सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- सकलजीवसाधारणं चैतन्यमुपशमक्षयक्षयोपशमवशादौपश- मिकक्षायात्मकक्षायोपशामिकभावेन कर्मोदयवशात् कालुष्या- कारेण च परिणतजीवपर्यायजीवविवक्षायां स्वरूपं भवति । यदवोचद्वाचकाचार्य्य - "औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रं च जीवस्य सत्त्वमौदयिकपारिणामिकौ चेति । अनुदयप्राप्तिरूपे कर्मण उपशमे सति जीवस्योत्पद्यमानो भाव औपशमिकः । यथा पङ्के कलुषतां कुर्वति कतकादिद्रव्यसम्बन्धादधः पतिते जलस्य स्वच्छता । कर्मणः क्षयोपशमे सति जायमानो भाव- क्षायिकः । यथा मोक्षः । उभयात्मा भावो मिश्रः । यथा जलस्या- र्द्धस्वच्छता । कर्मोदये सति भवन् भाव औदयिकः । कर्मोपश- माद्यनपेक्षः सहजो भावश्चेतनत्वादिः पारिणामिकः । तदेतत् स्वतत्त्वं यथासम्भवं भव्यस्याभव्यस्य जीवस्य तत्त्वं स्वरूप- मिति सूत्रार्थः ॥ २७ ॥ समस्त जीव साधारण चैतन्य उपशम, क्षय, क्षयोपशम, निमित्तसे ओपशामिक क्षायिक, क्षयोपशामिक भाव वश कर्मोदय और कालुष्यसे अन्याकारमे परिणत जीवपर्यायका स्वरूप होता है इसमें तत्त्वार्थसूत्र प्रमाण भी देते हैं (यदवोचदित्यादि ) आत्मामें कर्मरूप स्वशक्तिका किसी कारणवश प्रादुर्भाव न होना उपशम है तादृश उपशमके अनन्तर जीवका उत्पद्यमान भाव औपशमिक है । जिस प्रकार जलको कलुषित करनेवाला कर्दम निर्मलीके संयोगसे जब नीचे बैठ जाता है तब जलकी निर्मलता होती है । अत्यन्त निवृत्ति क्षय है तथा च कर्मका क्षय होनेसे उत्पन्न भाव क्षायिक है जिस प्रकार स्फटिकादि पात्रमें रखे हुए जलमें कर्दमका अत्यन्त अभाव होता है वैसी जीवकी मोक्षदशामें कर्मोंका अत्यन्त अभाव है । उभयात्मक भाव मिश्र है जिस प्रकार जलमें आधी स्वच्छता द्रव्यादिनिमित्तसे कर्म फलप्राप्तिका नाम उदय है कर्मोद्यमे जायमान भाव औदयिक है कर्मोपशमनिरपेक्ष सहज होनेवाला चेतन त्वादि अर्थात् द्रव्यात्मलाभ मात्र निमित्तक परिणामिक हे उक्त पाँच भाव यथा- योग्य भव्याभव्यात्मक जीवका स्वरूप है ॥ २७ ॥ तदुक्तं स्वरूपसम्बोधने—“ज्ञानाद् भिन्नो न चाभिन्नो भिन्ना-