भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( ६५ ) समस्त वस्तुओंमें मोहविशेषका त्याग अपरिग्रह है । क्योंकि मूर्च्छासे निन्दित वस्तुओंमेंभी मनकी आसक्ति होजाती है । उक्त पाँचों व्रत वक्ष्यमाण पाँच प्रकारकी भावनाओंमे अनुष्ठित होनेपर प्राणियोंका अव्यय पद प्राप्त कराते हैं। पाँच भावनाओंके कहते हैं। हास्य, लोभ, त्याग, भय और क्रोध इनका त्याग तथा सदा विचारपूर्वक भाष- णरूपी पाच भावनाओंसे सूनृत व्रतको सम्पादन करे एवं अन्य चारों व्रतोंमें भी प्रत्येक पाँच पाँच प्रकारकी भावना करे । जिस प्रकार रसायनादि औषधियोंके लिये जितनी सामग्री अपेक्षित हे वह सब मिलकर रसायनका फल उत्पन्न करती हैं न की केवल एक एकवस्तु तादृश फल देसकती है उसी प्रकार सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र मिलकर मोक्षकाकारण है ॥ २५ ॥ अत्र सङ्क्षेपतस्तावज्जीवाजीवाख्ये द्वे तत्त्वे स्तः। तत्र बोधात्मको जीवः, अबोधात्मकस्त्वजीवः। तदुक्तं पद्मनन्दिना "चिदचिद्वे परे तत्त्वे विवेकस्तद्विवेचनम्। उपादेयमुपादेयं हेयं हेयं च कुर्वतः ॥ हेयं हि कर्तृरागादि तत् कार्यमविवेकिनः। उपादेयं परं ज्योति- रुपयोगैकलक्षणम् ॥" इति। सहजचिद्रूपपरिणति स्वीकुर्वाण- ज्ञानदर्शने उपयोग । स परस्परप्रदेशानु प्रदेशन्बधात्कर्मणै- कीभूतस्यात्मनोऽन्यत्वप्रतिपत्तिकारणं भवति ॥ २६ ॥ सक्षेपत तत्त्वविचार-जीव और अजीव दो तत्त्व हैं बोधरूप अर्थात् चेतनालक्षण जीव है इससे विपरीत अचेतन अजीव है । ( चिदाचिद्वेति ) उक्तार्थ कर्तृत्व रागादि हेय है वह अविवेकका कार्य है । परज्योति उपादेय है वह मतिज्ञान श्रुतज्ञान मत्य- ज्ञान श्रुताज्ञानादि भेदयुक्त ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग स्वरूप है । वह उपयोग कर्मवश परस्पर प्रदेश संयोगसे एकीभूत आत्माको अन्यत्वप्रतीतिका कारण है ॥२६॥ १ तथा च तत्त्वार्थसूत्र " तत्स्थैर्यार्थ भावना पच पच " तत्स्थैर्य पूर्वोक्त व्रतपुष्टिके लिये प्रथमव्रतम " वाङ्मनोगुप्तिर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजनानि पच " द्वितीयमें- " क्रोध लोभ भीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचिभापणञ्च पञ्च " इति । तृतीयमें- " शून्यागारे विमोचितावासे परोपरोधाकरणे भैक्ष्यशुद्धि सद्धर्माविसंवादा पञ्च " इति । ब्रह्मचर्यव्रतभावना " स्त्रीरागकथाश्रवण तन्मनोहराङ्गनिरीक्षण पूर्वतानुस्मरण वृष्येतरस स्वश- रीरसंस्कारत्यागा पच " इति । अपरिग्रहव्रत भावनाः-"मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्ज- नानि पञ्च " इति । इन सूत्रोंका विस्तृत व्याख्यान सर्वार्थसिद्धिमें है यहां केवल नामनिर्देश मात्र किया है ।