सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
( ७६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-
तदुक्तमभियुक्तैः- "आस्रवो भवहेतुः स्यात् संवरो मोक्षकारणम् । इतीयमार्हती सृष्टि रन्यदस्याः प्रपञ्चनम् ॥" अर्जितस्य कर्मण- स्तपः प्रभृतिभिर्निर्जरणं निर्जराख्यं तत्त्वं चिरकालप्रवृत्तकषा- यकलापं पुण्यं सुखदुःखे च देहेन जरयति नाशयति केशोल्लु- ञ्चनादिकं तप उच्यते ॥ सा निर्जरा द्विविधा यथा कालौपक्रमि- कभेदात् । तत्र प्रथमा यस्मिन् काले यत् कर्म फलप्रदत्वेना- भिमतं तस्मिन्नेव काले फलदानाद्भवन्ती निर्जरा कामादिपाक- जेति च जेगीयते । यत् कर्म तपोबलात् स्वकामनयोदयावलिं प्रवेश्य प्रपद्यत तत् कर्मनिर्जरा ॥ यदाह- "संसारबीजभूतानां कर्मणां जरणादिह । निर्जरा संस्मृता द्वेधा सकामाकामनिर्जरा । स्मृता सकामा यमिनामकामा त्वन्यदेहिनाम् ॥" इति ॥४२॥ सारांश कहते हैं- आस्रव संसारका कारण है संवर मोक्षका कारण है यही आर्हत मतमें सृष्टि, अन्य सब इसीका प्रपञ्च है । कृतकर्मको तप समाधिप्रभृतिसे निर्जरण अर्थात् अनन्तकालसे प्राप्त क्रोधादि कषाय, पुण्य, पाप, सुख और दुःखको देहके साथ ही नाश करदेनेका नाम निर्जराख्य तत्त्व है केशलुञ्चनादिका नाम तप है उक्त निर्जरा काल और औपक्रमिक भेदसे दो प्रकार है जिस कालमें फलप्रदत्व नियम है उसी कालमें फल उत्पन्न करनेसे कालनिर्जरा कहाता है । वह कामादि और पाकज कहाताहै जो कर्म स्वकामनावश फलजनक होता है वह सकाम निर्जरा है (यदाहेति) , संसारकारणभूत कर्मका नाश करनेसे निर्जरा कहाता है वह सकाम अकाम भेदसे दो प्रकार है योगियोंका सकाम और अन्य संसारियोंका अकाम है ॥ ४२ ॥ (मिथ्यादर्शनादीनां बन्धहेतूनां निरोध अभिनवकर्मभावात्, निर्जराहेतुसन्निधानेनार्जितस्य कर्मणो निरसनादात्यन्तिककर्म- मोक्षणं मोक्षः, बन्धहेतुभ्रन्निहेतुनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षणं मोक्ष इति तदनन्तरमूर्द्धं गच्छत्यालोकान्तात् यथा हस्तदण्डा- दिभ्रमिप्रेरितं कुलालचक्रमूषरतेऽपि तस्मिन् तद्बलादेवासंस्का- रक्ष्यं भ्रमति तथा भवस्थेनात्मना अपवर्गप्राप्तये बहुशो
४. रामानुज दर्शन (विशिष्टाद्वैत मत)
दर्शनम् [ भाषाटीकासमेतः । ( ७७ ) यत् कृतं प्रणिधानं मुक्तस्य तदभावेऽपि पूर्वसंस्कारादालोकान्तं गमनमुपपद्यते यथा वा मृत्तिकालेपकृतमलाबुद्रव्यं जलेऽधः पतति पुनरपेतमृत्तिकाबन्धनमूर्ध्वं गच्छति तथा कर्मरहित आत्मा असङ्गतत्वादूर्ध्वं गच्छति बन्धच्छेदादेरण्डबीजवच्चोर्ध्व- तिस्वभावाच्चाग्निशिखावत् ॥ ४३ ॥ मोक्षपदार्थको निरूपण करते हैं-(मिथ्यादर्शन-विरत्यादि) जो तत्त्वार्थ श्रद्धानादिरूप बन्ध कारणका निरोध है वह अभिनव कर्मके अभावसे होता है वह भी निर्जराके हेतुसन्निधानसे अर्जित कर्मके निरास होनेसे कर्मोंके अत्यन्त उच्छेदका नाम मोक्ष है अतएव बन्धहेतु और भवहेतु निर्गममे कृतकर्मकी अत्यन्तनिवृत्तिको मोक्ष कहा है अनन्तर आत्मा लोकाकाशसे ऊपर जालोकाकाशमें पतंगेके समान ऊपर उड़ता रहता है। मुक्तात्मामें क्रिया न होनेसे ऊर्ध्वगमन असम्भव है ऐसी आशङ्काका परिहार करते हैं-(यथा हस्तेत्यादि) जिस प्रकार कुम्हारके चक्र घुमाकर हस्त और दण्डका व्यापार शान्त होनेपर भी पूर्वव्यापार वेगबलसे चक्र घूमता रहता है तिसी प्रकार संसारदशामें मोक्षप्राप्तिके लिये किये हुए प्रणिपतन ध्यानादि आत्माके विपुल कर्म मुक्तावस्थामें कर्म न होनेपरभी पूर्व कर्म ही स्वसंस्कारद्वारा आलोकाकाशान्त गमनके साधक होते हैं। असंग तथा बन्धाभाव एवं स्वाभावरूप हेतुत्रयसे आत्माको ऊर्ध्व- गतिसमर्थन-(यथा वेत्यादि) अथवा असंगसे भी ऊर्ध्वगमन सम्भव है जैसे मृत्तिकासे लिप्त तुम्बिका जलमें नीचे डूब जाती है परन्तु मृत्तिकासंयोग टूट जानेपर स्वभा- वतः ऊपर आजाती है तिसी प्रकार कर्मसे बद्ध आत्माका ऊर्ध्वगमनस्वभाव न रह- नेपर भी कर्मबन्धसे मुक्त होनेपर निस्सग होनेके कारण स्वभावत ऊपर उड़ता है इसीमें दृष्टान्तद्वय और भी देत हैं जिस प्रकार एरण्डका फल सूखके फटजानेपर बीज बन्धरहित होनेके कारण ऊपर उड़जाता है तिसीप्रकार आत्मा भी बन्धरहित होनेसे ऊपर उड़जाता है यथावा अग्निकी ज्वाला स्वभावसे ऊपर जाती है तथेव आत्मा भी ऊर्ध्वगति स्वभाव है ॥ ४३ ॥ अन्योन्यं प्रदेशानुप्रवेशे सत्यविभागेनावस्थानं बन्धः परस्पर- प्राप्तिमात्रं सङ्ग । तदुक्तं 'पूर्वप्रयोगादसङ्गत्वान् बन्धच्छेदात्तथा गतिपरिणामाच्चाविरुद्ध कुलालचक्रवद् व्यपगतलेपालाबुवदे- रण्डबीजवद्ग्निशिखावच्च' इति ॥ ४४ ॥
( ७८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-
बन्ध और संगका परस्पर भेद कहते हैं । परस्पर एकके प्रदेशमें अन्यके प्रवे- शका नाम बन्ध है यथा जल और मृत्तिका मिलकर जो पिण्ड होता है उसमें जल और मृत्तिका दोनों रहते परस्पर संयोगमात्रका संग है जैसे घटपटका संग है एव स्फटिक और जपाकुसुमका संग है उक्त हेतुमें आप्तोक्ति भी प्रमाण देते हैं ( पूर्व- प्रयोगेत्यादि ) पूर्वप्रयुक्त कुलालके व्यापारसे यथा चक्रभ्रमण होता है असंग होनेसे जिस प्रकार तुम्बिका ऊपर जाती है तिसी प्रकार असंग होनेसे आत्मा भी ऊपर जाता है बन्ध छेदसे एरण्डबीज जिस प्रकार ऊपर जाता है उसी प्रकार आत्मा भी संसारबन्धमे छूटनेपर ऊपर जाता है । गतिपरिणाम गतिस्वभावसे यथा अग्निशिखा ऊपर जाती है तद्वत् आत्मामें भी ऊपर गमन अविरुद्ध है ॥ ४४ ॥ अतएव पठन्ति--"गत्वा गत्वा निवर्त्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः। अद्यापि न निवर्त्तन्ते त्वालोकाकाशमागताः ॥” इति ॥४५॥ ( अतएवेति ) चन्द्रसूर्यादि जितने ग्रह हैं वह सब स्वस्वनियतकाल नियतदेश- पर्यन्त ऊपर जा जाकर लौट जाते हैं । परन्तु लोकाकाशके ऊपर आलोकाकाशमें प्राप्त परम मुक्त आजतक नहीं लौटे हैं ॥ ४५ ॥ अन्ये तु-गतसमस्तक्लेश तद्वासनस्यानावरणज्ञानस्य सुखैकता- नस्यात्मन उपरिदेशावस्थानं मुक्तिरित्यास्थिपत । एवमुक्तान् सु- खदुःखसाधनाभ्यां पुण्यपापाभ्यां सहितान्नवपदार्थान् केचना- ङ्गीचक्रु । तदुक्तं सिद्धान्ते-'जीवाजीवौ पुण्यपापयुतावास्त्रव संवरौ निर्जरणं बन्धो मोक्षश्च नव तत्त्वानि' इति। सङ्ग्रहे प्रवृत्ता वयमुपरता स्म ॥ ४६ ॥ पूर्वोक्त निरन्तर उपरिगमनरूप मुक्तिसे भिन्न देशविशेष स्थितिरूप मुक्तिवादीका मत कहते हैं । ( अन्ये तु इति ) वासना संस्कारसहित समस्तदुःख नष्ट होनेपर ज्ञानावरण दर्शनावरणादि शून्य निरतिशय सुखस्वरूप आत्माको लोकाकाशमें उप रिस्थान प्राप्ति ही मुक्ति है। नौ पदार्थवादियोंके मतको कहते हैं, सुखदुःखका साधन पुण्य पाप और पूर्वोक्त जीवाजीवास्त्रवबन्ध, संवर निर्जरा और मोक्ष मिलाकर नौ तत्त्व कोई कोई मानते हैं ॥ ४६ ॥ अत्र सर्वत्र सप्तभङ्गिन्याख्यं न्यायमवतारयन्ति जैना । स्याद- स्ति स्यान्नास्ति स्यादस्ति च नास्ति च स्यादवक्तव्य स्याद-
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ७९ ) स्ति चावक्तव्यः स्यान्नास्ति चावक्तव्य स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्य इति ॥ तत्सर्वमनन्तवीर्य्यः प्रत्यपीपदत् । “तद्विधानविवक्षायां स्यादस्तीति,गतिर्भवेत् । स्यान्नास्तीति प्रयोगः स्यात्प्रतिषेधे विवक्षिते ॥ क्रमेणोभयवाञ्छायां प्रयोगः समुदायभाक् । युगपद्विवक्षायां स्यादवाच्यमशक्तितः ॥ आद्यावाच्यविवक्षायां पञ्चमो भङ्ग इष्यते । अन्त्यावाच्य- विवक्षायां षष्ठभङ्गसमुद्भवः ॥ समुच्चयेन युक्तश्च सप्तमो भङ्ग उच्यते ॥” इति ॥ ४७ ॥ “स्याद्वादिनो नैकान्तिकस्येष्टत्वात्” इति बौद्धमतखण्डनप्रकरणोक्त अनेका- न्तिकत्वसाधक स्याद्वादका निरूपण करते हैं-(अत्र सर्वत्र इत्यादि सप्तभ- ङ्गीति ) सातों भङ्गोंके समाहार ( सम्मेलन ) का नाम सप्तभङ्गी है सप्तभङ्गी रूप नय ( न्याय ) सप्तभङ्गीनय है । स्यादस्ति १ स्यान्नास्ति २ स्यादस्ति च नास्ति च ३ स्यादवक्तव्य ४ स्यादस्ति चावक्तव्य. ५ स्यान्नास्ति चावक्तव्य. ६ स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यः७ यही सात भङ्ग हैं । स्यात्पद क्रियावाचक तिङन्त नही है किन्तु तिङन्तसमानाकृतिक अव्यय है यथा 'अस्तिक्षीरा गौ.' इत्यादिमें अस्तिशब्द है । अनन्तवीर्य्योक्तविवरण ( तत्सर्वमित्यादि ) वस्तुके सत्ताकी विवक्षामें प्रथम भङ्ग होता है अभावकी विवक्षामें द्वितीय भङ्ग होता है । क्रमसे जहां वस्तुकी सत्ता और प्रभाव कहना हो तो तृतीय भङ्ग होता है । एक ही कालमें वस्तुका विधान और निषेध करना असम्भव होनेसे चतुर्थ ( स्यादवक्तव्य ) पक्ष होता है । प्रथम और चतुर्थ भङ्गकी विवक्षामें स्यादस्ति चावक्तव्यरूप पाँचवा भङ्ग होता है । द्वितीय और चतुर्थकी विवक्षामें षष्ठभङ्ग और तृतीय चतुर्थकी विवक्षामें सप्तम भङ्ग होता है ॥ ४७ ॥ स्याच्छब्दः खल्वयं निपात तिङन्तरूपकोऽनेकान्तद्यो- तकः । यथोक्तम्-“वाक्येष्वनेकान्तद्योतिगम्यं प्रति विशेषणम् । स्यान्निपातोऽर्थयोगित्वात्तिङन्तप्रतिरूपकः ॥” इति । यदि पुनरेकान्तद्योतक स्याच्छब्दोऽयं स्यात्तदा स्यादस्तीति वाक्ये स्यात्पद्मनर्थकं स्यात् । अनेकान्तद्योतकत्वे तु स्यादस्ति
(८०) , सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-
कथञ्चिदस्तीति स्यात्पदात् कथञ्चिदिति अयमर्थो लभ्यत इति नानर्थक्यम् । तदाह-“स्याद्वादः सर्वथैकान्तत्यागात् किं- वृत्त चिद्विधौ । सप्तभङ्गिनयापेक्षो हेयादेयविशेषकृत् ॥” इति ॥ ४८ ॥ यथोक्तमिति पूर्व कहे हुए वाक्यमें जो स्यात्शब्द है वह अनिश्चयका बोधक और प्रतिपादनीय प्रधान अर्थमें विशेषण भी है यथा प्रथमवाक्य स्यादस्ति है इसमें अस्ति शब्दका अर्थ प्रधान है स्यात्पद तिङन्त क्रियाबोधकके सदृश अव्यय होनेसे उसका अर्थ कथञ्चित् है तथा च कथञ्चित् है ऐसा अर्थ हुआ यदि स्यात्पद अनिश्चयार्थक न होता तो स्यात्पद और अस्तिपद दोनों अस् धातुसे निष्पन्न होनेके कारण समानार्थक होनेसे स्यात्पद व्यर्थ होजायगा, क्योंकि अस्तिपदसे वस्तुकी सत्ता और नास्तिपदसे निषेध हो जाता है । कथञ्चित् अर्थ मानो तो किसी एक रूपसे है अन्य रूपसे नहीं अर्थात् एकत्र होता है इसलिये स्यात्शब्द सार्थक होता है अतएव कहा है स्यात् शब्द किम्शब्दसे निष्पन्न जो कथम् शब्द उससे चित्प्रत्यय विधान करनेसे जो पद बनता है उसके अर्थको कहनेवाला अर्थात् कथञ्चित् अर्थ कहनेके कारण अनेकान्त पक्षको छोडकर सर्वथा एकान्त पक्ष ही मानाजाय तो त्याग उपादानादि व्यवहार सब नष्ट होजायेंगे ॥ ४८ ॥ यदि वस्तुस्त्येकान्तत सर्वथा सर्वदा सर्वत्र सर्वात्मनास्तीति न उपादित्साजिहासाभ्यां क्वचिव कदा केनचित् प्रवर्त्तेत निव- र्त्तेत वा प्राप्तप्रापणीयत्वहेयज्ञानानुपपत्तेश्च । अनेकान्तपक्षे तु कथञ्चित् क्वचित् केनचित् सत्त्वेन हानोपादाने प्रेक्षावतामुप- पद्येते ॥ ४९ ॥ उसीको उपपादन करते हैं-(यदीति ) यदि वस्तुका एकान्त अर्थात् अस्तित्वादि निश्चित एकही स्वरूप होता तो सर्वत्र सर्वकालमें सब प्रकार हान उपादानादि समस्त रूपसे रहजायगा अत घटादि किसी वस्तुके ग्रहण त्यागादिके लिये न कोई प्रवृत्त ही होगा न कोई कदापि कही भी निवृत्तही होगा क्योंकि जो वस्तु प्राप्त हो चुकी है उसकी प्राप्तिके लिये पुन उद्योग नहीं किया जाता है अनेकान्तपक्षमें किसीके पास किसी कालमें किसीरूप अर्थात् दर्शनीयरूपसे है जलाहरणादिरूपसे नहीं है एवं 'बाहर है घरम नहीं पूर्व दिवस था आज नहीं' इत्यादि अनेक रूपसे सत्ता और तदभाव दोनों होनेसे प्रवृत्ति निवृत्ति दोनों उपपन्न होती है ॥ ४९ ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ८१ ) किञ्च वस्तुन सत्त्व स्वभाव असत्त्वं वेत्यादि प्रष्टव्यम् । न तावदस्तित्वं वस्तुन स्वभाव इति समास्ति घटोऽस्तीत्यनयोः पर्यायतया युगपत् प्रयोगायोगात् नास्तीति प्रयोगविरोधाच्च । एवमन्यत्रापि योज्यम् ॥ ५० ॥ एकान्त पक्षमें दूषणान्तर भी देते हैं-(किञ्चेति) वस्तुका स्वभाव सत्त्व है या असत्त्व है? सत्त्व तो कह नहीं सकते क्योंकि "घटोऽस्ति" इत्यादि स्थलमें घटशब्द भी सत्त्वस्वभा- वका बोधक है और अस्तिशब्द भी सत्त्वस्वभावका बोधक है अत दोनों पर्यायशब्द होजायेंगे तो पर्यायशब्दको युगपत् एकत्र प्रयोग न होनेसे उक्त वाक्य ही अप्रमा- णिक होगा । और “घाटो नास्ति” ऐसे प्रयोगका भी असम्भव होगा क्यों नास्ति- शब्द अभावको कहता है घटशब्द सर्वथा भाववाची होनेसे भावाभाव दोनोंको एकत्र स्थिति बाधित है । इसी प्रकार “स्याद् एक, स्यादनेक, स्यादेकोऽनेकश्च, स्यादवक्तव्यः स्यादेकोवक्तव्य', स्यादनेकोऽवक्तव्यः स्यादनेकोऽवक्तव्य', स्यादेकोऽनेकश्चावक्तव्यः, स्यान्नित्य', स्यादानित्य', इत्यादि सर्वत्र जानना चाहिये ॥ ५० ॥ यथोक्तम्—“घटोऽस्तीति न वक्तव्य सन्नेव हि यतो घट । ना- स्तीत्यापि न वक्तव्यं विरोधात् सदसत्त्वयोः॥” इत्यादि ॥ ५१ ॥ (यथोक्तमिति) घट और अस्ति दोनोंका प्रयोग एक साथ नहीं कर सकते क्योंकि घटका स्वरूप ही अस्तित्व है अर्थबोधनके लिये शब्दका प्रयोग कियाजाता है जब घट- शब्दसेही अस्तित्वका बोध होगया । 'उक्तार्थानामप्रयोग' इस न्यायसे अस्तिशब्दका प्रयोग व्यर्थ और अन्याय होगा । नास्तिशब्दका भी प्रयोग नहीं हो सकेगा क्योंकि भाव और अभाव दोनों अत्यन्त विरुद्ध होनेसे एकत्र असम्भव है ॥५१॥ ९ तस्मादित्यं वक्तव्यम्-सदसत्सदसदनिवर्चनीयवादभेदेन प्रतिवा- दिनश्चतुर्विधाः । पुनरप्यनिर्वचनीयमतेनाऽमिश्रितानि सद्सदादि मतानीति त्रिविधाः । तान् प्रति कि वस्तुवस्तीत्यादिपर्यनुयोगे कथञ्चिदस्तीत्यादिप्रतिवचनसम्भवेन ते वादिन सर्वे निर्विण्णाः सन्त तूष्णीमासत इति सम्पूर्णार्थविनिश्चायिन स्याद्वादमङ्गी- कुर्वतस्तत्र तत्र विजय इति सर्वमुपपन्नम् ॥ ५२ ॥ उपसंहार' करते हैं-(तस्मादिति) चार प्रकारके वादी हैं एक पदार्थको सदा सत् मानते हैं, दूसरे असत्, तीसरे सत् और असत् कहते हैं, चौथे न सत् कहते न असत् कहते हैं किन्तु अनिर्वचनीय कहते हैं। उनमें अनिर्वचनीयपक्ष सिद्धान्ति सम्मत होनेसे प्रथम तीनों प्रतिवादी रहजाते हैं। उनसे घटादि वस्तु है ? ऐसे पूछनेपर कथञ्चित् है ऐसा ६
( ८२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-
उत्तर देते हैं। यही स्याद्वादका मुख्य सिद्धान्त है इसको स्वीकार करनेसे वे सब विरक्त होकर निरुत्तर होजाते हैं अतः स्याद्वादियोंकी विजय सर्वत्र होजाती है ॥ ५२ ॥ यद्वोचदाचार्य्य स्याद्वादमञ्जर्य्याम्-“अनेकान्तात्मकं वस्तु गो- चरः सर्वसंविदाम् । एकदेशविशिष्टोऽर्थो न यस्य विषयो मतः ॥ न्यायानामेकनिष्ठानां प्रवृत्तौ श्रुतवर्त्मनि । सम्पूर्णार्थविनिश्चायि स्याद्वस्तु श्रुतमुच्यते ॥” इति ॥ ५३ ॥ समस्तज्ञानका विषय वस्तु अनेकान्त ( अनिश्चित ) रूप है एकदेशविशिष्ट सत् या असत् इत्यादि एकान्त ज्ञानका विषय नहीं हो सकता । अस्ति नास्ति इत्यादि एकदेशविशिष्टार्थकशब्दको सुनकर प्रवृत्तको समस्त अर्थोंका निर्णायक स्यात्शब्द ही श्रुत है ॥ ५३ ॥ “अन्योन्यपक्षप्रतिपक्षभावाद्यथापरे मत्सरिणः प्रवादः । नयानशे- षानविशेषमिच्छन्नपक्षपाती समयस्तथार्हतः ॥” इति ॥ ५४ ॥ ( अन्योन्येति ) परस्पर एकका पक्ष दूसरेका प्रतिपक्ष होनेसे जन्यवादियोंका सिद्धान्त मत्सरग्रस्त है । जैसे सांख्य कहते हैं कार्य सत् है तब नैयायिक उसी कार्यको असत् कहते हैं, मीमांसक शब्दको नित्य मानते हैं परन्तु नैयायिक अनित्य मानते हैं नैयायिक आकाश कालादिको नित्य मानते हैं तो वेदान्ती उसको भी कार्य मानते हैं वेदान्ती जगत्के उपादान ब्रह्मको कहते हैं तो सांख्यवादी प्रकृतिको कहते हैं और नैयायिक परमाणुको कहते हैं वे सब पदार्थोंको स्थिर मानते हैं तो बौद्ध क्षणिक मानते हैं इसी प्रकार एकका पक्ष दूसरेका विपक्ष होजानेसे परस्पर स्वपक्षस्थापन ओर परपक्ष खण्डनके लिये मत्सर बढ जाता है । परन्तु सप्तभंगीन्यायसे समानरूप सत्, असत्, क्षणिक, नित्यादि सब सर्वत्र समान माननेके कारण आर्हतसिद्धान्त पक्षपातशून्य है ॥ ५४ ॥ जिनदत्तसूरिणा जैनं मतमित्थमुक्तम्-“बलभोगोपभागोनामु- भयोर्दानलाभयो । अन्तरायस्तथा निद्रा भीरज्ञानं जुगुप्सि- तम् । हिंसा रत्यरती रागद्वेषौ रतिरिति स्मरः ॥ शोको मिथ्या- त्वमेतेऽष्टादश दोषा नयस्य च॥ जिनो देवो गुरु सम्यक् तत्त्व- ज्ञानोपदेशक । ज्ञानदर्शनचारित्राण्यपवर्गस्य वर्तिनि ॥ स्याद्वा- दस्य प्रमाणे द्वे प्रत्यक्षमनुमापि च । नित्यानित्यात्मकं सर्व नव तत्त्वानि सप्त वा । जीवाजीवौ पुण्यपापे चास्रवः संवरोऽपि च ।
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । ( ८३ ) बन्धो निर्जरणं मुक्तिरेषां व्याख्याऽधुनोच्यते ॥ चेतनालक्षणा जीवः स्यादजीवस्तदन्यकः । सत्कर्मपुद्गला पुण्यं पापं तस्य विपर्ययः ॥ आस्रवः कर्मणां बन्धो निर्जरस्तद्वियोजनम् । अष्टकर्मक्षयान्मोक्षोऽथान्तर्भावश्च कैश्चन । पुण्यस्य संस्रवे पापस्यास्रवे क्रियते पुनः ॥ लब्धानन्तचतुष्कस्य लोकागूढस्य चात्मन । क्षीणाष्टकर्मणो मुक्तिर्निव्यावृत्तिर्जिनोदिता ॥५५॥५६॥ पूर्वोक्त तत्त्वोंको संक्षेपसे जिनदत्तसूरिने इस प्रकार कहा है कि बल, भोग, उपभोग, और दान, लाभके प्रतिबन्धक निद्रादि १८ दोष जिनमें न हो एवम्भूत जो तत्त्वज्ञा - नका उपदेशक गुरु जिनदेव है । ज्ञानदर्शनादि मोक्षका मार्ग है स्याद्वादमें प्रत्यक्ष और अनुमान दो प्रमाण हैं अनेकान्तात्मक सब तत्त्व है किसीके मतमें नौ तत्त्व हैं किसीके मतमें सात हैं जीवाजीवेत्यादि तत्त्व पूर्वोक्त हैं। चेतनास्वरूप जीव है इससे विपरीत अजीव है शुभ कर्मका पुद्गल पुण्य और शुभ कर्मका विपर्यय पाप है । कर्म- बन्धका नाम आस्रव है कर्मनाशको नाम निर्जर है आठों कर्मोंके क्षयसे कोई २ मोक्ष मानते हैं । कोई २ पुण्यके आस्रव पापके संस्रवमें उसका अन्तर्भाव है कहते हैं आनन्दादिको प्राप्त लोक सम्बन्ध शून्य पुनरावृत्तिरूप मुक्ति आठों प्रकारके कर्मोंके नाशसे होती है ऐसा जिनदेवने कहा है ॥ ५५ ॥ ५६ ॥ सरजोरणा भैक्षभुजो लुञ्चितमूर्द्धजा । श्वेताम्बराः क्षमाशिला निःसङ्गा जैनसाधवः ॥ लुञ्चिता पिच्छिकाहस्ता पाणिपात्रा दिगम्बराः । ऊर्द्धाशिनो गृहे दातुर्द्वितीया स्युर्जिनर्षय ॥ भुङ्क्ते न केवलं न स्त्री मोक्षमेति दिगम्बरः । प्राहुरेषामयं भेदो महान् श्वेताम्बरैः सह ॥” इति ॥ ५७ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे आर्हतदर्शनम् ॥ ३ ॥ जैनसंन्यासियोंके आचरणको कहत हैं—धूलिसे लिप्त अर्थात् स्नानादि न करनेसे देहमें सदा मैल भरा रहता है भिक्षान्न भोजन केशळुञ्चन क्षमावान् और निःसङ्ग श्वेताम्बर जैनसाधुओंका आचरण होता है । केशळुञ्चन हाथमें छोटेछोटे जीवोंको उडानेके लिये पिच्छिका रखना, जलपात्र रखना, खडेखडे भिक्षा देनेवालेके घरमें भोजन करना यह दिगम्बर नामक जैनसंन्यासियोंका अनुष्ठान है वे अकेले भोजन नहीं करते स्त्रीसंभोग नहीं करते मुक्त समझे जाते हैं इत्यादि श्वेताम्बरोंसे बहुत भेद है ॥ ५७ ॥ इति आर्हतमत समाप्त ।
अथ रामानुजदर्शनम् ॥ ४ ॥ तदेतदार्हतमतं प्रामाणिकगर्हणमर्हति न ह्येकस्मिन् वस्तुनि परमार्थे सति परमार्थसतां युगपत् सदसत्त्वादिधर्माणां समा- वेशः सम्भवति । न च सदसत्त्वयोः परस्परविरुद्धयोः समुच्च- यासम्भवे विकल्पः किं न स्यादिति वदितव्यम्, क्रिया हि विकल्प्यते न वस्त्विति न्यायात् ॥ १ ॥ श्रीभाष्यकारोविजयते । कर्णादमत्कर्दमं कापिलकल्पनावागुराम् दुरत्ययमतीत्य तद्द्रुहिणतन्त्रयन्त्रोदरम् । कुदृष्टिकुहनामुखे निपततः परब्रह्मणः करग्रहविचक्षणो जयति लक्ष्मणोऽय मुनि ॥ अनादिकालसे निरवच्छिन्न सत्सम्प्रदाय प्रचलित परम वैदिक विशिष्टाद्वैत सिद्धा- न्तको प्रतिपादनके लिये पूर्व सन्दर्भके साथ संगति कहते हैं (तदेतदिति) उक्त जैन सिद्धान्त प्रमाणसरणिका अनुसरण करनेवालोंके आदरणीय नहीं कारण एकही वस्तुमें पारमार्थिक सत्त्व और असत्त्व एक कालमें एकत्र नहीं होसक्ता । “अति- रात्रे षोडशिनं गृह्णाति ” नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति” इत्यादिमें अतिरात्रयाग विशेषमें षोडशिनामक पात्रविशेषका ग्रहण और अग्रहणका समुच्चय नास्ति होनेपरभी जिस प्रकार विकल्प होता है उसी प्रकार सत् और असत्का विकल्प क्या नहीं होगा ऐसी जाशङ्का करते हैं-(नचेति) उत्तर क्रियाका विकल्प होता है वस्तुका विकल्प नहीं हो सक्ता, यथा घटको देखो या मत देखो यहां दर्शनका विकल्प होता है घटका विकल्प नहीं होता है * ॥ १ ॥ न चानेकान्तं जगत् सर्वं हेरम्बनरासिंहादिति दृष्टान्तात्हेरम्बन- र्शादेष्टव्यम् । एकस्मिन् देशे गजत्वं सिंहत्वं वा अपरस्मिन् नरत्वमिति देशभेदेन विरोधाभावेन तस्यैकस्मिन् देश एव सत्त्वासत्त्वादिना अनेकान्तत्वाभिधाने दृष्टान्तानुपपत्तेः । ननु द्रव्यात्मना सत्त्वं पर्यायात्मना तदभाव इत्युभयमप्युपप- न्नमिति चेन्मैवं कालभेदेन हि कस्यचित् सत्त्वमसत्त्वञ्च सम्भाव्यं इति न कश्चिद्दोषः ॥ २ ॥
- उपद्रष्टा महाभाष्यकारने कहा है "क्रियैव विकल्प्यते न वस्तु" अर्थात् यज्ञाङ्गभूत अष्ट- म-स्थानमें विहित षोडशीपात्र ग्रहण करनेरूप क्रियाका विकल्प होता है।
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( ८९ ) प्रमाणसिद्धका अपलाप नहीं होता इस न्यायसे यथा मनुष्यत्व गजत्व परस्पर विरुद्ध होनेपर भी गजाननमें दोनों रहते हैं । यथावा सिंहत्व मनुष्यत्व परस्पर विरुद्ध होनेपरभी नरसिंहशरीरमें दोनों रहते हैं तिसी प्रकार संसारका सद् और सदात्मक अनेकान्त होनेमें क्या बाधक है ? यह भी नहीं कहसकते क्योंकि दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक समान नहीं है दृष्टान्तमें सिंहत्व या गजत्व और मनुष्यत्व दोनों एकही स्थानपर होते तो विरोध कहते सो नहीं है सिंहत्व या गजत्व कण्ठके उपरी भागमें है मनुष्यत्व उससे अधोभागमें है अत विरोध नहीं दार्ष्टान्तिकमें एकहीमें सत्त्व और असत्त्व होनेसे विरोध स्पष्ट है ( ननु इति) जिस प्रकार मृत्पिण्डमें द्रव्यत्वरूपसे सत्त्व और घटत्वादिरूपसे असत्त्व दोनों रहते हैं तिसी प्रकार प्रत्येकमें द्रव्यत्वरूपसे सत्त्व और कार्यत्वादिरूपमे असत्त्व दोनों रहसकते हैं सो भी नहीं एकही कालमें एकत्र सत्त्वासत्त्वमें ही विरोध है कालभेद और आकारभेदसे सत्त्वासत्त्व स्वभाव होसकता है इसमें कोई विरोध नहीं परन्तु आपके मतमें एकत्र एकही वस्तुको एक कालमें सत्त्व और असत्त्व दोनों है यह अत्यन्त विरुद्ध होनेसे सर्वथा असम्भव है ॥ २ ॥ न चैकस्य ह्रस्वत्वदीर्घत्ववदनेकान्तत्वं जगत स्यादिति वाच्यम्, प्रतियोगिभेदेन विरोधाभावात् । तस्मात् प्रमाणाभा- वात् युगपत् सत्त्वासत्त्वे परस्पराविरुद्धे नैकस्मिन् वस्तुनि वस्तुयुक्ते । एवमन्यासामपि भङ्गीनां भङ्गोऽवगन्तव्य ॥ ३ ॥ यदि कहो एकही यष्टिकामें ह्रस्वत्व दीर्घत्व जिस प्रकार होते हैं तिसी प्रकार जगत्का अनेकान्त्य होसकता है यह भी ठीक नहीं ह्रस्वत्व दीर्घत्वादिक प्रतियोगि सापेक्ष होता है यथा चार हाथ लम्बी एक यष्टिका हो वह पाँच हाथ लम्बी यष्टिकाकी अपेक्षा ह्रस्व और तीन हाथवालेकी अपेक्षा दीर्घ कहा सकती है एकहीकी अपेक्षा उसको ह्रस्व दीर्घ नहीं कहसकते हैं । अत प्रतियोगिभेदमें उनमें विरोध नहीं । जगत्में ऐसा कोई प्रतियोगिभेद न होनेसे विरोध दुष्परिहरणीय है । अत' एकत्रस्तुमें एककालमें परस्पर विरुद्ध सत्त्वासत्त्व मानना सर्वथा प्रमाण और युक्तिसे विरुद्ध है इसी प्रकार एकत्व, अनेकत्व, नित्यत्व, अनित्यत्वादिकाभी असम्भव जानना ॥ ३ ॥ किञ्च सर्वस्यास्य मूलभूत सप्तभङ्गिनय स्वयमेकान्त अने- कान्तो वा । आद्ये सर्वमनेकान्तमिति प्रतिज्ञाव्याघातः ।
( ८६ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ रामानुज-
द्वितीये विवक्षितार्थासिद्धिः । अनेकान्तत्वेनासाधकत्वात् । तथा चेयमुभयतः पाशारज्जु स्याद्वादिन् स्यात् ॥ अपि च नवत्वसप्तत्वादिनिर्द्धारणस्य फलस्य तन्निर्द्धारयितुः प्रमातुश्च तत्करणस्य प्रमाणस्य प्रमेयस्य नवत्वादेरनियमे साधु सम- र्थितमात्मनस्तीर्थंकरत्वं देवानां प्रियेणार्हतमतप्रवर्त्तकेन ॥ ४ ॥ दूषणान्तर कहते हैं-(किञ्चेति) सत्त्वासत्त्वादि विरुद्धधर्माध्यासरूप अनेकान्तका मूल भूत सप्तभङ्गीन्याय क्या एकान्त है या अनेकान्त ? यदि एकान्त मानो तो समस्त वस्तुएं अनेकान्त हैं यह तुम्हारी प्रतिज्ञा भंग होगी । अनेकान्त मानो तो मूलमें कुठाराघात होगा अर्थात् जिस सप्तभङ्गी नयके बलसे अनेकान्तत्व साधना था वह स्वयं अने कान्त होनेसे उसकी सत्ताभी अनिश्चित हुई अतः साधन असिद्ध होनेसे साध्यभी असिद्ध होगा। ओरभी दोष देते हैं-(अपिचेत्यादि) जीवाजीवरूप दो पदार्थ आस्र वादि सात अथवा पुण्यपापादि सहित नौ पदार्थ वादियोंके मतमें न्यूनाधिक पदार्थका निषेधरूप सप्तत्व नवत्वादिका निर्णय और उससे होनेवाला 'सम्यग्ज्ञान मोक्षादि तथा निर्णय करनेवाला पुरुष आलोकाकाशादि और मुक्तात्मसञ्चरण स्थान प्रमाण प्रमेयादि सबको अनिश्चित माने तो जैनमतप्रवर्त्तक तीर्थंकरकी बुद्धिमत्ता भी प्रशंसनीय है ॥ ४ ॥ तथा जीवस्य देहानुरूपपरिमाणत्वाङ्गीकारे योगबलादनेक- शरीरपरिग्राहकयोगिजीवेषु प्रतिशरीरं जीवविच्छेदः प्रसज्येत, मनुजशरीरपरिमाणो जीवो मातङ्गजदेहं कृत्स्नं प्रवेष्टुं न प्रभवेत् ॥ किञ्च गजादिशरीरं परित्यज्य पिपीलिकाशरीरं विशतः प्राचीनशरीरसन्निवेशविनाशोऽपि प्राप्नुयात् ॥ ५ ॥ जीवको देह परिमाणत्वका खंडन-(तथा जीवस्येति ) सौभरिनामकर्षि ने एक समय १०० राजकन्याओको परिणय करके प्रत्येकके साथ विहार करनेके लिये १०० शरीर धारण किये, ऐसी कथा इतिहासमें प्रसिद्ध है इस प्रकार योगबलसे युगपत् अनेकशरीर धारण करनेवाले योगियोंका जीव टुकडे टुकडे होजायगा एवं टुकडे होनेपर भी तत्तत् शरीर परिमित नहीं हो सकेगा जैसे एक पात्रमें भरे हुए जलको उतनेही बडे सौ पात्रोंमें थोडा थोडा छोडनेसे सब पात्र नहीं भर सकते । योगियोंने पूर्व देहकी अपेक्षा छोटे २ शरीर धारण किये हों जिससे आत्मा समस्त
ऽदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ८७ ) शरीरोंमें व्याप्त होजाती है ऐसी आशंकासे कहते हैं-( मनुजशरीरीते ) किसीको अपना कर्मवश मनुष्यशरीर छोड़ गजशरीरमें प्रवेश करनापड़े तो मनुष्यशरीर छोटा होनेके कारण उसमें रहनेवाला आत्मा गजशरीरमें सर्वत्र व्याप्त नहीं होसकेगा और भी हाथीका शरीर छोड़कर चेंटाके शरीरमें प्रवेश करते समय आत्मा छिन्नभिन्न होजायगा एव अवयव विनाश होनेसे आत्माकाभी नाश होजायगा परन्तु आत्माका अनित्यत्व जैनको अभिमत नहीं है ॥ ५ ॥ न च यथा प्रदीपप्रभाविक्षेपः प्रपाप्रासादाद्युदरवर्त्तिसङ्कोच विकासवान् तथा जीवोऽपि मनुजमतङ्गजादिशरीरेषु स्यादि- त्योपेतव्यम्, प्रदीपवदेव सविकारत्वेनानित्यत्वप्राप्तौ कृतप्रणा- शाकृताभ्यागमप्रसङ्गात् ॥ एवं प्रधानमल्लगिबर्हणन्यायेन जीव- पदार्थदूषणाभिधानदिशाऽन्यत्रापि दूषणमुत्प्रेक्षणीयम् । तस्मान्नित्यनिर्दोषश्रुतिविरुद्धत्वादिनमुपादेयं न भवति । तदुक्तं भगवता व्यासेन-“ नैकस्मिन्नसम्भवात् ” इति । रामानुजेन च जैनमतनिराकरणपरत्वेन तदिदं सूत्रं व्याकारि । एष हि तस्य सिद्धान्तः-चिदचिदीश्वरभेदेन भोक्तृभोग्यनियामकभेदेन व्यवस्थितास्त्रयः पदार्था इति । तदुक्तम्-“ईश्वरश्चिदचिच्चेति पदार्थत्रितयं हरिः । ईश्वरश्चित इत्युक्तो जीवो दृश्यमचित् पुन ॥” इति ॥ ६ ॥ यदि कहो जिस प्रकार विशालस्थानमें रखेहुए दीपककी प्रभा उस स्थानभर व्याप्त रहती है उसी दीपको किसी संकुचितस्थानमे रखनेसे वही प्रभा उतने देशमें व्याप्त रहती है विसी प्रकार जीव भी संकोचविकासस्रूपसे गज मनुष्य पिपीलिकादि शरीरमें छिन्नभिन्न न होनेपर भी व्याप्त रहसकता है यह भी नहीं कहसकते क्योंकि जो संकोचविकासवान् होता है वह अनित्य होता हे दृष्टान्तके लिये दीपप्रभा ही लीजिये एवं संकोचविकासी होनेसे जीव अनित्य होजायगा तो कृतकर्मका नाश और अकृतकर्म फलकी प्राप्ति अर्थात् दूसरेके किये कर्मका फल दूसरेको प्राप्त होने लगेगा । अत जिस प्रकार प्रधान मल्लको जीतनेसे सभीको जीतना कहाजाता है उसी प्रकार प्रधान जीवके स्वरूपका निराकरण करनेसे अन्यका भी खण्डन होजाता है । उपसंहार करते हैं-( तस्मादिति ) अपोरुषेय एव वक्तृप्रमादादिदोषशून्य वेद-
विरुद्ध होनेसे जैनमत अत्यन्त अग्राह्य है । इसमें सूत्रकारकी सम्मति भी कहते हैं ( तदुक्तमिति ) संक्षेपसे विशिष्टाद्वैतसिद्धान्तमें चित्, अचित् और ईश्वर तीन तत्त्व हैं वह क्रमसे भोक्ता, भोग्य और नियामक हैं चित्पद चेतन अर्थात् जीवको कहते हैं जीवका लक्षण " अणुत्वे सति चेतनत्वम् " अत्यन्तसूक्ष्म हो और चेतन हो वही जीवका लक्षण है । परमाणुसे व्यावृत्तिके लिये चेतनपद है, ईश्वरव्यावृत्तिके लिये अणुपद है, कर्तृत्व भोक्तृत्व ज्ञातृत्वादि जीवका स्वाभाविक धर्म है, अचित्पदवाच्य प्रकृति है इसका लक्षण अवस्थाश्रयत्व है । ईश्वर सर्वनियन्ता श्रीमन्नारायण हैं ईश्वरका लक्षण 'महत्त्वे सति चेतनत्वम्' महान् होकर जो चेतन हो वही ईश्वर है जीवकी व्यावृत्तिके लिये महत्पद है आकाशादिकी व्यावृत्तिके लिये चेतनपद है ॥ ६ ॥ अपरे पुन.-अशेषाविशेषप्रत्यनीकं चिन्मात्रं ब्रह्मैव परमार्थं । तच्च नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावमपि तत्त्वमस्यादिसामानाधिकर- ण्याविगतजीवैक्यं बध्यते मुच्यते च । तदतिरिक्तनानाविध- भोक्तृभोक्तव्यादिभेदप्रपञ्चः सर्वोऽपि तस्मिन्नविद्यया परि- कल्पित ॥ ७ ॥ अद्वैतमताभिप्रायसे पूर्वपक्ष कहते हैं-(अपरे पुन इति)(निर्विशेषद्वैतवादी) अशेष ज्ञातृत्व कर्तृत्वादि सजातीय विजातीय स्वगत समस्त विशेष गुणसे रहित चिन्मात्र स्वयंप्रकाश ज्ञेयत्वादि रहित ब्रह्मैव (निर्गुणब्रह्मही) परमार्थ है अर्थात् तत्त्वनिर्णायक प्रमाणका विषय है सगुणवाक्य उपासनारूप फलविशेषके लिये उपयुक्त होनेसे तत्त्वावेदक प्रमाणका विषय नही है वह ब्रह्म नित्य कालत्रयार्थ भी अबाध्य शुद्ध "अपहतपात्माविजरोविमृत्यु' इत्यादि श्रुति प्रतिपादित्तापहतपाप्मत्वादि तथा "नि- ष्कल निष्क्रिय शान्त निरवद्यमित्यादि" वचन बोधित कर्मबन्धादिरहित बुद्ध ज्ञाना- नन्द स्वरूप है तथापि अनादिकालकी जो अनिर्वचनीय अविद्या है उससे तिरोहित स्वरूप होनेसे बन्धमोक्षको प्राप्त होते हैं । इसमे (तत्त्वमसि) हे श्वेतकेतु तुम वही ब्रह्म हो जो उपक्रममे (सदेवेत्यादि) वाक्योंसे सत्यज्ञानानन्दस्वरूप प्रतिपादित है इत्यादि वाक्यमें तत् पद और त्वंपदका जो सामानाधिकरण्य है वह जीव ब्रह्मके भेदपक्षमें नहीं होसकता अतः उक्त सामानाधिकरण्यबोधक वाक्य ही अविद्याक- ल्पित जीवभावमे प्रमाण है । अद्वैतमतमें सामानाधिकरण्य अखण्डार्थकरव अर्थात् स्वरूपका ऐक्य है। रज्जुज्ञानसे सर्पनिवृत्तिवत् ब्रह्मज्ञानसे प्रपञ्चनिवृत्तिके लिये कहते हैं (कल्पित इति) (नेहनानास्ति इत्यादि) वाक्यसे ब्रह्मव्यतिरिक्त अनेकविधि ज्ञातृज्ञेयादि सब भेद उस ब्रह्ममें अविद्यासे कल्पित हे ॥ ७ ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत.। ( ८९ ) “सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्”इत्यादिवचननिचयप्रा- माण्यादिति ब्रुवाणा 'तरति शोकमात्मवित्' इत्यादिश्रुतिशिर शत वशेन निर्विशेषब्रह्मात्मैकत्वविद्यया अनाद्यविद्यानिवृत्तिमङ्गी- कुर्वाणाः 'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति' इति भेद- निन्दाश्रवणेन पारमार्थिकं भेदं निराचक्षाणाः विचक्षणंमन्या- स्तमिमं विभागं न सहन्ते ॥ ८ ॥ ब्रह्मसे अतिरिक्त वस्तुका कल्पितत्वमें प्रमाण-( सदेवेति ) सदेव यहाँ एवशब्दसे विजातीय अचेतनकी सत्ताका निषेध होता है 'एकमेव' इस पदसे सजातीय चेतनका निषेध होता है। अद्वितीयपदसे स्वगत कर्तृत्वादिका निषेध होता हे इस प्रकार " एकमेवाद्वितीयम् ' " सर्वं खल्विदं ब्रह्म " इत्यादि अनेक श्रुतिबलसे परमार्थ भेदका निषेधकर निर्विशेष आत्मैकत्वविज्ञानसे अनादिकालकी अविद्याकी निवृत्ति मानते हुए " मृत्योस्स " इत्यादि भेदज्ञानसे घोरसंसारप्राप्ति प्रतिपादक श्रुतियों द्वारा पारमार्थिक भेदका तिरस्कार करनेवाले पण्डितमानी पूर्वोक्त चिदचित् ईश्वरादि विभागसे भयभीत होते हैं ॥ ८ ॥ तत्रायं समाधिरभिधीयते-भवेदेतदेवं यद्यविद्यायां प्रमाणं विद्येत न चैवमनादिभावरूपं ज्ञाननिवर्त्यमज्ञानमहमज्ञो मामन्यं च न जानामीति प्रत्यक्षप्रमाणसिद्धम् ॥ ९ ॥ अविद्यामें प्रमाणाभावकथन- यह अविद्यापरिकल्पितत्व कथन तब होसकता है जब अविद्यामें कोई प्रमाण हो, सो नहीं है। यदि कहो, वस्तु स्वरूपको तिरोधान करने- वाली यथार्थज्ञानसे नष्ट होनेवाली प्रागभावसे भिन्न अनादि भावरूप जो अविद्या है उसमें प्रत्यक्षही प्रमाण हे क्योकि मैं अज्ञ हूँ अपनेको और परको भी नहीं जानता हूँ ऐसी प्रतीति होती है अतः अज्ञानरूप अविद्याकाभी प्रत्यक्ष सार्वजनिक है। यहा अज्ञपदसे अज्ञान और न जानामिपदसे स्वरूपाच्छादन कार्य कहा है ॥९॥ तदुक्तम्-“अनादिभावरूपं यद्विज्ञानेन विलीयते। तदज्ञानमिति प्राज्ञालक्षणं संप्रचक्षते ॥" इति । न चैतत् ज्ञानाभावविषयमि- त्याशङ्कनीयम्, को हि कं ब्रूयात् प्रभाकरकरावलम्बी, भट्टदत्तह- स्तो वा ? नाद्यः-“स्वरूपपररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मके । सर्वं तुनि ज्ञायते किञ्चित् कैश्चिद्रूपं कदाचन ॥” इति । "भावान्तर-
( ९० ) सर्वदर्शनसंग्रहः। , [ रामानुज- मभावो हि कयाचित्तु व्यपेक्षया । भावान्तरमभावोऽन्यो न कश्चिदनिरूपणात् ॥ ” इति वदता भावव्यतिरिक्तस्याभावस्या- नभ्युपगमात् । अभावस्य षष्ठप्रमाणगोचरत्वेन ज्ञानस्य नित्या- नुमेयत्वेन च तदभावस्य प्रत्यक्षविषयत्वानुपपत्ते ॥ १० ॥ एतादृश अविद्यारूपमें अभियुक्तोंकी सम्मति कहते हैं-( तदुक्तमिति ) जन्यो न्याश्रय जनवस्था आदि परिहारके लिये अनादिपद, प्रागभाव व्यावृत्तिके लिये भावरूप, ब्रह्मस्वरूपसाक्षात्कारसे निवृत्तिबोधनकेलिये विज्ञानेनेत्यादि। तथाच अनादि और भावरूप हो ज्ञानसे जिसकी निवृत्ति हो उसको विद्वान् लोग अज्ञान कहते हैं यह अज्ञान ज्ञानका प्रागभावरूप नहीं होसकता क्योंकि प्रागभाव परोक्षज्ञानका विषय है और अज्ञान प्रत्यक्ष विषय है। इसी बातको विशदरूपसे कहते हैं ( कोहि कश्च्यादित्यादि) मीमांसकोंमें दो विभाग हैं, एक प्रभाकर मतावलम्बी और दूसरा कुमा- रिलभट्टमतावलम्बी प्रभाकरके मतमें अभाव अतिरिक्तपदार्थ नहीं है। तथाहि (स्वरूपेति) घटादिवस्तुके दो स्वरूप हैं एक स्वकीय ( घटादि ) दूसरा परकीय (पटादि ) स्वकीय रूपसे सत् और परकीय रूपसे असदात्मक है तथाच कदाचित् किसी एक रूपका ग्रहण होता है जिस प्रकार जाम्बादि फलमें रूप और रस दोनों होनेपरभी किसी समय केवल रूपका ग्रहण होता है और किसी समय केवल रसकाही ग्रहण होता है। तिसी प्रकार जिस समय स्वकीयरूपका ग्रहण हो तब सत् कहा जाता है और जिस समयपर रूपका ग्रहण हो तब असत् कहाता है (भावान्तरेति) भाव घटादिपदार्थ है उससे अन्यभाव भावान्तर है अर्थात् घटादिका अभाव पटभूतलादि है । इससे अन्य निरुपाय अभावपदार्थका निरूपण नहीं करसकते हैं अतः प्रभाकरके मतको ज्ञानका अभावरूप नहीं कहसकते हैं। कुमारिलभट्टके मतसे कहते हैं-( अभा वस्य षष्ठेति ) इस मतमें अभाव अतिरिक्त पदार्थ होनेपर भी अनुपलब्धिरूप षष्ठप्रमाण गम्य और ज्ञान अनुमेय है अतः ज्ञानाभाव प्रत्यक्षका विषय नहीं होसक्ता है ज्ञानका अग्रभावरूप अज्ञान किसी मतसे भी उत्पन्न नहीं होसक्ता है ॥ १० ॥ यदि पुन प्रत्यक्षाभाववादी कश्चिदेनमाचक्षीत तं प्रत्याचक्षीत अहमज्ञ -इत्यस्मिन्ननुभवे अहमित्यात्मनोऽभानधर्मितया ज्ञा- नस्य प्रतियोगितया चावगतिरस्ति न वा ? अस्ति चेद्विरोधा- देव न ज्ञानाभावानुभवसम्भव । नचेद्धर्मिप्रतियोगिज्ञानसापेक्षो ज्ञा- नाभावानुभवः सुतरां न सम्भवति । अस्य चाज्ञानस्य भा व,
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ९३ ) प्रागुक्तदूषणाभावादयमभावो भावरूपाज्ञानगोचर एवाभ्युप- गर्थ न्तव्य इति ॥ ११ ॥ • न ( यदि इति ) कोई अज्ञानको ज्ञानाभाव मानकर अभावको भी प्रत्यक्ष माने तो क्या अज्ञानके अनुभव समय आत्मामें ज्ञान रहता है या नहीं ? यदि रहता हो तो ज्ञान और अज्ञानके परस्पर विरोध होनेके कारण ग्राह्य ( अज्ञान ) के न होनेमे प्रत्यक्ष न होगा । यदि नही रहता हो तो अज्ञानका ग्राहक ( ज्ञान ) न होनेसे ही प्रत्यक्ष नहीं होगा इसी आशयसे कहते है-( तं प्रत्याचक्षीत इत्यादि ) मै अज्ञ हूँ इस अनुभवमें अह, ज्ञान और अभाव तीन पदार्थ हैं। अभावका प्रतियोगी ज्ञान है अहम्पदार्थ जो आत्मा वह अभावका धर्मी है मैं ज्ञानाभाववान् हू यह वाक्यार्थ होता है यही सिद्धान्तकी बात है । अब प्रश्न यह है कि, उक्त अनुभवमे धर्मीरूपसे आत्मा- का और प्रतियोगिरूपसे ज्ञानका अवगाहन है या नही ? यदि है तो पूर्वोक्त प्रका रसे अभावका प्रत्यक्ष नहीं होगा । यदि नहीं है तो धर्मी और प्रतियोगीके विना अभावका ग्रहण नही होगा इस प्रकार दोनों ओरसे फँस जाते हैं । ( अस्य चाज्ञान- स्येति ) भावरूप अज्ञानपक्षमें धर्मी प्रतियोगीसापेक्ष होनेपरभी विरोधन होनेसे प्रत्यक्ष होजाता है क्योंकि भाव और अभावका परस्पर विरोध है अत यह अज्ञान भाव- रूप है यह सिद्ध हुआ ॥ ११ ॥ तदेतत् गगनरोमन्थन्यायितं भावरूपस्याज्ञानस्य ज्ञानाभाव- समानयोगक्षेमत्वात् । तथाहि विषयत्वेनाश्रयत्वेन च ज्ञानस्य व्यावर्तकतया प्रत्यगर्थ प्रतिपन्नो न वा ? प्रतिपन्नश्चेत् स्वरूप- ज्ञानानिवर्त्य तदज्ञानमित तस्मिन् प्रतिपन्ने कथङ्कारमवतिष्ठेत। अप्रतिपन्नश्चेद्व्यावर्त्तकाश्रयविषय शून्यमज्ञानं कथमनुभूयेत । अथ विशद स्वरूपावभास एवाज्ञानविरोधिना ज्ञानेनाभा- सित इति आश्रयविषयज्ञाने सत्यपि नाज्ञानानुभवविरोध इति। हन्त तर्हिज्ञानाभावेऽपि समानमेतत् अन्यत्राभिनिवेशात्। तस्मादुभयाभ्युपगतज्ञानाभाव ' एवाहमज्ञो मामन्यं च न जानामीत्यनुभवगोचर इत्यभ्युपगन्तव्यम् ॥ १२ ॥ अविद्याप्रत्यक्षका खण्डन-( तदेतदिति ) चर्वित वस्तुका चर्वण रोमन्थ है वह चर्वण तृणादिका होसक्ता है आकाशका चर्वण नही होसकता । जिस प्रकार आका-
( ९० ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ रामानुज- भूषण असम्भव है तिसी प्रकार भावरूप अविद्याका प्रत्यक्षभी असम्भव है । न्का भावरूप और ज्ञानप्रागभावरूप दोनों पक्षमें दूषण भूषण समान है । ( तथा हीति ) अज्ञानके आश्रयरूपसे और विषयतारूपसे व्यावर्तक प्रत्यगात्मा भासमान है या नही ? यदि प्रत्यगात्मा भासमान है तो स्वरूपज्ञानसे निवर्तनीय अज्ञान स्वरूप ज्ञानभासित होनेपर कैसे रहसकता है? यदि नही प्रतिपन्न हो तो व्यावर्तकके आश्रय और विषय शून्य अज्ञानका अनुभवही कैसे होगा ? यदि कहो स्वरूपका विशद रूपसे अवभास ( ज्ञान ) अज्ञानका विरोधी है । अविशदरूपज्ञान अज्ञानका विरोधी नहीं है यहाँपर अविशदरूप प्रतीत होता है अतः आश्रय और विषय- ज्ञान होनेपरभी अज्ञानानुभवमे कोई विरोध नहीं प्रत्यगात्माके प्रमाणज्ञानसे जो अवभास है उसको विशदावभास कहते हैं । यह समाधान ज्ञानप्रागभाव पक्षमें भी समान है केवलभावपक्षमें हठके सिवाय कुछ विशेष नहीं है अतः उभयपक्षसिद्ध अज्ञानज्ञानका अभावरूपही है भावरूप नहीं है ॥ इत्यविद्याप्रत्यक्षखण्डनम् ॥ १२ ॥ अस्तु तर्ह्यनुमानं विवादास्पदं प्रमाणज्ञानं स्वप्रागभावव्यतिरि- क्तस्वविषयावरणस्वनिवर्त्यस्वदेशगतवस्त्वन्तरपूर्वकम् अप्रका शितार्थप्रकाशकत्वात् अन्धकारे प्रथमोत्पन्नप्रदीप प्रभावा- दिति ॥ १३ ॥ अथ अविद्यानुमान और उसका खण्डन- ( अस्तु तर्हि अनुमानमित्यादि ) विवा- दास्पदम् ( विवादाग्रस्त ) प्रमाण ज्ञान । यहाँतक पक्ष है (स्वप्रागभावेत्यादि ) साध्य है ( अप्रकाशितार्थ प्रकाशकत्व ) हेतु है ( अन्धकारेति ) दृष्टान्त है पक्षमें यदि प्रमाणपद न देते तो ब्रह्मस्वरूपभूतज्ञान भी पक्षकोटीमें आजायगा परन्तु उसमें वस्त्वन्तरपूर्व- क रूप साध्य नहीं रहेगा अतः स्वरूपज्ञानकी व्यावृत्तिके लिये प्रमाणपद है । घटोऽय पटोयम् इत्यादि धारावाहिक बुद्धिस्थलमें उत्तरोत्तरज्ञानमें अभिमत वस्त्व- न्तरपूर्वक न होनेसे उसकी व्यावृत्तिके लिये विवादाध्यासित पद है । साध्यस्वरूपमें केवल वस्त्वन्तरपूर्वकत्वमात्र कहते तो घटपटादिरूप स्वविषयपूर्वकत्व होनेसे सिद्ध- साधन होजायगा अतः उसकी व्यावृत्तिके लिये स्वदेशपद है स्वाश्रयगत ऐसे कहते तो दृष्टान्त ( प्रदीपप्रभा ) में साध्य शून्यता होगी क्योंकि अन्धकार प्रदीपप्रभामें नहीं रहता है धर्माधर्म अथवा सम्भाग्ब्यावृत्तिके लिये स्वनिवर्त्यपद है गदादि- व्यावृत्तिके लिये स्वविषयावरण पद है । प्रागभाव उक्तलक्षण विशिष्ट होनेसे उसमें अनिष्टापत्तिवारणके लिये स्वप्रागभावव्यतिरिक्त पद है । हेतुकृत्य कहते है, प्रकाशकमात्र कहते तो धारावाहिकबुद्धिमें व्यभिचार होगा अतः अप्रकाशितार्थ पद है । इन्द्रियमें अनिष्टापत्तिवारणके लिये मासमानत्व भी हेतुमें विशेषण देना
दर्शनम् ] ˙ भाषाटीकासमेत । (९३) चाहियें । दृष्टान्त-केवल प्रदीपप्रभा कहते तो उत्तरोत्तरप्रभामे अप्रकाशित अर्थ प्रकाशक न होनेसे दृष्टान्तसाधन विकल होगा और स्वनिवर्त्यवस्त्वन्तरपूर्वकत्व न होनेसे साध्य विकल भी होगा अतः तद्व्यावृत्तिके लिये प्रथमोत्पन्नत्वविशेषण दिया। दिनमें प्रथमोत्पन्न दीपप्रभामें भी अप्रकाशित वस्तु प्रकाशकत्व न होनेसे साधन वैकल्य होगा अतः तद्व्यावृत्तके लिये अन्धकार पद है। यदि कहो जालोकाभाव या रूपदर्शनाभाव तम (अन्धकार) है तथा च भावरूप अज्ञानमें दृष्टान्त कैसा होगा सो ठीक नहीं चलनादि क्रिया और नीलादि रूपवान् होनेसे अन्धकार भी द्रव्यही है अतएव कहा है "तमोनाम द्रव्य बहलविरल मेचकचल प्रतीत केनापि क्वचिदपि न बाधश्च ददृशे । जतः कल्प्यो हेतुः प्रमितिरपि शाब्दी विजयते निरालोक चक्षु प्रथयति हि तद्दर्शनवशात् ॥" इति ॥ इति अविद्यानुमानपूर्वपक्ष ॥ १३ ॥ तदपि न क्षोदक्षमम् अज्ञानेऽप्यनभिमताज्ञानान्तरसाधने अपसिद्धान्तापातात् । तदसाधने अनैकान्तिकत्वात् ॥ १४ ॥ उक्त अविद्यानुमानका खण्डन-(तदपिन क्षोदक्षममित्यादि) तात्पर्य-अद्वैतवादी प्रमाणज्ञानको अज्ञान (अविद्या) मूलकत्व मान लेते हैं. उस अज्ञानके मूलभूत अज्ञानान्तर नहीं मानते हैं अब उक्त अनुमानसे अज्ञानको भी अज्ञानान्तरमूलक मानोगे तो सिद्धान्त विरुद्ध होगा अतः स्वसिद्धान्त रक्षाके लिये अज्ञानमे अज्ञानान्तरमूलकत्व नही साधन करोगे तो अप्रकाशितार्थ प्रकाशकत्वरूप हेतु साध्या- भाववान्में रहनेवाला होनेसे अनेकान्तरूप हेत्वाभास दूषित होगा। तात्पर्य यह है कि अप्रकाशितार्थ प्रकाशकत्वरूप हेतुसे ज्ञायमान (स्वप्रागभावेत्यादि) साध्यविषयक अनुमितिको भी अप्रकाशितार्थप्रकाशकत्वस्वीकार करना होगा अन्यथा प्रकाशितार्थ प्रकाशकत्व अथवा अप्रकाशकत्व होगा । एवञ्च तादृश अनुमितिमैं हेतु तो रह गया. परन्तु अनुमातकविषयीभूत अज्ञानका आदरक अज्ञानान्तर न मान- नेसे स्वविषय आवरण पूर्वकत्वरूप साध्य न होनेसे हेतुका अनैकान्त्य होगा ॥ १४ ॥ दृष्टान्तस्य साधनविकलत्वाच्च न हि प्रदीपप्रभाया अप्रका- शितार्थप्रकाशकत्वं सम्भवति ज्ञानस्यैव प्रकाशकत्वात् सत्यपि प्रदीपे ज्ञानेन विना विषयप्रकाशासम्भवात् प्रदीपप्र- भायास्तु चक्षुरिन्द्रियस्य ज्ञानं समुत्पादयतो विरोधि सन्त- सनिरासनद्वारेणोपकारकत्वमात्रमेवेत्यलमतिविस्तरेण ॥ प्रतिप्रयोगश्च विवादाध्यासितमज्ञानं न ज्ञानमात्रब्रह्माश्रितम् ।
( ९४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। '[ रामानुज- अज्ञानत्वाच्छुक्तिकाद्यज्ञानवदिति। ननु शुक्तिकाद्यज्ञानस्याश्र- यस्य प्रत्यगर्थस्य ज्ञानमात्रस्वभावत्वमेवेति चेन्मैवं शङ्किष्ठाः। अनुभूतिर्हि स्वसद्भावेनैव कस्यचिद्वस्तुनो व्यवहारानुगुणत्या- पादकस्वभावाज्ञानावगतिसंविद्वित्त्यादिपरनामा सकर्मकानु- भवितुरात्मत्वं ज्ञानत्वमित्याश्रयणात् ॥ १५ दोषान्तरभी कहते हैं (दृष्टान्तस्येति) प्रदीपप्रभा अप्रकाशित अर्थ प्रकाशक नहीं किन्तु ज्ञानही सर्वत्र अर्थ प्रकाशक है इसमें युक्तिभी कहते हैं (सत्यपीति) दीपके रहते हुएभी ज्ञानके बिना विषयका प्रकाशन नहीं होता साक्षात् अथवा परम्परासे विषयप्रकाशक मानो तो इन्द्रियमें व्यभिचार भी होगा, क्योंकि इन्द्रिय ज्ञानको उत्पन्न करता है प्रदीप प्रभाके वलविरोधी अन्धकारको निवारण करती है अत प्रदीप केवल उपकारक मात्र है । अप्रकाशित अर्थका प्रकाशक नहीं विपरीत अनुमानभी है अज्ञान ज्ञानस्वरूप ब्रह्मनिष्ठ नहीं होसक्ता । क्योंकि वह अज्ञान है जैसे शुक्तिमें रजत विषयक अज्ञान ज्ञानस्वरूप ब्रह्मवृत्ति नहीं है वैसेही प्रपञ्च विषयरूप अज्ञानभी ब्रह्मके आश्रित नहीं होसकता जीवज्ञान स्वरूपमात्र नहीं किन्तु ज्ञाता है अत अज्ञानका आश्रय ज्ञानस्वरूप नहीं होसक्ता यदि कहो शुक्तिरजतादि अज्ञानका आधार प्रत्यगर्थ (जीवात्मा) भी ज्ञानस्वरूप है सो नहीं कहसकते क्योंकि अनुभूति (ज्ञान) स्वसत्तासे किसी वस्तुको व्यवहार योग्यता आपादक ज्ञानादिशब्दवाच्य है अर्थात् ज्ञान वा संवित्का स्वयंप्रकाश और विषय प्रकाशकत्व स्वभाव है ज्ञानके बिना विषय प्रकाश नहीं होगा और विषय प्रकाशके बिना हानोपादानादि व्यवहार भी नहीं होसक्ता । ज्ञान, अवगति, संवित्, अनुभूति यह सब पर्याय शब्द हैं । ज्ञान निर्विषय न होनेके कारण जो विषयहोगा वह कर्म है अत सकर्मक और अनुभविता आत्माका धर्म विशेष है अभिप्राय यह है कि संवित् पर्याय ज्ञान सिद्ध होगा वा नहीं ? यदि सिद्ध होगा तो आकाशके रूपकी समान शून्य होगा । यदि सिद्धि रही तो सम्बन्ध प्रमाण सविषय होनेसे सकर्मक होगा। यदि कहो संवित् निर्विषय है तो किसकी वित्ति और किसके प्रति है यह कहना पडेगा क्योंकि वित्ति प्रकाशरूप है अतः वित्ति किसीके प्रति सिद्धि होती है। यदि आत्माकी वित्ति कहो तो आत्माका आश्रय सिद्ध होगा औरभी ज्ञानमें विषयादि धर्म हैं या नहीं ? यदि नहीं हैं, तो शून्यमात्र होगा, यदि विषयादि कहो तो सधर्मकमात्र होगा ॥ १५ ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ९५ ) ननु ज्ञानरूपस्यात्मनः कथं ज्ञानगुणकत्वमिति चेत् तदसत् यथाहि मणिद्युमणिप्रभृति तेजोद्रव्यं प्रभावद्रूपेणावतिष्ठमानं प्रभारूपगुणाश्रयः । स्वाश्रयादन्यत्रापि वर्त्तमानत्वेन रूपत्वेन च प्रभाद्रव्यरूपापि तच्छेषत्वनिबन्धनगुणव्यवहारा एवमयमात्मा स्वप्रकाशचिद्रूप एव चैतन्यगुणः ॥ तथा च श्रुतिः 'सदा सैन्ध- वघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नरसघन एव एवं वा अरे अयमात्मा- ऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्यो- तिर्भवति न विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते । अथ यो वेदेदं जिघ्राणेति स आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुष एष हि द्रष्टा श्रोता रसयिता घ्राता मन्ता बोद्धा कर्त्ता विज्ञानात्मा पुरुषः” इत्यादिका श्रुतिरपि ॥ १६ ॥ ( ननु इति ) “ सत्य ज्ञानमनन्त ब्रह्म ” इत्यादि श्रुतियोंसे आत्माको ज्ञानस्व- रूपत्व प्रतिपादन होता है । उसको ज्ञानाश्रयत्व कैसे कहते हो ? यहभी अयुक्त है क्योंकि जिस प्रकार मणि, सूर्य्य, दीपादि तेजोद्रव्य प्रभा और प्रभावद् रूपसे वर्तमान होते हुएभी प्रभारूप गुणका आश्रय रहता है । यद्यपि प्रभाप्रभावद्रव्यका गुणभूत है तथापि प्रभातेजोद्रव्यही है शौक्ल्यादिके समान गुण नहीं क्योंकि शौक्ल्यादि गुण द्रव्य देशहीमें रहता है प्रभा उसके आश्रय मण्यादि द्रव्यसे अन्यत्र भी रहती है अर्थात् दीपक एक छोटीसी जगहपर रहता है परन्तु उसकी प्रभा बहुत दूरतक व्याप्त रहती है शुक्लादिगुणमें रूप नहीं रहता है परन्तु प्रभामें रूप रहता है अतः प्रभा द्रव्य है तथापि सदा दीपादि द्रव्याश्रित एव तादृश द्रव्यका शेषभूत होनेसे प्रभामें गुणत्व व्यवहार होता है । उसी प्रकार आत्माभी स्वयंप्रकाशरूप ज्ञानस्वरूप और ज्ञानगुणवान् भी है । श्रुतिभी कहती है ( स यथेत्यादि ) जैसे अनन्तर-अन्तरङ्ग और बहिरंग भावशून्य होकर समस्त प्रदेशमें सैन्धवखण्ड ( लवण ) एक रस रहता है वैसेही यह आत्माभी अनन्तर अबाह्य अर्थात् धर्म धर्मी रूप समस्त अंशोंमें ज्ञान- स्वरूप है । शरीरीत्वावस्थामेंभी ज्ञानात्मकत्वप्रतिपादक वाक्य कहते हैं ( विज्ञानघन एव इति ) ज्ञानत्वको स्वयं प्रकाशकत्व ज्ञापनके लिये कहते हैं-( अत्राय पुरुष इति ) पुरुषः आत्मा स्वयं ज्योति स्वयंप्रकाश है आत्माके स्वरूपभूत ज्ञान और धर्मभूत ज्ञानका परस्पर भेद प्रतिपादक श्रुति कहते हैं ( न विज्ञातुरिति ) ज्ञानाश्रय आत्माके