भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( ८२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-

उत्तर देते हैं। यही स्याद्वादका मुख्य सिद्धान्त है इसको स्वीकार करनेसे वे सब विरक्त होकर निरुत्तर होजाते हैं अतः स्याद्वादियोंकी विजय सर्वत्र होजाती है ॥ ५२ ॥ यद्वोचदाचार्य्य स्याद्वादमञ्जर्य्याम्-“अनेकान्तात्मकं वस्तु गो- चरः सर्वसंविदाम् । एकदेशविशिष्टोऽर्थो न यस्य विषयो मतः ॥ न्यायानामेकनिष्ठानां प्रवृत्तौ श्रुतवर्त्मनि । सम्पूर्णार्थविनिश्चायि स्याद्वस्तु श्रुतमुच्यते ॥” इति ॥ ५३ ॥ समस्तज्ञानका विषय वस्तु अनेकान्त ( अनिश्चित ) रूप है एकदेशविशिष्ट सत् या असत् इत्यादि एकान्त ज्ञानका विषय नहीं हो सकता । अस्ति नास्ति इत्यादि एकदेशविशिष्टार्थकशब्दको सुनकर प्रवृत्तको समस्त अर्थोंका निर्णायक स्यात्शब्द ही श्रुत है ॥ ५३ ॥ “अन्योन्यपक्षप्रतिपक्षभावाद्यथापरे मत्सरिणः प्रवादः । नयानशे- षानविशेषमिच्छन्नपक्षपाती समयस्तथार्हतः ॥” इति ॥ ५४ ॥ ( अन्योन्येति ) परस्पर एकका पक्ष दूसरेका प्रतिपक्ष होनेसे जन्यवादियोंका सिद्धान्त मत्सरग्रस्त है । जैसे सांख्य कहते हैं कार्य सत् है तब नैयायिक उसी कार्यको असत् कहते हैं, मीमांसक शब्दको नित्य मानते हैं परन्तु नैयायिक अनित्य मानते हैं नैयायिक आकाश कालादिको नित्य मानते हैं तो वेदान्ती उसको भी कार्य मानते हैं वेदान्ती जगत्के उपादान ब्रह्मको कहते हैं तो सांख्यवादी प्रकृतिको कहते हैं और नैयायिक परमाणुको कहते हैं वे सब पदार्थोंको स्थिर मानते हैं तो बौद्ध क्षणिक मानते हैं इसी प्रकार एकका पक्ष दूसरेका विपक्ष होजानेसे परस्पर स्वपक्षस्थापन ओर परपक्ष खण्डनके लिये मत्सर बढ जाता है । परन्तु सप्तभंगीन्यायसे समानरूप सत्, असत्, क्षणिक, नित्यादि सब सर्वत्र समान माननेके कारण आर्हतसिद्धान्त पक्षपातशून्य है ॥ ५४ ॥ जिनदत्तसूरिणा जैनं मतमित्थमुक्तम्-“बलभोगोपभागोनामु- भयोर्दानलाभयो । अन्तरायस्तथा निद्रा भीरज्ञानं जुगुप्सि- तम् । हिंसा रत्यरती रागद्वेषौ रतिरिति स्मरः ॥ शोको मिथ्या- त्वमेतेऽष्टादश दोषा नयस्य च॥ जिनो देवो गुरु सम्यक् तत्त्व- ज्ञानोपदेशक । ज्ञानदर्शनचारित्राण्यपवर्गस्य वर्तिनि ॥ स्याद्वा- दस्य प्रमाणे द्वे प्रत्यक्षमनुमापि च । नित्यानित्यात्मकं सर्व नव तत्त्वानि सप्त वा । जीवाजीवौ पुण्यपापे चास्रवः संवरोऽपि च ।