भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 316 में से

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । ( ८३ ) बन्धो निर्जरणं मुक्तिरेषां व्याख्याऽधुनोच्यते ॥ चेतनालक्षणा जीवः स्यादजीवस्तदन्यकः । सत्कर्मपुद्गला पुण्यं पापं तस्य विपर्ययः ॥ आस्रवः कर्मणां बन्धो निर्जरस्तद्वियोजनम् । अष्टकर्मक्षयान्मोक्षोऽथान्तर्भावश्च कैश्चन । पुण्यस्य संस्रवे पापस्यास्रवे क्रियते पुनः ॥ लब्धानन्तचतुष्कस्य लोकागूढस्य चात्मन । क्षीणाष्टकर्मणो मुक्तिर्निव्यावृत्तिर्जिनोदिता ॥५५॥५६॥ पूर्वोक्त तत्त्वोंको संक्षेपसे जिनदत्तसूरिने इस प्रकार कहा है कि बल, भोग, उपभोग, और दान, लाभके प्रतिबन्धक निद्रादि १८ दोष जिनमें न हो एवम्भूत जो तत्त्वज्ञा - नका उपदेशक गुरु जिनदेव है । ज्ञानदर्शनादि मोक्षका मार्ग है स्याद्वादमें प्रत्यक्ष और अनुमान दो प्रमाण हैं अनेकान्तात्मक सब तत्त्व है किसीके मतमें नौ तत्त्व हैं किसीके मतमें सात हैं जीवाजीवेत्यादि तत्त्व पूर्वोक्त हैं। चेतनास्वरूप जीव है इससे विपरीत अजीव है शुभ कर्मका पुद्गल पुण्य और शुभ कर्मका विपर्यय पाप है । कर्म- बन्धका नाम आस्रव है कर्मनाशको नाम निर्जर है आठों कर्मोंके क्षयसे कोई २ मोक्ष मानते हैं । कोई २ पुण्यके आस्रव पापके संस्रवमें उसका अन्तर्भाव है कहते हैं आनन्दादिको प्राप्त लोक सम्बन्ध शून्य पुनरावृत्तिरूप मुक्ति आठों प्रकारके कर्मोंके नाशसे होती है ऐसा जिनदेवने कहा है ॥ ५५ ॥ ५६ ॥ सरजोरणा भैक्षभुजो लुञ्चितमूर्द्धजा । श्वेताम्बराः क्षमाशिला निःसङ्गा जैनसाधवः ॥ लुञ्चिता पिच्छिकाहस्ता पाणिपात्रा दिगम्बराः । ऊर्द्धाशिनो गृहे दातुर्द्वितीया स्युर्जिनर्षय ॥ भुङ्क्ते न केवलं न स्त्री मोक्षमेति दिगम्बरः । प्राहुरेषामयं भेदो महान् श्वेताम्बरैः सह ॥” इति ॥ ५७ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे आर्हतदर्शनम् ॥ ३ ॥ जैनसंन्यासियोंके आचरणको कहत हैं—धूलिसे लिप्त अर्थात् स्नानादि न करनेसे देहमें सदा मैल भरा रहता है भिक्षान्न भोजन केशळुञ्चन क्षमावान् और निःसङ्ग श्वेताम्बर जैनसाधुओंका आचरण होता है । केशळुञ्चन हाथमें छोटेछोटे जीवोंको उडानेके लिये पिच्छिका रखना, जलपात्र रखना, खडेखडे भिक्षा देनेवालेके घरमें भोजन करना यह दिगम्बर नामक जैनसंन्यासियोंका अनुष्ठान है वे अकेले भोजन नहीं करते स्त्रीसंभोग नहीं करते मुक्त समझे जाते हैं इत्यादि श्वेताम्बरोंसे बहुत भेद है ॥ ५७ ॥ इति आर्हतमत समाप्त ।

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