सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 78, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ६३ ) कायिक मृतशरीरादि पृथिवीको शरीररूपसे जो ग्रहण करता है वह पृथिवी जीव है पृथिव्यादिको कायरूपसे ग्रहण करनेवाला स्थावर है पृथिवी वा पृथिवीकाय नहीं क्योंकि वह जीव है "वनस्पत्यन्तानामेकम्" इति सूत्रोक्त प्रकार पृथिव्यादि एक मात्र स्पर्शन इन्द्रिय है यह सब पुनः संसार प्राप्ति रहित होनेसे मुक्त कहा जाते हैं धर्म्म अधर्म और आकाशास्तिकायादिक एक और निष्क्रिय है द्रव्यको प्रदेशान्तर प्राप्तिमें हेतुभी है ॥ ३१ ॥ तत्र धर्माधर्मौ प्रसिद्धौ आलोकेनाविच्छिन्ने नभसि लोकाकाश- पदवेदनीये सर्वत्रावस्थितिगतिस्थित्युपग्रहो धर्माधर्मयोरुप- कार, अत एव धर्मास्तिकाय प्रवृत्त्यनुमेयः अधर्मास्तिकायः स्थित्यनुमेयः । अन्यवस्तुप्रदेशमध्येऽन्यस्य वस्तुन प्रवेशोऽ- वगाहः तदाकाशकृत्यम् । स्पर्शरसवर्णवन्त पुद्गला । ते च द्विविधा, । अणव स्कन्धाश्च । भोक्तुमशक्या अणव । द्व्यणु- कादयः स्कन्धाः । तत्र द्व्यणुकादिस्कन्धभेदादण्वादिरुत्पद्यते, अण्वादिसङ्घातात् द्व्यणुकादिरुत्पद्यते । क्वचिद्भेदसंघाताभ्यां स्कन्धोत्पत्ति, अतएव पूर्य्यन्त गलन्तीति पुद्गलाः । कालस्या- नेकप्रदेशत्वाभावेनाऽस्तिकायत्वाभावेऽपि द्रव्यत्वमस्ति तल्ल- क्षणयोगात् ॥ ३२ ॥ विहितकर्मानुष्ठानादि धर्म और निन्दित कर्मानुष्ठानादि अधर्मरूपसे प्रसिद्ध है आलोकविशिष्ट आकाश अर्थात् जिसको लोकाकाश कहते हैं उसमें सर्वत्र गति ओर स्थितिका उपकारक धर्माधर्म है । धर्माधर्म प्रवृत्ति और निवृत्तिके उपकारक होनेसे ही प्रवृत्ति स्थितिरूप कार्यसे धर्माधर्मका अनुमान होता है । आकाश अवकाशका हेतु है जैसे गृहमें घटादिका प्रवेश होता है । स्पर्श, रस, रूपगुणवाला पुद्गल है । वह अणु स्कन्ध भेदसे दो प्रकार है । उपभोगका अशक्य प्रदेशशून्य सूक्ष्म अणु है द्व्यणुक आदि स्कन्ध है स्कन्धका भेद न होनेसे अणु उत्पन्न होता है । अणुसमु- दायमें स्कन्ध उत्पन्न होता है कहीं कहीं अणु और संघात दोनों मिलकर स्कन्ध उत्पन्न होता है जैसे अणु द्व्यणुक मिलकर एक स्कन्ध उत्पन्न हुआ उसी स्कन्धमें पुन एक अणुका संयोग होनेमें पुनः स्कन्धान्तर उत्पन्न होता है एवं दो दो संघा- तसे भी संघातान्तर उत्पन्न होता है यथा द्व्यणुक त्रसरेणु प्रभृतिकी उत्पत्ति होती है