भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् [ भाषाटीकासमेतः । ( ७७ ) यत् कृतं प्रणिधानं मुक्तस्य तदभावेऽपि पूर्वसंस्कारादालोकान्तं गमनमुपपद्यते यथा वा मृत्तिकालेपकृतमलाबुद्रव्यं जलेऽधः पतति पुनरपेतमृत्तिकाबन्धनमूर्ध्वं गच्छति तथा कर्मरहित आत्मा असङ्गतत्वादूर्ध्वं गच्छति बन्धच्छेदादेरण्डबीजवच्चोर्ध्व- तिस्वभावाच्चाग्निशिखावत् ॥ ४३ ॥ मोक्षपदार्थको निरूपण करते हैं-(मिथ्यादर्शन-विरत्यादि) जो तत्त्वार्थ श्रद्धानादिरूप बन्ध कारणका निरोध है वह अभिनव कर्मके अभावसे होता है वह भी निर्जराके हेतुसन्निधानसे अर्जित कर्मके निरास होनेसे कर्मोंके अत्यन्त उच्छेदका नाम मोक्ष है अतएव बन्धहेतु और भवहेतु निर्गममे कृतकर्मकी अत्यन्तनिवृत्तिको मोक्ष कहा है अनन्तर आत्मा लोकाकाशसे ऊपर जालोकाकाशमें पतंगेके समान ऊपर उड़ता रहता है। मुक्तात्मामें क्रिया न होनेसे ऊर्ध्वगमन असम्भव है ऐसी आशङ्काका परिहार करते हैं-(यथा हस्तेत्यादि) जिस प्रकार कुम्हारके चक्र घुमाकर हस्त और दण्डका व्यापार शान्त होनेपर भी पूर्वव्यापार वेगबलसे चक्र घूमता रहता है तिसी प्रकार संसारदशामें मोक्षप्राप्तिके लिये किये हुए प्रणिपतन ध्यानादि आत्माके विपुल कर्म मुक्तावस्थामें कर्म न होनेपरभी पूर्व कर्म ही स्वसंस्कारद्वारा आलोकाकाशान्त गमनके साधक होते हैं। असंग तथा बन्धाभाव एवं स्वाभावरूप हेतुत्रयसे आत्माको ऊर्ध्व- गतिसमर्थन-(यथा वेत्यादि) अथवा असंगसे भी ऊर्ध्वगमन सम्भव है जैसे मृत्तिकासे लिप्त तुम्बिका जलमें नीचे डूब जाती है परन्तु मृत्तिकासंयोग टूट जानेपर स्वभा- वतः ऊपर आजाती है तिसी प्रकार कर्मसे बद्ध आत्माका ऊर्ध्वगमनस्वभाव न रह- नेपर भी कर्मबन्धसे मुक्त होनेपर निस्सग होनेके कारण स्वभावत ऊपर उड़ता है इसीमें दृष्टान्तद्वय और भी देत हैं जिस प्रकार एरण्डका फल सूखके फटजानेपर बीज बन्धरहित होनेके कारण ऊपर उड़जाता है तिसीप्रकार आत्मा भी बन्धरहित होनेसे ऊपर उड़जाता है यथावा अग्निकी ज्वाला स्वभावसे ऊपर जाती है तथेव आत्मा भी ऊर्ध्वगति स्वभाव है ॥ ४३ ॥ अन्योन्यं प्रदेशानुप्रवेशे सत्यविभागेनावस्थानं बन्धः परस्पर- प्राप्तिमात्रं सङ्ग । तदुक्तं 'पूर्वप्रयोगादसङ्गत्वान् बन्धच्छेदात्तथा गतिपरिणामाच्चाविरुद्ध कुलालचक्रवद् व्यपगतलेपालाबुवदे- रण्डबीजवद्ग्निशिखावच्च' इति ॥ ४४ ॥