो अनुमानका प्रामाण्य ही नहीं तो धूमादि (हेतु) ज्ञानसे अग्न्यादि साध्य) ज्ञानमे प्रवृत्ति कैसे होती है-कहीं २ प्रत्यक्षद्वारा कही ० भ्रान्तिसे होती से कहेगे ॥ २० ॥ क्वचित् फलप्रतिलम्भस्तु मणिमन्त्रौषधादिवत् याहच्छिकः अत- स्तत्तु साध्यमदृष्टादिकं मपि नास्ति । नन्वदृष्टानिष्टौ जगद्वै- चित्र्यमाकस्मिकं स्यादिति चेत् न तद्भद्रम् "अग्निरुष्णो जलं शीतं शीतस्पर्शस्तथानिलः । केनेदं चित्रितं तस्मात् स्वभावात्तद्व्यवस्थितिरिति" ॥ २१ ॥ भ्रान्तिज्ञानसे प्रवृत्त पुरुषको शुक्ति रजत आदिमे फलकी सिद्धि नहीं होती, प्रकृते अग्न्यादिरूप फल प्राप्त होता है। सो क्यों ? वह यहच्छासे (अकस्मात) ही होता यथा मणि मन्त्र औपधादिसे फल होता है-यदि मणि मन्त्र औष्यादिसे निश्चित फ मिलता हो तो एक ही रोगके लिए अनेक औषधियोंको बदल बदल कर क्यों दे[ते] इससे मालूम होता है-रोगनिवृत्त्यादि फल अकस्मात् ही होता है। अतः मन्त्रा[प्रत्य-] अदृष्टादिक भी नहीं, यदि कहो अदृष्ट न मानो तो ससारकी विचित्रता (कोई सुखी कोई दु इत्यादि) न होगी-यह भी नहीं क्योकि यह सब स्वभावसे होते हैं। अग्निको उष्ण, जल शीत, वायुको शीतस्पर्श-विचित्र रूप किसने बनाया अर्थात् किसने नही, यह सब स्व वसे ही होते हैं ॥ २१ ॥ तदेतत् सर्वं बृहस्पतिनाप्युक्तम् । "न स्वर्गो नापवर्गो वा नैवात्मा पारलौकिकः । नैव वर्णाश्रमादीनां क्रियाश्च फलदायिकाः ॥ अग्निहोत्रं त्रयो वेदास्त्रिदण्डं भस्मगुण्ठनम् । बुद्धिपौरुषहीनानां जीविका धातृनिर्मिता ॥ पशुश्चेन्निहतः स्वर्गं ज्योतिष्टोमे गमिष्यति । स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हिंस्यते ॥ २२ ॥ बृहस्पतिने भी [कहा है कि न स्व]र्ग है न मोक्ष है परलोकका सुखभोगनेवाला आ[त्मा] [भी नहीं, वर्णाश्रमादिकी क्रिया] भी फलदायक नहीं है ॥ अग्निहोत्र त्र[यो] [बुद्धि] और पराक्रम शून्यके लिये ब्राह्म[ण]

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( ११ ) जीविकामात्र बनाये हैं ॥ ज्योतिष्टोम यागमें मारे हुए पशु यदि स्वर्गको जायगा तो याग करने- वाले अपने पिताको यज्ञमें क्यों नहीं मारते जिससे पिता भी स्वर्ग पहुँच जाय ॥ २२ ॥ मृतानामपि जन्तूनां श्राद्धं चेत्तृप्तिकारणम् । गच्छतामिह जन्तूनां व्यर्थं पाथेयकल्पनम् ॥ स्वर्गस्थिता यदा तृप्तिं गच्छेयुस्तत्र दानतः । प्रासादस्योपरिस्थानामत्र कस्मान्न दीयते ॥ यावज्जीवेत् सुखं जीवेदृणं कृत्वा घृतं पिवेत् । भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥ यदि गच्छेत्पर लोकं देहादेष विनिर्गतः । कस्माद् भूयो न चायाति बन्धुस्नेहसमाकुलः ॥ २३ ॥ श्राद्ध करनेमें मरे हुए प्राणियोंकी तृप्ति होती है तो परदेश जानेवाले पाथेय (मार्गके भोज्य)को क्यों लेजाते हैं घरहीमें श्राद्ध करनेसे सब तृप्त हो जायगे ॥ यहा पर दान करनेसे स्वर्गस्थ पितृगण तृप्त होते हों तो कोठे पर बैठ विराजमानके नामस भी यहींसे क्यों नहीं दे देते हो वह तृप्त तो हो ही जायगे और नीचे उतरनेका कष्ट भी न होगा ॥ जबतक जीवे तबतक सुख भोगे । ऋण लेकर भी घृत पीवे देह जलकर भस्म होजानेपर पुन' उसकी उत्पत्ति कहासे हो सकती है ॥ यदि कोई आत्मा इस देहसे निकलकर लोकान्तरमें जाता हो तो बन्धुस्नेहसे व्याकुल होकर पुनः क्यों नहीं घर आता हैं आता तौनहीं अत देहसेभिन्न आत्मा नहीं है । देह ही है सो यहां नष्ट होगया ॥२३॥ ततश्च जीवनोपायो ब्राह्मणैर्विहितस्त्विह । मृतानां प्रेतकार्याणि न त्वन्यद्विद्यते क्वचित् ॥ २४ ॥ अतः मेरेके लिए प्रेतकार्यादि सब ब्राह्मणोंने अपने जीवनके उपाय बनाये हैं इसके अतिरिक्त कुछ फल नहीं है ॥ २४ ॥ त्रयो वेदस्य कर्त्तारो भण्डधूर्त्तनिशाचराः । जर्फरीतुर्फरीत्यादि पण्डितानां वचः स्मृतम् ॥ अश्वस्यात्र हि शिश्नं तु पत्नीग्राह्यं प्रकीर्तितम् । भण्डैस्तद्वत्परं चैव ग्राह्यजातं प्रकीर्त्तितम् ॥ मांसानां खादनं तद्वन्निशाचरसमीरितमिति ।

( १२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ बोध- तस्माद् बहूनां प्राणिनामनुग्रहार्थं चार्वाकमतमाश्रय- णीयमिति रमणीयम् ॥ २५ ॥ इति सायणमाधवीये सर्वदर्शनसंग्रहे चार्वाकदर्शन समाप्तम् ॥ वेदको बनानेवाले धूर्त, भड ओर राक्षस यह तीन हैं । जर्फरी तुर्फरी इत्यादि ऋषियाक नाम भी पण्डिताने कल्पित किये हैं । घोडेके लिंगको पत्नी ग्रहण कं इत्यादि अश्लीलवचन भडाक कहे हुए हैं । मांसभक्षणादिक वचन राक्षसोने बनाये ह अतः अनेक जीवोंके कल्याणके लिए चार्वाकमतका अवलम्बन करना ही उत्तम है॥२५ इति सर्वदर्शनसंग्रहे चार्वाकदर्शन समाप्तम् । अथ बौद्धदर्शनम् । अत्र बौद्धैरभिधीयते— यदभ्यधायि अविनाभावो दुर्बोध इति तदसाधीयः, तादात्म्यतदुत्पत्तिभ्यामविनाभावस्य सुज्ञानत्वा । तदुक्तम्- “कार्य्यकारणभावाद्वा स्वभावाद्वा नियामकात् । अविनाभावनियमो दर्शनाददर्शनादिति” ॥ १ ॥ चार्वाकमत निरूपणके नन्तर पुनर्जन्मादि निषेधरूप नास्तिकत्वादि समान होनेसे बौद्धमतका निरूपण करते हैं । चार्वाकोंका जो कथन है कि व्याप्तिज्ञान दुर्बोध है सो अयुक्त है क्योंकि उत्पत्ति एव तादात्म्य (स्वभाव) से व्याप्तिका निश्चय हो सकता है कार्य कारण भावसे अथवा स्वभावसे व्याप्ति निश्चित होसकती हे दर्शनसे अथवा अदर्शनसे भी हो सकती है । तात्पर्य यह है कि व्याप्तिग्रहमें कार्य कारण भाव नियामक है । व्याप्य व्यापकका प्रत्यक्ष अपेक्षित नही है ॥१॥ अन्वयव्यतिरेकावविनाभावनिश्चायकाविति पक्षे साध्यसाध- नयोरव्यभिचारो दुर्द्धारणो भवेत् । भूते भविष्यति वर्त्त माने अनुपलभ्यमाने च व्यभिचारशङ्काया अनिवारणात् ननु तथाविधस्थले तावकेऽपि मते व्यभिचारशङ्का दुष्परि- ऽऽ चेत् मैवं विनापि कारणं कार्यमुत्पद्यतामित्येवं विधाय १ क्र[१५]• व्याघातावधितया निवृत्तत्वात् ॥ २ ॥ १ शङ्के ४ आदाने

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( १३ ) बौद्धदर्शन ( अ०स० २ ) यदि कोई शङ्का करे कि अन्वयव्यतिरेकसे अविनाभावका निश्चय हो जायगा पुनः कार्यकारण भावको नियामक क्यों मानते हो जिस वस्तुके रहनेसे जो अवश्य रहे वह अन्वय यथा धूमके रहनेपर वह्नि अवश्य रहती है जिसके न रहने पर जो न रहे वह व्यतिरेक कहाता है । यथा अग्निके न रहनेसे धूम नहीं रहता है । उत्तर- इस पक्षमें साध्य साधनके व्यभिचाराभावका निर्णय न होगा क्यों कि अतीत अनागत, दूर व्यवहितादिस्थित वर्तमानका प्रत्यक्ष न होनेसे उसमें व्यभिचार शङ्काका कारण असम्भव है यदि कहो तादृशस्थलमे कार्यकारणभाव वादिके मतमे भी उक्त दोष समान ही है अतः एक ही पक्षमे निर्भय रहना अनुचित है । कहा है— " यत्रोभयो समो दोषः परिहारोऽपि तादृशः । नैकः पर्यनुयोक्तव्यस्तादृशार्थविचारणैरिति ” ॥ एसे नहीं कह सकते क्या कि कारणके बिना भी कार्य उत्पन्न होगा ऐसा कहना अपनी माताको वन्ध्या कहनेके समान वचन व्याघात है ॥ २ ॥ तदेव ह्याशङ्क्येत यस्मिन्नाशङ्क्यमाने व्याघातादयो नावत्तरेयुः तदुक्तम्-व्याघातावधिराशङ्केति । तस्मात्तदुत्पत्तिनिश्चयेन अवि- नाभावो निश्चीयेत तदुत्पत्तिनिश्चयश्च कार्य्यहेत्वोः प्रत्यक्षोप लम्भा्रनुपलम्भपञ्चकनिबन्धनः । कार्य्यस्योत्पत्तेः प्रागनुपलम्भः कारणोपलम्भे सत्युपलम्भः उपलम्भस्य पश्चात् कारणानुपल- म्भादनुपलम्भ इति पञ्चकारण्या धूमधूमध्वजयोः कार्यकारण- भाव। निश्चीयते ॥ ३ ॥ शङ्का यही हो सकती है जिसमे व्याघात दोष न आवे अत एव इस विषयमें उदया- र्य्यकी भी सम्मति कहते हैं। "व्याघातेति”—“शङ्काचेदनुमास्त्येव नचेच्छङ्का कुतस्तराम् व्याघातावधिराशङ्का तर्कः शङ्कानिवर्त्तकः” ॥ कालान्तर और देशान्तरमे व्यभिचार या अन्य आशङ्का हो तो अनुमान अवश्य है क्योकि अनुमानके बिना व्यभिचार भा० ०५ का ज्ञान नहीं हो सकता यदि देशान्तर और कालान्तरमे उपाधिकी आशङ्का हीं है तो अनुमान अवश्य होगा शङ्काके निवारणकी आवश्यकता ही नहीं है "वादकथा प्रमायते” शङ्कानिवर्तक कहते है "व्याघातेति” । शङ्काकी अवधि तर्क है क्योकि तर्क शङ्काका निवर्तक है-अत. उत्पत्तिके निश्चयमे अविनाभावका निश्चय होता है । उत्पत्ति- र्णय भी कार्यकारणका प्रत्यक्षापलम्भ अनुपम्भ्ररूप कारणपञ्चकसे निश्चित होता हे यथा उत्पत्तिके पूर्वमें कार्य उपलब्ध नही होता, कारणके उपलब्धिसे उपलब्ध होता है । उपलब्ध कार्य भी कारणके अनुपम्भ ( उपादा-

( १४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ बौद्ध नकारणनाश) के पश्चात् उपलब्ध नहीं होता, इत्यादि क्रम है उत्पत्तिके पूर्व अनुपलब्ध कारणोपलम्भ २-कार्योपलम्भ ३ कारणानुपलम्भ ४ कार्यानुपलम्भ ५ यही कारण पञ्चक है इसी प्रकार वह्निके बिना धूम उपलब्ध नहीं होता है वह्निके नष्ट होनेपर धूम भी नष्ट होजाता है । अतः धूम वह्निसे उत्पन्न और वह्निधूमकी व्याप्ति निश्चित है ॥ ३ ॥ तथा तादात्म्यनिश्चयेनाप्यविनाभावो निश्चीयते । यदि शिंशपा वृक्षत्वमतिपतेत् स्वात्मानमेव जह्यादिति विपक्षे बाधक- प्रवृत्तेः । अप्रवृत्ते तु बाधके भूयः सहभावोपलम्भेऽपि व्यभि- चारशङ्कायाः को निवारयिता ॥ ४ ॥ इस प्रकार स्वभावसे भी व्याप्ति निश्चित होती है । यथा यह शिंशपा वृक्ष है यहांपर शिंशपा यदि वृक्षत्वका अतिक्रमण करेगा अर्थात् शिंशपामें वृक्षत्व न रहेगा तो शिंशपाका स्वरूप ही नष्ट हो जायगा ऐसा बाधक होता है क्योंकि वृक्षविशेष ही शिंशपा है अतः वृक्षत्व शिंशपाका असाधारण धर्म (स्वभाव) है। स्वभावके नाशसे स्वरूप नाश होता है यथा उष्णत्व अग्निका स्वभाव है उसका नाश होनेसे अग्नि भी नष्ट होता है। यदि बाधक न हो तो बहुधा साहचर्य देखनेसे भी व्यभिचार शंकाको कोई भी वारण नहीं कर सकते॥४॥ शिंशपावृक्षयोश्च तादात्म्यनिश्चयो वृक्षोऽयं शिंशपेति सामा- नाधिकरण्यबलादुपपद्यते ॥ ५ ॥ यह शिंशपा वृक्ष है इत्यादि सामानाधिकरण्यसे शिंशपा और वृक्षका रूप करा नहीं निश्चय होता है प्रवृत्तिनिमित्त (धर्म) भिन्न होकर एक विशेष्य (धर्मी) का बोध करानेवाले दो शब्दोंको सामानाधिकरण्य कहते हैं जैसे नील घट यहा नील शब्दका प्रवृत्तिनिमित्त नील त्व है नीलत्व नीलगुण है क्योंकि नीलशब्द अर्शआद्यजन्त होनेसे नीलवान् परक है नीलवानमें नील विशेषण है त्व तलादि भावप्रत्ययका अर्थ विशेषण है क्यों "प्रकृतिजन्य बोधे प्रकारीभूतो भावः" ऐसा अनुशासन है घट शब्दका प्रवृत्तिनिमित्त घटत्व है घटत्व और नील गुण दोनों घटमें रहनेसे नील घट इन दोनोंका सामानाधिकरण्य उपपन्न होगया । एव वृक्षत्व शिंशपात्व दोनों शिंशपामें रहनेसे सामानाधिकरण्य ( तादात्म्य ) लक्षण संगत होता है। एवं मृद्-घट, धूम-धूमध्वजादि कार्यकारण भाव स्थलमें भी सामानाधिकरण्यसे तादात्म्य निश्चित होता है ॥ ५ ॥ नह्यत्यन्ताभेदे तत् सम्भवति पर्य्यायत्वेन युगपदपि प्रयोगा- योगात् नाप्यत्यन्तभेदे गवाश्वयोरनुपलब्भात् तस्मात् कार्य्या- त्मानौ कारणमात्मानमनुमापयत इति सिद्धम् ॥ ६ ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( १५ ) दोनों वस्तुए अत्यन्त अभिन्न होनेपर तादात्म्य असम्भव है। क्यो कि अत्यन्त अभेद में पर्याय होता है पर्यायवाचक अनेक शब्दोंका एक साथ प्रयोग नहीं होता है यथा घट कलश इत्यादि अत्यन्त भेदमें भी तादात्म्य नहीं होता कोई भी अश्व महिप को तादात्म्य नहीं कहते अतः भेदाभेद समनियत तादात्म्य है तथाच कार्य रूपसे भेद और कारण रूपसे अभेद होनेपर कार्य वस्तु कारणका अनुमान करता है यह सिद्ध हुआ ॥ ६ ॥ यदि कश्चित् प्रामाण्यमनुमानस्य नांगीकुर्यात् तं प्रति ब्रूयात् अनुमानप्रमाणं न भवतीत्येतावन्मात्रमुच्यते तत्र न किञ्चन साधनमुपन्यस्यते उपन्यस्यते वा । न प्रथम॰, एकाकिनी प्रति- ज्ञा हि प्रतिज्ञातं न साधयेदिति न्यायात्। नापि चरमः, अनुमानं प्रमाणं न भवतीति ब्रुवाणेन त्वया (अशिरस्क) साधनवचनस्यो_ पन्यासे मम माता वन्ध्येतिवद् व्याघातापातात् ॥ ७ ॥ यदि कोई अनुमान प्रमाण न माने तो उससे पूछना चाहिये क्या अनुमान प्रमाण नहीं इतना ही कहते हो या कुछ हेतुका भी उपन्यास करते हो, ऐसा नियम है केवल प्रतिज्ञा मात्रसे वस्तुसिद्धि नहीं होती है पर्वतमें अग्नि है इस प्रतिज्ञामात्र से कोई सन्तुष्ट न होगा धूमादि हेतुको भी दिखाना पडेगा अतः प्रथम विकल्प असम्भव है । द्वितीय पक्षमें अनुमान अप्रमाण है प्रमितिकरणतावच्छेदकधर्मशून्य होनेसे इत्यादि हेतु और साध्य दिखाकर अनुमान ही करोगे तब तो अनुमानको अप्रामाण्य साधनेमें भी अनुमान ही प्रमाण होनेसे अपनी माताको वन्ध्या कहनेके समान वदतो व्याघात होगा ॥ ७ ॥ किञ्चप्रमाणतदाभासव्यवस्थापनंतत्समानजातीयत्वादितिवदता भवतैव स्वीकृतं स्वभावानुमानम् । परगता विप्रतिपत्तिस्तु वच- नलिङ्गेनेति ब्रुवता कार्यलिङ्गमनुमानम् अनुपलब्ध्या कश्चिदर्थं प्रतिषेधयतानुपलब्धिलिङ्गमनुमानम् । तथा चोक्तं तथागतैः- प्रमाणान्तरसामान्यस्थितिरन्यधियो गतेः । प्रमाणान्तरसद्भावः प्रतिषेधाच्च कस्यचिदिति ॥ पराक्रान्तञ्चात्र सूरिभिरिति ग्रन्थभूयस्त्वभयादुपरम्यते॥८॥ 'किञ्चेति'-दूरसे नदी आदिमें जलको देखकर यह जल है ऐसा प्रत्यक्ष ज्ञान प्रमाण । अन्यत्र दृष्ट जलके सजातीय होनेसे एवं मृगतृष्णादिमे जल प्रत्यक्षज्ञान अप्रमाण

( १६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ बौद्ध- ह अर्थात् प्रमाणाभास है। इस भाँति कहकर स्वयं स्वभावानुमानको स्वीकार कर लिया। एव अन्यदीय विरुद्धाभिप्राय वचनरूप हेतुसे अवगत होता है, इस प्रकार कहकर कार्यमे कारणका अनुमान भी मानलिया, अनुपलब्धि हेतुसे घटादि वस्तुका प्रतिषेध करनेसे अनुपलब्धिलिङ्गक अनुमानको भी स्वीकार ही किया । उक्त तीनो अनुमानोको सङ्ग्रह करके कहते हैं। 'तथा चोक्तमित्यादि'। प्रमाणान्तर सामान्यपरसे प्रलय प्रमाद तदभाव व्यवस्थापनरूप स्वभावानुमान “अन्यधिय. गते” इन शब्दोस् कार्यलिङ्गरूक अनुमान् अवशिष्टसे अनुपलब्धिलिङ्गक अनुमान हो गये हैं ॥ ८ ॥ ते च बौद्धाश्चतुर्विधया भावनया परमपुरुषार्थं कथयन्ति । ते च माध्यमिकयोगाचारसौत्रान्तिकवैभाषिकसञ्ज्ञाभिः प्रसिद्धाः बौद्धा यथाक्रमं सर्व्वशून्यत्वबाह्यशून्यत्वबाह्यार्थानुमेयत्वबाह्या- र्थप्रत्यक्षत्ववादानातिष्ठन्ते ॥ ९ ॥ दूरसे नदी आदि जल्को देखकर यह जल है, ऐसा प्रत्यक्ष ज्ञान प्रमाण है अन्यत्र दृष्ट जलके सजातीय होनेसे एव मृगतृष्णादिमे जल प्रत्यक्षज्ञान अप्रमाण है अर्थात् प्रमाणाभास है। इस भाँति कहकर स्वयं स्वभावानुमानको स्वीकार किया यहा तक बौद्धोने चार्वाक मतको सयुक्ति खण्डन किया । आगे स्वसिद्धान्त कहते है बौद्ध वक्ष्य माण चारप्रकारकी भावनासे ही परम पुरुषार्थ मानते हे ये माध्यमिक योगाचार, सौत्रा न्तिक और वैभाषिक भेदसे चार प्रसिद्ध है । माध्यमिक बाह्याभ्यन्तर समस्त वस्तुको शून्य मानते है । योगाचार बाह्यवस्तुको शून्य मानते है । सौत्रान्तिक बाह्यवस्तुको अनुमेय मानते हैं और वैभाषिक लोग बाह्यवस्तुको प्रत्यक्ष कहते हैं। मा यमिकादिसञ्ज्ञा का निमित्त आगे चलकर स्पष्ट होगा ॥ ९ ॥ यद्यपि भगवान् बुद्ध एक एव बोधयिता तथापि बोद्धव्यानां बुद्धिभेदाच्चातुर्विध्यं यथा तोऽस्तमर्क इत्युक्ते जारचौरानूचा-

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( १७ ) सर्व्वं क्षणिकं क्षणिकं दुःखं दुखं स्वलक्षणं स्वलक्षणं शून्यं शून्यमिति भावनाचतुष्टयमुपदिष्टं द्रष्टव्यम् ॥ ११ ॥ "भावनाका आकार" समस्त वस्तु क्षणिक है क्षणिक हैं-१-समस्त वस्तु दुःखात्मक हैं-२- क्षणिक होनेके कारण अन्यवस्तुका सादृश्य न होसकनेसे स्वलक्षण-स्वलक्षण -३- समस्त वस्तु शून्य है शून्य है ४ यही भावनाचतुष्टय है ॥ ११ ॥ तत्र क्षणिकत्वं नीलादिक्षणानां सत्त्वेनानुमातव्यं यत् सत् तत् क्षणिकं यथा जलधरपटल सन्तश्चामी भावा इति ॥ १२ ॥ क्षणिकत्व साधन युक्ति कहते हैं "तत्रेत्यादि" नीलादिवस्तुके क्षणिकत्वका सत्वरूप हेतुसे अनुमान किया जाता है *। क्षणिकत्व साधक अनुमान-यत् सत् (जो सत् है) तत् क्षणिकम् ( वह क्षणिक है ) यथा जलधर पटल ( जिसप्रकार मेघमडल नीलादि भाव भी सत् है अतः वह भी क्षणिक है-जहा जहा सत्व है वहा सर्वत्र क्षणिकत्व है यही व्याप्ति हुई बौद्धमतमें अनुमानके उदाहरण उपनय दो अवयव हैं। जलधरपटल पर्यन्त व्याप्तिप्रति पादक उदाहरण है, सन्तश्चामीभावाः पक्षधर्मता प्रतिपादक उपनय है ॥ १२ ॥ न चायमसिद्धो हेतुः, अर्थक्रियाकारित्वलक्षणस्य सत्त्वस्य नीला- दिक्षणानां प्रत्यक्षसिद्धत्वात् । व्यापकव्यावृत्त्या व्याप्यव्यावृत्ति- न्यायेन व्यापकक्रमाक्रमव्यावृत्तावक्षणिकत् सत्त्वाव्यावृत्तेः सिद्धत्वाच्च । तच्चार्थक्रियाकारित्व क्रमाक्रमाभ्यां व्याप्तं न च क्रमाक्रमाभ्यामन्यः प्रकारः समस्ति । "परस्परविरोधे हि न प्रकारन्तरस्थिति । नैकतापि विरुद्धानामुक्तमात्रविरोधतः" इति न्यायेन व्याघातस्योद्भटत्वात् ॥ १३ ॥ यदि कहो हेतुका पक्षवृत्तित्त्व न होनेसे आश्रयासिद्धरूप हेत्वाभास होता है सो यहा पर भी घटादि पक्षमें सत्वरूप हेतुका आश्रयासिद्ध होगा, यह भी नहीं क्यों कि अर्थ- क्रियाकारित्व ही सत्व है अर्थ प्रयोजन तद्रूपा क्रिया अर्थक्रिया प्रयोजनीक्रियाकारि त्व किञ्चित्करत्वमिति यावत् एतादृशसत्व नीलादि क्षणमें प्रत्यक्ष सिद्ध है। व्यापकके न रहनेसे व्याप्य भी नही रहता ऐसा नियम है जैसे वह्निके न रहनेसे

  • कोई कोई ऐसे भी कहते हैं कि बौद्धके मतमें काल अतिरिक्त पदाथ नहीं है क्षण्यते दीस्यते इस व्युत्प त्तिस-लब्ध जो क्षण है उसके साथ नीलादिको कर्मधारय समास करनेसे नीलादिरूपक्षण यही अर्थ होता है क्षणिक-व्यवहार राहो शिर नीलापुनरा शरीर इत्यादिद्वत् है। "अविरुद्ध है या नहीं इसका' निर्णय उद्धीके ग्रन्थसे ही हो सकता है। २

( १८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ बौद्ध धूम भी नहीं रहता सत्त्वका व्यापक क्रम और अक्रम है यह क्षणिक ही म सम्भव है अतः व्यापक क्रमाक्रम अक्षणिकसे (स्थिरसे) व्यावृत होनेसे उसका व्याप्य सत्त्व भी अक्ष- णिकसे व्यावृत होता है। अर्थक्रियाकारित्वरूप सत्त्व क्रम (पर्याय) अक्रम (युग पत्) से व्याप्त है अर्थात् क्रमाक्रमसत्त्वका व्यापक है। अर्थ क्रियाकारित्व (किञ्चि- त्करत्व) के लिये क्रम अक्रम दोनोंको छोडकर तीसरा मार्ग ही नहीं। क्रमके विरुद्ध है अक्रम और अक्रमके विरुद्ध है क्रम इन दोनोंसे परस्परविरुद्ध प्रकारान्तर नहीं हो सकता। क्रमाक्रम जो विरुद्ध है उसका एकत्र भी नहीं हो सकता। क्योंकि यह वचनसे ही विरुद्ध है उक्तयुक्तिसे व्याहति भी स्पष्ट है ॥ १३ ॥ तौ च क्रमाक्रमौ स्थायिनः सकाशाद्व्यावर्त्तमानौ अर्थक्रिया- मपि व्यावर्तयन्तौ क्षणिकत्वपक्ष एव सत्त्वं व्यवस्थापयत इति सिद्धम् ॥ १४ ॥ उक्त क्रमाक्रम अक्षणिकमें असम्भव होनेसे स्थायीसे स्वयं व्यावृत होते हुए व्याप्य भूत अर्थक्रियाको भी व्यावृत्ति कराकर क्षणिकपक्षमें सत्त्वको व्यवस्थित करते हैं ॥१४॥ नन्वक्षणिकस्यार्थक्रियाकारित्वं किं न स्यादिति चेत् तदयुक्तं विकल्पासहत्वात् । तथा हि-वर्त्तमानार्थक्रियाकरणकाले अती- तानागतयो * किमर्थकियोः स्थायिनः सामर्थ्यमस्ति नो वा ? आद्ये तयोर्निराकरणप्रसङ्गः, समर्थस्य क्षेपायोगात्। यत् यदा यत्करणसमर्थं तत् तदा तत् करोत्येव यथा सामग्री स्वकार्ये समर्थश्चायं भाव इति प्रसङ्गानुमानाच्च । द्वितीयेऽपि कदापि न कुर्यात् सामर्थ्यमात्रानुबन्धित्वादर्थक्रियाकारित्वस्य यत् यदा यन्न करोति तत् तदा तत्रासमर्थं यथा हि शिलाशकल-

  • यहां पर तात्पर्य यह है कि कुसूल (बखार) स्थबीजसे अङ्कुर उत्पन्न नहीं होता, क्षेत्रस्थ बीजसे उत्त होता है । अब दोनों स्थानका बीज एक होता तो कुसूलमें भी अङ्कुर अवश्य उत्पन्न होता परन्तु ऐसा ही नहीं अतः क्षेत्रस्थावस्थामें पूर्व (कुसूलस्थ) बीज नष्ट होकर बीजान्तर उत्पन्न होगया ऐसा अवश्य मानना होगा एव-घटादिक भी वर्तमान क्षणमें अतीत अनागत काय्र्यक्रियाको नहीं करता अतः तीत अनागत क्ष क्रिया सामर्थ्य उसमें नहीं है ऐसा कहना होगा यह क्षणिकपक्ष माने बिना नहीं हो सकता क्योंकि बौद्ध मत में कार्य्य और सत्ता सब एक है सामर्थ्याभावमें सत्ताका भी अभाव है युगपत् सर्वक्रिया उत्पादन पक्षमें १ ला क्षणमें समस्त क्रिया करनेसे "कृतस्य करणमाम्नीति' न्यायसे द्वि-तीयादिक्षणमें अर्थक्रियाकारित्व का गन्ध भी नहीं रहेगा। एक क्षणिक क्षणमात्रवृत्ति है अर्थात् अनेक क्षणमें शक्ति होकर काय्र्यवृत्ति हो

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १९ ) मंकरे । न चैष वर्त्तमानार्थक्रियाकरणकाले वृत्तवर्त्तिष्यमाणे अर्थक्रिये करोतीति तद्विपर्ययाच्च ॥ १५ ॥ शङ्का-अक्षणिक (स्थिरको) अर्थक्रियाकारित्व क्यों नहीं हो सकता है । उत्तर- स्थिर पदार्थ वर्त्तमानकालमें जो कार्य करता है उस कालमें अतीत और अनागत कार्य करनेका उस पदार्थको सामर्थ्य है या नहीं ? यदि है तो उसका त्याग करना असम्भव होगा अर्थात् वर्त्तमान अर्थक्रियाकरण समयमें ही भूत भविष्य अर्थक्रिया भी होने लगेगी परन्तु ऐसा होता नहीं । यह नियम है कि जो वस्तु जिस समय जिस कार्यके करनेमें समर्थ है वह उसकालमें उसकार्यको करता है जिस प्रकार सामग्री (दण्ड चक्रादि) अपना कार्य (घटादि) को उत्पन्न करते हैं यदि कहो समर्थ नहीं तो पुनः कदापि उस कार्यको नहीं कर सकेगा, सामर्थ्यके आधीन ही कार्य होता है ॥ जो जिस समयमें जिस कार्यको नहीं कर सकता । वह उसमें उस समय असमर्थ है जिस प्रकार पाषाणखण्ड अङ्कुरको नहीं कर सकता यह भी (स्थायित्वेनाभिमत) वर्तमान अर्थक्रियाके उत्पा- दन समयमें अतीतानागत अर्थक्रिया (प्रयोजनीभूतकार्य) नहीं करता है ऐसा अन्वय व्यतिरेक दोनों होते हैं ॥ १५ ॥ ननु क्रमवत् सहकारिलाभात् स्थायिनः अतीतानागतयो- क्रमेण क्रमणमुपपद्यते इति चेत् तत्रेदं भवान् पृष्टो व्याचष्टां सह- कारिणः किं भावस्योपकुर्व्वन्ति न वा ? न चेत् नापेक्षणीयास्ते अकिञ्चित्कुर्व्वतां तेषां तादर्थ्यायोगात् । उपकारकत्वपक्षे सोऽ- यमुपकारः किं भावादभिद्यते न वा ? भेदपक्षे आगन्तुकस्यैव तस्य कारणत्वं स्यात् न भावस्याक्षणिकस्य आगन्तुकातिशया- न्वयव्यतिरेकानुविधायित्वात् कार्य्यस्य ॥ १६ ॥ यदि कहो सहकारी कारणकी उपलब्धि क्रमसे होती है अतः वस्तु स्थिर होनेपर भी क्रमसे ही अर्थक्रियाका सम्पादन करेगी क्योंकि सहकारी कारणके विना कार्य नहीं हो सकता । प्रथम इसका उत्तर दो क्या सहकारी कारण भाव अर्थात् प्रधानकारणका कोई उपकार करता है या नहीं? उपकार नहीं करता हो तो? अकिञ्चित्कर होनेसे उसकी अपेक्षा ही व्यर्थ होगी । यदि कहो उपकार करता है तो क्या वह उपकार (शक्ति) स्थिर पदार्थसे भिन्न है या अभिन्न ? भिन्न मानो तो सहकारीसे आया हुआ उपकार (शक्ति) अर्थ क्रियाका कारण हुआ न कि अक्षणिक पदार्थ कारण हुआ आगन्तुक अतिशयके रहनेसे कार्य होता है उसके न रहनेसे नहीं होता है इसप्रकार आगन्तुक अतिशयके अन्वय व्यतिरेकाधीन कार्य हुआ ॥ १६ ॥

( २० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ बौद्ध- तदुक्तम्- "वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्म्मण्यस्ति तयोः फलम् । चर्मोपमश्चेत् सोऽनित्यः खतुल्यश्चेदसत्फलः" इति ॥ १७ ॥ उसी को कहते हैं- "वर्षातपाभ्यामित्यादि" वर्षाका फल है आर्द्र करना आतपका फल है शुष्क करना यह दोनो निर्विकार ( नित्य ) आकाशमें नहीं हो सकते आकाश न भी- जता है न सूखता है उक्त दोनों फल चर्मम होते हैं क्योंकि यह विकारी है । इस प्रकार वस्तुको चर्मके समान मानो तो विकारी होनेसे अनित्य हो जायगा । आकाशके समान निर्विकार मानो तो सहकारी भी निष्फल हो जायगा ॥ १७ ॥ अथ भावस्तै सहकारिभिः सहैव कार्यं करोतीति स्वभाव इति चेत् अस्तु तर्हि सहकारिणो न जह्यात् प्रत्युत पलायमाना- नपि गले पाशेन बद्ध्वा कृत्य कार्यं कुर्यात् स्वभावस्यान- पायात् । किञ्च सहकारिजन्योऽतिशयः किमतिशयान्तरमार- भते न वा ? उभयथापि प्रागुक्तदूषणपाषाणवर्षणप्रसङ्गः ॥१८॥ यदि कहो वस्तुका स्वभाव ही ऐसा है जो सहकारीके साथ ही कार्य करता है हे आयुष्मन् ! फिर तो सहकारीको छोडगा ही नहीं प्रत्युत भागता हो तो गलेमें रस्सी बाधकर कार्य करावेगा । क्योकि स्वभावका त्याग नहीं होता है स्वभावनाश होनेसे स्वरूप का भी नाश होगा । और भी दूषण देते हैं- "किञ्चेति" क्या सहकारीसे उत्पन्न अतिशय अतिश- यान्तरको उत्पादन करता है या नहीं ? दोनों पक्षमें उपकारकत्व पक्षम उक्त दूषणपाषाणकी महावृष्टि होगी । अर्थात् यदि अतिशयको न आरम्भ करे तो अकिञ्चित्कर होगा यदि अतिशयान्तरको आरम्भ करे तो क्या वह अतिशय पूर्व अतिशयसे भिन्न है या अभिन्न ? भेदपक्षमें पूर्वातिशय व्यर्थ है इत्यादि अभेदपक्षमे दूषण आगे चलकर मिलेगा ॥१८॥ अतिशयान्तरारम्भपक्षे बहुमुखानवस्थादौस्थ्यमपि स्यात् । अतिशये जनयितव्ये सहकार्यन्तरापेक्षायां तत्परम्परापात इत्येकानवस्था आस्थेया । तथाहि-सहकारिभिः सलिलपवना- दिभि पदार्थसार्थैराधीयमाने बीजस्यातिशये बीजमुत्पादक- मभ्युपेयम् । अपरथा तदभावेऽप्यतिशयः प्रादुर्भवेत् बीजञ्चाति- शयमादधान सहकारिसापेक्षमेवाधत्ते । अन्यथा सर्वदोपकारा- पत्तौ अङ्कुरस्यापि सदोदयः प्रसज्येत । तस्मादतिशयार्थमपे- क्षमाणैः सहकारिभिरतिशयान्तरमाधेय बीजे तस्मिन्नप्युपकारे

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २१ ) पूर्व्वन्यायेन सहकारिसापेक्षस्य बीजस्य जनकत्वे सहकारि- सम्पाद्यबीजगतातिशयानवस्था प्रथमा व्यवस्थिता ॥ १९ ॥ अतिशयान्तरारम्भपक्षमे अनेक प्रकारकी अनवस्था भी है । अतिशयको उत्पन्न करनेके लिये पूर्व्यापेक्षा अन्य सहकारीकी अपेक्षा होगी उससे उत्पन्न दूसरा अतिशय पुनः तीसरे अतिशयको आरम्भ करेगा उसके लिये पुनः तीसरे सहकारीकी अपेक्षा इस क्रम से परम्परा बढती जायगी । यह एक प्रकारकी अनवस्था हुई । यथा अंकुरके लिये बीज कारण है क्षिति जल पवनादि सहकारी है तादृश सहकारी सम्मिलित होनेसे बीजमे जो अतिशय उत्पन्न होता है उसके लिये बीजको कारण मानना होगा । नहीं तो बीज न रहनेपर भी केवल सहकारीसे अतिशय उत्पन्न होने लगेगा, अतिशयको बीज धारण करता है परन्तु सहकारीके विना नहीं धारण कर सकता अतः सहकारीकी अपेक्षा होगी, नही तो उपकार ( अतिशय ) सदा बने रहनेसे अंकुर भी सदा उत्पन्न होने लगेगा ॥ अतः अतिशयके लिये अपेक्षित सहकारीसे बीजमे अतिशयान्तर अवश्य मानना होगा । उस अतिशयमे भी पुनः सहकारीकी अपेक्षा और बीजकी अपेक्षा एव क्रमसे सहकारी से सम्पाद्य बीजगत अतिशयकी अनवस्थारूप प्रथम अनवस्था हुई ॥ १९ ॥ अथोपकारः कार्यार्थमपेक्षमाणोऽपि बीजादिनिरपेक्ष कार्य्यं जनयति तत्सापेक्षो वा ? प्रथमे बीजादेरहेतुत्वमापतेत् । द्वितीये अपेक्ष्यमाणेन बीजादिना उपकारे अतिशय आधेय एव तत्र तत्रापीति बीजादिजन्यातिशयनिष्ठातिशयपरम्परापात इति द्वितीयानवस्था स्थिरा भवेत् । एवमपेक्ष्यमाणेनोपकारेण बीजा- द्वैर्धर्मिण्युपकारान्तरमाधेयमित्युपकाराधेयबीजातिशयाश्रया- तिशयपरम्परापात इति तृतीयानवस्था दुरवस्था स्यात् ॥२०॥ अंकुरादि कार्य्यके लिये अपेक्षित उपकार ( अतिशय ) क्या बीजादिके निर १ होकर स्वयं अंकुरादिको उत्पन्न करता है या बीजादिके सापेक्ष होकर करता है निरपेक्ष ने तो बीजादिका कारण न होनेसे व्यर्थ हो जायेंगे । सापेक्ष कहे तो अपेक्षित बीजादि उपकारमे अतिशय आधान करेगा । उनमें पुनः अतिशयान्तर उत्पन्न होगा उसके ये बीजान्तरकी अपेक्षा होगी । पुनरपि एव इस क्रमसे बीजादिसे जायमान जो अतिशय समे पुनः अतिशय कर उसमें भी अतिशय इत्यादि दूसरी अनवस्था भी स्थिर होगी । सी प्रकार अपेक्षित उपकारसे बीजादि धर्मी ( आश्रयमे ) भी उपकारान्तर मानना

'( २४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ बौद्ध-

अतीतानागत प्रयोजन क्रियाके लिये असमर्थ है, वही प्रसङ्ग है । जो पदार्थ ( बीजा दि ) जिस कालमें जिस कार्यको करता है वह उस कार्यम समर्थ है । जिस प्रकार जल पवनादि सामग्री स्वकार्योत्पादनमें समर्थ है । अतीतअनागत कालम यह भी बीजादि तत्तत्कालवर्त्ती अर्थक्रियाको उत्पादन करते हैं । यही प्रसङ्गव्यत्यय अर्थात् प्रसङ्गाभाव रूप विपर्यय है । अतः विपक्ष ( स्थिरपक्ष ) में क्रम यौगपद्य न होनेसे व्यापकाभावसे गृहीत व्यतिरेकव्याप्ति प्रसङ्ग तद्विपर्ययमे गृहीत अन्वयव्याप्तिका जो सत्त्व है वह क्षणि कत्व पक्षमें ही उपपन्न होता है यह सिद्ध हुआ ॥ २३ ॥

  • तदुक्तं ज्ञानश्रिया- " यत्सत्तत्क्षणिकं यथा जलधरः सन्तश्च भावा अमी सत्ता शक्तिरिहार्थकर्मणि मितेः सिद्धेषु सिद्धा न सा ॥ नाप्येकैव विधान्यथा परकृतेनापि क्रियादिर्भवेद् द्वेधापिक्षणभङ्गसङ्गतिरतः साध्ये च विश्राम्यति" इति ॥ २४॥ ज्ञानश्रीनामक बौद्धोंके आचार्यने कहा है । जो वस्तु सत् है वह क्षणिक है जिस प्रकार जलधर । घटादि भाव भी सत् है अतः वह भी क्षणिक होगा । सत्तारूप जो शक्ति है वह अर्थक्रियाकारित्व है । यह मिति-( प्रमाण ) से सिद्ध होता है । वह शक्ति सिद्ध अर्थात् ( स्थिर ) पदार्थ में सिद्ध नही होसकती । "नाप्येकैवेति" अक्षणिकसे कार्योंत्पत्तिमें एक ही प्रकार नहीं किन्तु क्रम और अक्रम दो प्रकार है। अन्यथा अन्यकी कृतिसे अन्यमें क्रिया दर्शनस्पर्शनादि होने लगेगा। क्रम अक्रम दोनों पक्षमें क्षण भङ्गत्व सिद्ध होते हैं* ॥ २४ ॥ न च कणभक्षाक्षचरणादिपक्षकक्षीकारेण सत्तासामान्ययोगि- त्वमेव सत्त्वमिति मन्तव्यं सामान्यविशेषसमवायानामसत्त्व- प्रसङ्गात् ॥ २५ ॥ आगे सामान्यखण्डनका उपक्रम करते ह-"नच कणभक्षेति'। कणभक्ष-औलूक्य है यह बाल्यावस्थाम कपोत वृत्तिको धारणकर मार्गम गिरे हुए अन्नके कणोंको बीनकर
  • यदि कोई शङ्का करे कुशूलादिमें एवं अङ्कुरादिमें प्रयोजनरूप क्रियाजनकत्व है क्योंकि कुशूल घटादि कार्यको करता है बीजादि अङ्कुरादि कार्यको करता है परन्तु घटादिम अर्थक्रियाकारित्व क्या है ? तिसका उत्तर-घटादिमें भी जलहरणादि प्रधानक्रियानिर्वाहकत्व है अतएव विषयता सम्बन्धसे ज्ञानक्रिया कारित्व सर्वत्र है। यह भी समझना आवश्यक है कि शास्त्रकृत् लोग शास्त्रविचारके समय किसी वस्तुका देना होता है तब घटपटादि वस्तुका नाम लेते हैं-परन्तु प्राचीनलोग ऐस समयपर नीलपीतादिका नाम लेते
  • यह नीलादि वर्णवाची नही किन्तु घटादि वस्तुमात्रका उपलक्षण है ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( २५ ) निर्वाह करते रहे अतः उनका नाम कणाद (कणभक्ष) हुआ। उलूक ऋषिके अपत्य (पुत्र) होनेसे औलूक्य नाम हुआ। उनका शास्त्र वैशेषिक है। अक्षपाद गौतम हैं। इनका न्यायशास्त्र है। इनके मतमें व्यक्तिसे अतिरिक्त सामान्य (जाति) एक पदार्थ है- उस सामान्यमें दो भेद हैं, पर और अपर। द्रव्य गुण, कर्म, इन तीनोंमें रहनेवाला परसा- मान्य है उसीको सत्ता सामान्य कहते हैं। तथा च तादृशसत्ता सामान्यवत्त्व ही सत्त्व है- अर्थ क्रियाकारित्व सत्त्व नहीं ऐसा नहीं मान सकते सामान्य, विशेष, समवायपर सामान्य न होनेसे उनका असत्त्वप्रसग होगा। कहा भी है-"सामान्यपरहीनास्तु सर्वे जात्यादयो मता" इति-॥ २६ ॥ न च तत्र स्वरूपसत्तानिबन्धनः सव्यवहारः, प्रयोजकगौरवा- पत्तेः, अनुगतत्वाननुगतत्वविकल्पपराहतैश्च, सर्षपमहीधरा- दिषु विलक्षणेषु क्षणेष्वनुगतस्याकारस्य मणिषु सूत्रवद् भूतग- णेषु गुणवच्चाप्रतिभासनाच्च ॥ २६ ॥ यदि कहो उसमें सद् व्यवहार स्वरूपसत्ता (विद्यमानता) मूलक है जातिमूलक नहीं तो कही २ सद्व्यवहार प्रयोजिकासत्तासामान्य, कहीं २ स्वरूपसत्ता होगी तो भिन्नभिन्न प्रयोजक कल्पनाका गौरव होगा। कहा कहा अनुगत है कहा अननुगत है यह व्यवस्था भी न होगी। जिस प्रकार नाना पुष्परचित मालाके अन्तर्गत प्रत्येक पुष्पो सें सूत्र प्रविष्ट रहता है, जिस प्रकार पृथिव्यादि द्रव्योंमें गुण विद्यमान रहता है, तिसी प्रकार पर्वत सर्षपादि विलक्षण वस्तुओंम अनुगत सामान्यका प्रतिभास (प्रत्यक्ष) भी नहीं होता ॥ २६ ॥ किञ्च सामान्यं सर्वगतं स्वाश्रयसर्वगतं वा ? प्रथमे सर्ववस्तुसं- करप्रसङ्गः, अपसिद्धान्तापत्तिश्च । यतः प्रोक्त प्रशस्तपादेन-स्व विषयसर्वगतमिति। किञ्च विद्यमाने घटे वर्त्तमानं सामान्यमन्यत्र जायमानेन सम्बध्यमान तस्मादागच्छत्सम्बध्यते अनागच्छ- द्वा ? आद्ये द्रव्यत्वापत्तिः। द्वितीये सम्बन्धानुपपत्तिः। किञ्च वि- नष्टे घटे सामान्यमवतिष्ठते विनश्यति स्थानान्तरं गच्छति- वा ? प्रथमे निराधारत्वापत्तिः, द्वितीये नित्यत्ववाचोयुक्त्ययुक्तिः, तृतीये द्रव्यत्वप्रसक्तिः, इत्यादि दूषणग्रस्तत्वात् सामान्य- मप्रमाणिकम् ॥ २७ ॥

२. बौद्ध दर्शन (माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक, वैभाषिक)

( २६ ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ बौद्ध- दूषणान्तर भी देते हैं "किञ्चेति"-क्या सामान्यको सर्वगत अर्थात् सर्वत्र व्याप्त मानते हो या सामान्यका आश्रय यावत् व्यक्ति गत मानते हो? सर्वगत मानो तो घटमें भी पटत्वादि सामान्य रहेगा और पटमें घटत्वादि सामान्य रहेगा अतः समस्त वस्तुओंमें समस्त सामान्य रहनेसे साङ्कर्य दोष हो जायगा और सिद्धान्तकी हानि भी होगी। क्यों कि प्रशस्तपादाचार्यने स्वाश्रयत्वेन विवक्षित यावत् व्यक्तिगत माना है। अब दूसरे पक्षका खण्डन करते हैं "किञ्चेत्यादि"-एक घट मथुरामें विद्यमान है उसमें विद्यमान जो सामान्य है वह कालान्तरमे वृन्दावनमे उत्पन्न होनेवाले घटके साथ मथुरासे आकर सम्बद्ध होता है या वही रहकर सम्बद्ध होता है? आकरके संबद्ध होता है ऐसा कहो तो चलनक्रियाके आश्रय होनेसे द्रव्यत्व प्रसङ्ग होगा । क्रिया केवल द्रव्यहीमें रहती है अतएव "गुणादिर्निर्गुणक्रियः" इति । गुणक्रिया सामान्यादिको निर्गुणत्व और निष्क्रियत्व कहा है। यदि नहीं आता हो तो देशभेद होनेसे परस्पर सम्बन्ध नहीं होसकेगा। और भी जब घट नष्ट होता है तब उस घटमे रहनेवाला सामान्य वही रहजाता है या दूसरी जगह चला जाता है अथवा नष्ट होजाता है ? प्रथम पक्षमे निराश्रय होगा । द्वितीय पक्षमे पूर्ववत् द्रव्यत्व प्रसङ्ग होगा । तृतीय पक्षमें अनित्यत्व प्रसङ्ग होगा । इत्यादि दूषण जालमें पतित होनेसे सामान्य कल्पना अप्रामाणिक है ॥ २७ ॥

  • तदुक्तम्- "अन्यत्र वर्त्तमानस्य ततोऽन्यस्थानजन्मनि । तस्मादचलतः स्थानाद्वृत्तिरितियुक्तता ॥ यत्रासौ वर्त्तते भावस्तेन सम्बध्यते न तु । तद्देशिनश्च व्याप्नोति किमप्येतन्महाद्भुतम् ॥ न याति न च तत्रासीदस्ति पश्चान्न चांशवत् । जहाति पूर्वं नाधारमहो व्यसनसन्ततिः" इति ॥ अनुवृत्तप्रत्ययः किमालम्बन इति चेत् अङ्ग! अन्यापोहा- लम्बन एवेति सन्तोष्टव्यमायुष्मतेत्यलमतिप्रसङ्गेन ॥२८ [*] पूर्वोक्त अर्थको श्लोकरूपमें सप्रद् करके कहते हैं -“ अन्यत्रेत्यादि ” विद्यमान घटमें घटत्वरूप सामान्य मथुरासे चले विना पाटलिपुत्र में उत्पन्न घ होगा यहा बड़ी विलक्षण युक्ति है। एक ही घरमें ५ । १० घट हैं बीच बीचमे वस्तु भी हैं परन्तु घटत्वरूप सामान्य एक होकर सब घटोंमें व्याप्त रहता है मध्यमें वर्तमान दूसरे वस्तुओंम नहीं रहता यह भी बडे अचरजकी बात है ।