भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( ७८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-

बन्ध और संगका परस्पर भेद कहते हैं । परस्पर एकके प्रदेशमें अन्यके प्रवे- शका नाम बन्ध है यथा जल और मृत्तिका मिलकर जो पिण्ड होता है उसमें जल और मृत्तिका दोनों रहते परस्पर संयोगमात्रका संग है जैसे घटपटका संग है एव स्फटिक और जपाकुसुमका संग है उक्त हेतुमें आप्तोक्ति भी प्रमाण देते हैं ( पूर्व- प्रयोगेत्यादि ) पूर्वप्रयुक्त कुलालके व्यापारसे यथा चक्रभ्रमण होता है असंग होनेसे जिस प्रकार तुम्बिका ऊपर जाती है तिसी प्रकार असंग होनेसे आत्मा भी ऊपर जाता है बन्ध छेदसे एरण्डबीज जिस प्रकार ऊपर जाता है उसी प्रकार आत्मा भी संसारबन्धमे छूटनेपर ऊपर जाता है । गतिपरिणाम गतिस्वभावसे यथा अग्निशिखा ऊपर जाती है तद्वत् आत्मामें भी ऊपर गमन अविरुद्ध है ॥ ४४ ॥ अतएव पठन्ति--"गत्वा गत्वा निवर्त्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः। अद्यापि न निवर्त्तन्ते त्वालोकाकाशमागताः ॥” इति ॥४५॥ ( अतएवेति ) चन्द्रसूर्यादि जितने ग्रह हैं वह सब स्वस्वनियतकाल नियतदेश- पर्यन्त ऊपर जा जाकर लौट जाते हैं । परन्तु लोकाकाशके ऊपर आलोकाकाशमें प्राप्त परम मुक्त आजतक नहीं लौटे हैं ॥ ४५ ॥ अन्ये तु-गतसमस्तक्लेश तद्वासनस्यानावरणज्ञानस्य सुखैकता- नस्यात्मन उपरिदेशावस्थानं मुक्तिरित्यास्थिपत । एवमुक्तान् सु- खदुःखसाधनाभ्यां पुण्यपापाभ्यां सहितान्नवपदार्थान् केचना- ङ्गीचक्रु । तदुक्तं सिद्धान्ते-'जीवाजीवौ पुण्यपापयुतावास्त्रव संवरौ निर्जरणं बन्धो मोक्षश्च नव तत्त्वानि' इति। सङ्ग्रहे प्रवृत्ता वयमुपरता स्म ॥ ४६ ॥ पूर्वोक्त निरन्तर उपरिगमनरूप मुक्तिसे भिन्न देशविशेष स्थितिरूप मुक्तिवादीका मत कहते हैं । ( अन्ये तु इति ) वासना संस्कारसहित समस्तदुःख नष्ट होनेपर ज्ञानावरण दर्शनावरणादि शून्य निरतिशय सुखस्वरूप आत्माको लोकाकाशमें उप रिस्थान प्राप्ति ही मुक्ति है। नौ पदार्थवादियोंके मतको कहते हैं, सुखदुःखका साधन पुण्य पाप और पूर्वोक्त जीवाजीवास्त्रवबन्ध, संवर निर्जरा और मोक्ष मिलाकर नौ तत्त्व कोई कोई मानते हैं ॥ ४६ ॥ अत्र सर्वत्र सप्तभङ्गिन्याख्यं न्यायमवतारयन्ति जैना । स्याद- स्ति स्यान्नास्ति स्यादस्ति च नास्ति च स्यादवक्तव्य स्याद-