सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] . भाषाटीकासमेत. । ( ६७ ) भिन्नः कथञ्चन । ज्ञानं पूर्वापरीभूतं सोऽयमात्मेति कीर्तितः ॥" इति ॥ २८ ॥ ( तदुक्तमिति ) ज्ञानसे अत्यन्त भिन्न या अत्यन्त अभिन्न आत्मा नहीं है किन्तु भिन्नाभिन्न अर्थात् पूर्वापरोभूत ज्ञानको आत्मा कहते हैं ॥ २८ ॥ 'ननु भेदाभेदयोः परस्परपरिहारेणावस्थानादन्यतरस्यैव वास्त- वत्वादुभयात्मकमयुक्तमिति चेत्तदयुक्तम्, बाधे प्रमाणाभावात्। अनुपलम्भो हि बाधकं प्रमाणं न सोऽस्ति समस्तेषु वस्तुष्वने- करसात्मकत्वस्य स्याद्वादिनो मते सुप्रसिद्धत्वादित्यलम् ॥ २९ ॥ भेदाभेदका विरोधाभाव समर्थन-( ननु इत्यादि ) यथा घटसे भिन्न पट है घटमें पटका भेद अर्थात् अभाव है तहा घट नहीं रहसकता अभेद अर्थात् भेदाभाव घटमें पटका भेदाभाव पटरूपता है तथा च भेदाभेद परस्पर विरुद्ध होनेसे एकत्र नहीं रह सकते । नैयायिकोंने भी भेदका प्रतियोगितावच्छेदकके साथ और अभावका प्रतियोगीके साथ विरोध माना है अतः परस्पर विरुद्ध होनेसे एकको सत्यत्व और अन्यको मिथ्यात्व कहनाहोगा । उत्तर(तदयुक्तमिति ) सहानवस्थान लक्षण ही विरोध है विरोध होनेपर बाध्यबाधकभाव होता है बाधमें कोई प्रमाण ही नहीं घट जहापर है वहा घटाभाव उपलब्ध नहीं होता न घटाभाव व्यवहार भी नहीं होता है अत अनुपलब्धरूप ही प्रमाण कहोगे सो भी ठीक नहीं क्योंकि स्याद् वादियोंके मतमें समस्तवस्तुओंमें अनेकान्तात्मक अर्थात् ( स्यादस्ति स्यान्नास्ति ) इत्यादि अनिश्चयात्मक रहता है अतः आर्हत् मतमें कोई विरोध ही नहीं ॥ २९ ॥ अपरे पुन जीवाजीवयोरपरं प्रपञ्चमाचक्षते जीवाकाशधर्माधर्म- पुद्गलास्तिकायभेदात् । एतेषु पञ्चसु तत्त्वेषु कालत्रयसम्ब- न्धितया स्थितिव्यपदेशः, अनेकप्रदेशत्वेन शरीरवत् कायव्य- पदेशः । तत्र जीवा द्विविधाः, संसारिणो मुक्ताश्च । भवाद्भवा- न्तरप्राप्तिमन्त संसारिण । ते च द्विविधा , समनस्का अमन- स्काश्च । तत्र संज्ञिनः समनस्का , शिक्षाक्रियालापग्रहणरूपा संज्ञा, तद्विधुरास्त्वमनस्काः । ते चामनस्का द्विविधा , त्रस- स्थावरभेदात् । तत्र द्वीन्द्रियादय शङ्खगण्डोलकप्रभृतयश्चतु- र्विधास्त्रसाः ॥ ३० ॥