सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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( ७४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- मोहनीय ४ प्रकार आयुः, ४२ प्रकार नामबन्ध दो प्रकार गोत्रबन्ध और ५ प्रकार अन्तराय बन्ध है । यह सब सर्वार्थसिद्धिमै प्रपञ्चित है ॥ ३७ ॥ यथा अजागोमहिष्यादिक्षीराणामेतावन्तमनेहसं माधुर्य्यस्वभा- वादप्रच्युतिस्थितिः तथा ज्ञानावरणादीनां मूलप्रकृतीनामादित- स्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटिकोट्यः परास्थिति- रित्याद्युक्तं कालदुद्दुर्द्दानवत् स्वीयस्वभावादप्रच्युतिस्थितिः॥३८॥ एव अष्टमाध्यायके चारसे तेरहवे सूत्रतक प्रकृति बन्धके भेदप्रभेद निरूपण करके आगे स्थितिवन्ध प्रदर्शन करते हैं-(यथा अजागोमहिष्येत्यादि) जिसका जो स्वभाव हो उससे च्युत न होना स्थिति हे जिस प्रकार गौ महिषी प्रभृतिका दुग्ध अनादि- कालसे आजतक माधुर्य्यस्वभावसे च्युति नहि हुआ है तिसी प्रकार ज्ञानावरणादि “आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटिकोट्य परास्थिति”इति सूत्रोक्त ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय अन्तरायरूप अनेककोटिकोटिप्रकृतिको स्वस्वभावमे च्युत न रहना स्थिति बन्ध है इसका भी अवान्तर भेद “शेषाणामन्तर्मुहूर्त्ता” इत्यन्त आठवे अध्यायके बीसवें सूत्रतक वर्णन किया है ॥ ३८ ॥ यथा अजागोमहिष्यादिक्षीराणां तीव्रमन्दादिभावेन स्वकार्य्य- कारणे सामर्थ्यविशेषोऽनुभाव तथा कर्मपुद्गलानां स्वकार्य्य- कारणे सामर्थ्यविशेषोऽनुभावः ॥ ३९ ॥ अनुभववन्धनिरूपण करते ह-(यथेति)“तद्रसविशेषोऽनुभव ” इति वृत्ति । जिस प्रकार गो महिषी आदिके दूधको तीव्र मन्दादि स्वभावसे स्वकार्यकारणमे जो सामर्थ्य- विशेष है अर्थात् रसविशेष प्रकटन सामर्थ्यानुभव हे उसी प्रकार कर्म पुद्गलको भी स्वकार्यविशेषमें सामर्थ्यविशेष अनुभव हे ॥ ३९ ॥ कर्मभावपरिणतपुद्गलस्कन्धानामनन्तानन्तप्रदेशानामा त्मप्रदे- शानुप्रवेश प्रदेशबन्ध , आस्रवनिरोध संवर , येनात्मनि प्रवि- शत् कर्म प्रतिषिध्यते स गुप्तित्समित्यादि- संवर । ससारका- रणयोगादात्मनो गोपनं गुप्ति । सा त्रिविधा कायवाङ्मनो निग्रहभेदात् । प्राणिपीडापरिहारेण सम्यगयनं समिति सा ईर्य्याभाषादिभेदात् पञ्चधा ॥ ४० ॥