सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(७०) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ आर्हत अतएव पूरयन्ति गलन्ति इस प्रकार पुद्गलकी व्युत्पत्ति होती हे अर्थात् स्कन्धों अलग होजानेसे गलन ( विशीर्ण ) होता हे अणुसंयोगद्वारा स्कन्ध होनेसे पूर होता है ॥ ३२ ॥ तदुक्तं गुणपर्यायवद्द्रव्यमिति । द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणा । यथा जीवस्य ज्ञानत्वादिसामान्यरूपा पुद्गलस्य रूपत्वादिसामान्य- स्वभावा धर्माधर्माकाशकायानां यथासम्भव गतिस्थित्यवगाह- हेतुत्वादिसामान्यानि गुणा । तस्य द्रव्यस्योक्तरूपेण भवनमु- त्पाद तद्भाव परिणाम पर्याय इति पर्याया । यथा जीवस्य घटादि ज्ञानसुखक्लेशादय पुद्गलस्य मृत्पिण्डघटादय धर्मादीनां गत्यादिविशेषा , अतएव षट् द्रव्याणीति प्रसिद्धिः ॥ ३३ ॥ ( गुणपर्यायवदिति ) गुण एक द्रव्य द्रव्यान्तरसे जिसके द्वारा व्यावृत्त हो वह गुण है यथा नील घट इत्यादिमे नीलादि विशेषण नीलगुण घटान्तरसे व्यावृत्ति करता है यदि तादृश गुण न होता तो समस्त द्रव्य एकरूपहोनेसे सांकर्य होता जीव भी ज्ञानादि गुणद्वारा पुद्गलादिसे व्यावृत्त होता हे और पुद्गलादि भी रूपादिगुणसे व्यावृत्त रहता है अत अन्वयी गुण है उसके विकार अर्थात् विशेषरूपसे व्यावृत्त होनेवाले पर्याय हैं। क्रोध मान गन्धादि जो द्रव्यमे रहनेवाले हो और जिनपर गुण नहीं रहता हो वही गुण हे।धर्माधर्म आकाशकायके यथाक्रम गतिस्थिति अवकाशादि गुण हैं। द्रव्योंकी उक्तरूपसे उत्पत्ति को उत्पाद कहते हैं जिस द्रव्यका जो वास्तविक स्वभाव हो उस स्वरूपप्राप्तिरूप परिणामको पर्याय कहते हैं । अत एव जीवाजीव, धर्माधर्म, आकाश पुद्गल भेदसे किसीके मतमें द्रव्य हैं किसीके मतमें छह अजीवके स्थानपर काल मिलाकर छह हैं ॥ ३३ ॥ केचन सप्त तत्त्वानीति वर्णयन्ति । तदाह जीवाजीवास्रवबन्ध- संवरनिर्जरमोक्षास्तत्त्वानीति । तत्र जीवाजीवौ निरूपितौ । आ- स्रवो निरूप्यते । औदारिकादिकाय्यादिचलनद्वारेणात्मनश्चलनं योगपदवेदनीयमास्रव । यथा सलिलावगाहिद्वारं नद्यां स्रवणं कारणत्वादास्रव इति निगद्यते तथा योगप्रणाडिकया कर्मास्रव- तीति स योग आस्रवः ॥ ३४ ॥