भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( ६८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-

तत्त्वपञ्चक वादिका मत-(अपरेषु नास्त्यादि) जीव, आकाश, धर्म, अधर्म, पुद्गल अस्तिकायशब्दका प्रत्येकमे सम्बन्ध है अर्थात् जीवास्तिकाय आकाशास्तिकाय इत्यादि इन पांच तत्त्वोंमे कालत्रयसम्बन्धसे स्थिति व्यवहार और अनेक प्रदेश होनेसे शरीरवत् काय व्यवहार योग्य होनेसे अस्तिकाय कहा जाता है। संसारी और मुक्त भेदसे जीव दो प्रकार है ससरण अर्थात् परिवर्तनशील संसारी है वह भी मनो युक्त और मनोरहित भेदमे दो प्रकार है । शिक्षा क्रिया आलापादिरूप संज्ञायुक्त समनस्क है इससे शून्य अमनस्क है अमनस्क । भी त्रस, स्थावर भेदसे दो प्रकार है (द्वीन्द्रियादय इत्यादि) तथा च तत्त्वार्थसूत्र 'द्वीन्द्रियादयस्त्रसाः' इति । दो तीन चार पांच इन्द्रिय जिसको हो वह त्रस है "कृमि पिपीलिका भ्रमर, मनुष्यादीनामे कैकवृद्धानि" इति । अर्थ पूर्वसूत्र "वनस्पत्यन्तानामेकम्" में वनस्पतियोंको एक मात्र स्पर्शनेन्द्रिय कहा है उसमेंसे स्पर्शका अधिकार इस सूत्रमे आता है उसके साथ क्रमशः एक एक बढानेसे (द्वीन्द्रियादि) कृमि शंख प्रभृतिको स्पर्श और रसना दो इन्द्रिय होतीहे पिपीलिका प्रभृतिको स्पर्श, रसना, घ्राण तीन इन्द्रिये हे भ्रमरादिको स्पर्श, रसना, घ्राण और चक्षु चार इन्द्रिये हे मनुष्यादिको श्रोत्र सहित पूर्वोक्त मिल कर पाच इन्द्रिय होती है ॥ ३० ॥ पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतय स्थावरा । तत्र मार्गगतधूलि पृ- थिवी, इष्टकादि पृथिवीकाय, पृथिवीकायत्वेन येन गृहीता स पृथिवीकायिक, पृथिवी कायत्वेन यो ग्रहीष्यति स पृथिवी- जीव । एवमब्वादिष्वपि भेदचतुष्टयं योज्यम् । तत्र पृथिव्यादि कायत्वेन गृहीतवन्तो ग्रहीष्यन्तश्च स्थावरा गृह्यन्ते न पृथि- व्यादिपृथिवीकायादय तेषा जीवत्वात् । ते च स्थावरा स्पर्श- नैकैन्द्रियाश्च भवान्तरप्राप्तिनिष्ठुरा मुक्ता• धर्मा धर्माधर्माका- शास्तिकायास्ते एकत्वशालिनो निष्क्रियाश्च द्रव्यस्य देशा- -न्तरप्राप्तिहेतु ॥ ३१ ॥ स्थावर निरूपण-पृथिवी, जल, तेज, वायु और वनस्पति ये स्थावर हे (मार्ग गतेति) अचेतन कठिन गुणयुक्त पृथिवी हे पृथिव्यादिके चार चार भेद आगममे कहे हैं पृथिवी पृथिवीकाय पृथिवीकायिक और पृथिवीजीव यही चार प्रकार हैं इस प्रकार जलादिमे भी चार भेद है काय शरीर है पृथिवीकाय इष्टकादि है पृथिवी