सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । (७५) प्रदेशबन्धका निरूपण करते हैं-(एतावदेव) इस प्रकार निश्चयका नाम प्रदेश हे कर्मभावसे परिणत अनन्तानन्त प्रदेशवाले पुद्गल और स्कन्ध हैं उनको आत्मप्रदेशमें अनुप्रवेश अर्थात् परमाणुरूपसे अवस्थानका नाम प्रदेशबन्ध है। चतुर्विधबन्धनिरू- पणानन्तर उद्देशक्रमप्राप्त संवरनिरूपण करते हैं (आस्रवनिरोधः संवर इति) अभिनवकर्म- हेतुभूत जो आस्रव कहे हैं उनका निरोध अर्थात् जिनसे आत्मामें प्रवेश करनेवाले कर्मका प्रतिबंध हो वह संवर हे । गुप्ति, समिति, धर्मानुप्रेक्षा, परीषहजय, चारित्र संवरका भेद हे । संसारके कारणोंसे आत्माका गोपन करना गुप्ति है। वह कायगुप्ति, वाग्गुप्ति और मनोनिरोधभेदसे तीन प्रकार है प्राणियोंकी पीडापरिहारार्थ सम्यक यत्नका नाम समिति है। वह ईर्ष्या, भाषा, एषणा, आदान, निक्षेपोत्सर्ग भेदसे पांच प्रकार है ॥ ४० ॥ प्रपञ्चितं च हेमचन्द्राचार्य्यैः—“लोकातिवाहिते मार्गे चुम्बिते भास्वदंशुभिः । जन्तुरक्षार्थमालोक्य गतिरीर्ष्या मता सताम् ॥ आपद्यनागतं सर्वजनीनं मितभाषणम् । प्रिया वाच्यमानां सा भाषासमितिरुच्यते ॥ द्विचत्वारिंशता भिक्षादोषैर्नित्यमदूषि- तम् । मुनिर्यदन्नमादत्ते सैषणासमितिर्मता ॥ आसनादीनि सं- वीक्ष्य प्रतिलङ्घ्य च यत्नतः । गृह्णीयान्निक्षिपेद् ध्यायेत् सादा- नसमिति स्मृता ॥ कफमूत्रमलप्रायैर्निर्जन्तुजगतीतले । यत्ना- द्युत्सृजेत् साधु सोत्सर्गसमितिर्भवेत्॥” अत एवास्त्रव स्रोतसो द्वारं संवृणोतीति संवर इति निराहु ॥ ४१ ॥ (लोकातिवाहितेत्यादि) आकाश दो प्रकार है एक लोकाकाश दूसरा आलोकाकाश । धर्माधर्म पुद्गलादि लोक है तादृश लोक जिसमें अधिष्ठित हो वह लोकाकाश हे । तथा च लोकाधाग्भूत भास्वत् सूर्य किरणोंसे चुम्बित युक्त आकाशमें प्राणियोंकी रक्षाके लिये जो गति है उसका नाम ईर्ष्या है । सर्वावस्थामें सर्व प्रकार सर्व जनके हितार्थ प्रिय ओर परिमित भाषणनाम समिति है । ४२ प्रकारकी भिक्षाजाके दोषोंसे अदूषित जिस अन्नको मुनिजन ग्रहण करते हैं वह एषणा है । सम्यक् प्रकार देखकर आसनादिको रखना उठाना एव ध्यानादिक करनेका नाम आदानस- मिति है। कफ मूत्र ओर मलादिसे उत्पन्न जीवरहित भूमिपर मलमूत्रादिके त्यागका नाम उत्सर्ग है अतएव आस्रवकर्म प्रवाहद्वारको संवरण आच्छादन करनेसे संवर कहाता है ॥ ४१ ॥