भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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शुभ काययोग हे सत्यभाषण मितभाषण हितभाषणाद शुभ वाग्योग हे उक्त आस्रव भेद प्रभेदरूप योगको शुभ. पापस्येत्यादि सूत्रसंदर्भमे सविस्तर सूत्रवृत्तिकारने निरू- पण किया है । आस्रवशब्दके व्याख्यानम मतान्तर कहते हैं ( अपगेत्यादि ) पुरुषको चञ्चल करनेवाली विषयेन्द्रियवृत्ति आस्रव हे पुरुषज्योति सम्बन्धी इन्द्रियद्वारा नि कलकर विषयाकारसे जो परिणत होती है वही आस्रव हे ॥ ३५ ॥ मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषायवशाद्योगवशाच्चात्मा सूक्ष्मैक- क्षेत्रावगाहिनामनन्तानन्तप्रदेशानां पुद्गलानां कर्मबन्धयोग्याना- मादानमुपश्लेषण यत् करोति स बन्ध । तदुक्तं, सकषायत्वा ज्जीव कर्मभावयोग्यान् पुद्गलानादत्ते स बन्ध इति तत्र कषाय ग्रहणं सर्वबन्धहेतूपलक्षणार्थम् । बन्धहेतून पपाठ वाचका- चार्य्य. । मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाया बन्धहेतव इति । मिथ्यादर्शनं द्विविधं मिथ्याकर्मोदयात् परोपदेशानपेक्षं तत्त्वा- श्रद्धानं नैसर्गिकमेकम् अपरं परोपदेशजम् पृथिव्यादिषड्घा- पादकं षडिन्द्रियासंयमनं च अविरति । पञ्चसमितिगुप्ति- ष्वनुत्साह प्रमा द । कषायःक्रोधादि । तत्र कषायान्ता- स्थित्यनुभावबन्धहेतव प्रकृतिप्रदेशबन्धहेतुर्योग इति विभाग ॥ ३६ ॥ वन्धनिरूपणम्-मिथ्यादर्शनादिवश आत्मांका सूक्ष्मक्षेत्रमें प्रवेश करनेवाले ही अनन्तानन्त प्रदेशयुक्त कर्मबन्धयोग्य पुद्गलके साथमें जो है वही बन्ध है इसमें तत्त्वार्थसूत्र भी प्रमाण देते है( सकषायेति ) कषायग्रहण “मिथ्यादर्शनेत्यादि”सूत्रोक्त बन्धकारणीभूत मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग पांचोंका उपलक्षण है । ग्रन्थकार सूत्रार्थ भी स्वयं कहते हैं ( द्विविधमिति ) मिथ्यादर्शन दो प्रकारके हैं १ नैसर्गिक २ परोपदेशन• परोपदेशके विना मिथ्याक्रमादयसे स्वभाववश जो तत्त्वा र्थमें अश्रद्धा होती है वह नैसगिक हे परोपदेश उत्पन्न तत्त्वार्थमें अश्रद्धा परोपदेशज हे पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, वनस्पतिरूप षड्तत्त्वोंका आपादक छहों इन्द्रियोंका असंयम अविरति हे । ईर्या, भाषा, एषणा, आदान, निक्षेप उत्सर्गरूप पञ्चसमिति गुप्तिसमिति आदिमें अनुत्साहका नाम प्रमाद है । कषायक्रोधादि पूर्वोक्त हैं कषाय-