सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(८०) , सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-
कथञ्चिदस्तीति स्यात्पदात् कथञ्चिदिति अयमर्थो लभ्यत इति नानर्थक्यम् । तदाह-“स्याद्वादः सर्वथैकान्तत्यागात् किं- वृत्त चिद्विधौ । सप्तभङ्गिनयापेक्षो हेयादेयविशेषकृत् ॥” इति ॥ ४८ ॥ यथोक्तमिति पूर्व कहे हुए वाक्यमें जो स्यात्शब्द है वह अनिश्चयका बोधक और प्रतिपादनीय प्रधान अर्थमें विशेषण भी है यथा प्रथमवाक्य स्यादस्ति है इसमें अस्ति शब्दका अर्थ प्रधान है स्यात्पद तिङन्त क्रियाबोधकके सदृश अव्यय होनेसे उसका अर्थ कथञ्चित् है तथा च कथञ्चित् है ऐसा अर्थ हुआ यदि स्यात्पद अनिश्चयार्थक न होता तो स्यात्पद और अस्तिपद दोनों अस् धातुसे निष्पन्न होनेके कारण समानार्थक होनेसे स्यात्पद व्यर्थ होजायगा, क्योंकि अस्तिपदसे वस्तुकी सत्ता और नास्तिपदसे निषेध हो जाता है । कथञ्चित् अर्थ मानो तो किसी एक रूपसे है अन्य रूपसे नहीं अर्थात् एकत्र होता है इसलिये स्यात्शब्द सार्थक होता है अतएव कहा है स्यात् शब्द किम्शब्दसे निष्पन्न जो कथम् शब्द उससे चित्प्रत्यय विधान करनेसे जो पद बनता है उसके अर्थको कहनेवाला अर्थात् कथञ्चित् अर्थ कहनेके कारण अनेकान्त पक्षको छोडकर सर्वथा एकान्त पक्ष ही मानाजाय तो त्याग उपादानादि व्यवहार सब नष्ट होजायेंगे ॥ ४८ ॥ यदि वस्तुस्त्येकान्तत सर्वथा सर्वदा सर्वत्र सर्वात्मनास्तीति न उपादित्साजिहासाभ्यां क्वचिव कदा केनचित् प्रवर्त्तेत निव- र्त्तेत वा प्राप्तप्रापणीयत्वहेयज्ञानानुपपत्तेश्च । अनेकान्तपक्षे तु कथञ्चित् क्वचित् केनचित् सत्त्वेन हानोपादाने प्रेक्षावतामुप- पद्येते ॥ ४९ ॥ उसीको उपपादन करते हैं-(यदीति ) यदि वस्तुका एकान्त अर्थात् अस्तित्वादि निश्चित एकही स्वरूप होता तो सर्वत्र सर्वकालमें सब प्रकार हान उपादानादि समस्त रूपसे रहजायगा अत घटादि किसी वस्तुके ग्रहण त्यागादिके लिये न कोई प्रवृत्त ही होगा न कोई कदापि कही भी निवृत्तही होगा क्योंकि जो वस्तु प्राप्त हो चुकी है उसकी प्राप्तिके लिये पुन उद्योग नहीं किया जाता है अनेकान्तपक्षमें किसीके पास किसी कालमें किसीरूप अर्थात् दर्शनीयरूपसे है जलाहरणादिरूपसे नहीं है एवं 'बाहर है घरम नहीं पूर्व दिवस था आज नहीं' इत्यादि अनेक रूपसे सत्ता और तदभाव दोनों होनेसे प्रवृत्ति निवृत्ति दोनों उपपन्न होती है ॥ ४९ ॥