सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(६) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ चार्वाक-
पगतमनुमानप्रामाण्यवादिभिः व्याप्तिश्चोभयनिधोपाधिविधुरः सम्बंधः । स च स्वसत्तया चक्षुरादिवन्नांगभाव भजते किन्तु ज्ञा- ततया । कः खलु ज्ञानोपायो भवेत् । न तावत् प्रत्यक्षम् तच्च बाह्यमान्तर वाभिमतम्। न प्रथमः । तस्य सम्प्रयुक्तविषयज्ञानज- नकत्वेन विद्यमाने प्रसगसम्भवेपि भूतभविष्यतोस्तदसम्भ- वेन सर्वोपसंहारवत्याप्तेर्दुर्ज्ञानत्वात् । न च व्याप्तिज्ञान सा- मान्यगोचरमिति मन्तव्य, व्यक्त्योरविनाभावाभावप्रसगात्॥१२॥ “स्यादेतत् इति” यह मनोरथ तन सिद्ध हो जन अनुमानादिका प्रामाण्य ही न हो किंतु अनुमानका प्रामाण्य अवश्य मानना होगा, अन्यथा धूम देखकर धूमध्वज अग्निके विषयमे बुद्धिमानोकी प्रवृत्ति कैसे हो सकती है । एव शब्द प्रमाणन माननेमे नदीके किनारे पाँच फल हैं इस वाक्यको सुनकर फलार्थियों की फलाहरणप्रवृत्ति भी कैसे होगी । यह भी मनोराज्यमान है । क्योकि व्याप्तिप्रकारक पक्षधर्मताशाली लिङ्गज्ञानको अनुमितिके प्रति कारण अनुमान प्रामाण्यवादियोने माना है यथा जहार अग्नि है वहार धूम है यह व्याप्ति हे वह्रिव्याप्य धूम, यह व्याप्तिप्रकारक ज्ञान है । वह्नि व्याप्य धूमवान् पर्वत यह व्याप्तिप्रकारक पक्षधर्मताज्ञान है इसीको परामर्श भी कहते हैं ॥ अनन्तर “पर्वतो वह्निमान् धूमात्” ऐसी अनुमिति होती है। शङ्केत निश्चित भेदसे द्विविध उपाधिरहित सम्बन्ध व्याप्ति है । वह सम्बन्ध चक्षुगादिके समान स्वसत्तामात्रसे। कार्यसाधक नही होता किन्तु ज्ञात होनेमे हाता है । व्याप्तिज्ञानका उपाय प्रत्यक्ष हो ही नही सकता क्या कि बाह्य और आन्तर (मानस) भेदस प्रत्यक्ष दो प्रकारका चक्षुरादि बहिरिन्द्रियज य प्रत्यक्ष बाह्य है वह विषयन्द्रिय सयोगसे होता है । विद्य मान (धूम वह्न्यादे) विषय क साथ इन्द्रियसम्बन्ध होनेपर भी भूत भविष्यत् के साथ सम्बन्धका असम्भव होनेसे निखिल वह्नि धूमका अव्यभिचरित व्याप्तिग्रह दुर्ज्ञेय होगा ॥ यदि कहो निखिल धूम वह्निका प्रत्यक्ष न होनेपर भी धूमादिवृत्ति धूमत्वादि एक सामान्यद्वारा सम्बन्ध (व्याप्ति) ज्ञानका सम्भव होगा यह भी नहीं क्योंकि सामान्यत्व धूमत्व वह्नित्वका व्याप्तिग्रह अर्थात् धूमत्ववह्नित्व- का अविनाभाव (व्याप्ति) गृहीत होनेपर भी व्यक्ति (धूम अग्नि) की व्याप्तिग्रहका अभाव प्रसङ्ग होगा ॥ १२ ॥ नापि चरमः । अन्तःकरणस्य बहिरिन्द्रियतन्त्रत्वेन बा- ऽर्थे स्वातन्त्र्येण प्रवृत्त्यनुपपत्तेः ॥ तदुक्तम्- 'चक्षुर युक्तविषय परतन्त्र वहिर्मन इति ॥ १३ ॥ १ 'पर्वत अग्निवाला है कार्ने धूम होनेसे'