भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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नम् ] भाषाटीकासमेत । ( ७१ ) सप्ततत्त्ववादीका मतनिरूपण-(केच नेत्यादि)बोधात्मक जीव अबोधात्मक अजीव यह कहचुके हैं । आस्रवनिरूपण-( औदारिकेत्यादि ) तात्पर्य, योगका नाम आस्रव है “ कायवाङ्मनःकर्म योगः” इति सूत्रोक्तप्रकार आत्मप्रदेशका चलन योग है वह शरी- रयोग वाग्योग और मनोयोगभेदसे तीन प्रकार है “ तत्र औदारिकवैक्रियिका- हारकतैजसकार्मणानि शरीराणि ” इस सूत्रोक्त प्रकार उदार अर्थात् स्थूलमे जो हो वह औदारिक और अणिमादि ऐश्वर्यसे अनेक शरीर धारण विक्रिया है विक्रि- याके निमित्त वैक्रियिक इत्यादि सूत्रार्थ है तथा च औदारिकादि सात प्रकारके शरीर चलनसे आत्माका चलन योग है वही आस्रव है जिस प्रकार जलमे प्रवेश होनेके लिये जो मार्ग है वह नदीमे प्राप्त होनेका द्वार होनेसे आस्रव कहाता है तिसी प्रकार योगप्रणालीसे आत्माके कर्मकी गति होनेसे आस्रव भी योग कहाता है ॥ ३४ ॥ यथा आर्द्रं वस्त्रं समन्ताद्वातानीतं रेणुजातमुपादत्ते तथा कषा- यजलार्द्र आत्मा योगानीतं कर्म सर्वप्रदेशैर्गृह्णाति । यथा वा निष्टप्तायःपिण्डे जले क्षिप्ते अम्भः समन्ताद्गृह्णाति तथा कषा- योष्णो जीवो योगानीतं कर्म समन्तादादत्ते । कषति हिनस्त्या- त्मानं कुगतिप्रापणादिति कषायः क्रोधो मानो माया लोभश्च । स द्विविधः शुभाशुभभेदात् । तत्राहिंसादिः शुभः काययोगः सत्यमितहितभाषणादिः शुभो वाग्योग । तदेतदास्रवभेदप्र- भेदजातं कायवाङ्मनः कर्मयोग । स आस्रव शुभ पुण्यस्य अशुभ पापस्येत्यादिना सूत्रसन्दर्भेण ससंरम्भमभाणि। अपरे त्वेवं मेनिरे आस्रवयति पुरुषं विषयेष्विन्द्रियवृत्तिरास्रवः । इन्द्रियद्वारा हि पौरुषं ज्योतिर्विषयानस्पृशद्रूपादिज्ञानरूपेण परिणमित इति ॥ ३५ ॥ बन्धनिरूपण-जिस प्रकार आर्द्र वस्त्रमे हवामे उडी हुई धूली चिपक जातीहै तिसी प्रकार क्रोध मान माया और लोभ रूप कषाय जलसे आर्द्र जो आत्मा वह योगसे प्राप्त क्रियाको चारों ओरसे ग्रहण करता है यथावा तप्त लोहमें निक्षिप्त जलको लोहपिण्ड सर्वात्मना ग्रहण करता है तिसी प्रकार कषायसे तप्त आत्मा योगसे प्राप्त कर्मको सर्वत ग्रहण करता है । कष धातु हिसार्थक होनेसे कषाय जीव- स्वरूपविनाशक अर्थात् बन्धहेतु है । वह कर्म शुभाशुभ भेदसे दो प्रकार है. अहिंसादि