सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-
तदुक्तमभियुक्तैः- "आस्रवो भवहेतुः स्यात् संवरो मोक्षकारणम् । इतीयमार्हती सृष्टि रन्यदस्याः प्रपञ्चनम् ॥" अर्जितस्य कर्मण- स्तपः प्रभृतिभिर्निर्जरणं निर्जराख्यं तत्त्वं चिरकालप्रवृत्तकषा- यकलापं पुण्यं सुखदुःखे च देहेन जरयति नाशयति केशोल्लु- ञ्चनादिकं तप उच्यते ॥ सा निर्जरा द्विविधा यथा कालौपक्रमि- कभेदात् । तत्र प्रथमा यस्मिन् काले यत् कर्म फलप्रदत्वेना- भिमतं तस्मिन्नेव काले फलदानाद्भवन्ती निर्जरा कामादिपाक- जेति च जेगीयते । यत् कर्म तपोबलात् स्वकामनयोदयावलिं प्रवेश्य प्रपद्यत तत् कर्मनिर्जरा ॥ यदाह- "संसारबीजभूतानां कर्मणां जरणादिह । निर्जरा संस्मृता द्वेधा सकामाकामनिर्जरा । स्मृता सकामा यमिनामकामा त्वन्यदेहिनाम् ॥" इति ॥४२॥ सारांश कहते हैं- आस्रव संसारका कारण है संवर मोक्षका कारण है यही आर्हत मतमें सृष्टि, अन्य सब इसीका प्रपञ्च है । कृतकर्मको तप समाधिप्रभृतिसे निर्जरण अर्थात् अनन्तकालसे प्राप्त क्रोधादि कषाय, पुण्य, पाप, सुख और दुःखको देहके साथ ही नाश करदेनेका नाम निर्जराख्य तत्त्व है केशलुञ्चनादिका नाम तप है उक्त निर्जरा काल और औपक्रमिक भेदसे दो प्रकार है जिस कालमें फलप्रदत्व नियम है उसी कालमें फल उत्पन्न करनेसे कालनिर्जरा कहाता है । वह कामादि और पाकज कहाताहै जो कर्म स्वकामनावश फलजनक होता है वह सकाम निर्जरा है (यदाहेति) , संसारकारणभूत कर्मका नाश करनेसे निर्जरा कहाता है वह सकाम अकाम भेदसे दो प्रकार है योगियोंका सकाम और अन्य संसारियोंका अकाम है ॥ ४२ ॥ (मिथ्यादर्शनादीनां बन्धहेतूनां निरोध अभिनवकर्मभावात्, निर्जराहेतुसन्निधानेनार्जितस्य कर्मणो निरसनादात्यन्तिककर्म- मोक्षणं मोक्षः, बन्धहेतुभ्रन्निहेतुनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षणं मोक्ष इति तदनन्तरमूर्द्धं गच्छत्यालोकान्तात् यथा हस्तदण्डा- दिभ्रमिप्रेरितं कुलालचक्रमूषरतेऽपि तस्मिन् तद्बलादेवासंस्का- रक्ष्यं भ्रमति तथा भवस्थेनात्मना अपवर्गप्राप्तये बहुशो