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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पुरो वाक् ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैः त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् । यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ सङ्कीर्त्य केशवम् ॥ —विष्णुपुराण ६.२.१७ विष्णुपुराण के अनुसार कृतयुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से और द्वापर में अर्चन करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य कलियुग में मात्र केशव के संकीर्तन से प्राप्त हो जाता है। कलियुग में मानवमात्र की आध्यात्मिक शक्ति में क्षीणता दृष्टिगोचर होती है। इसके लिए त्याग, तितिक्षा तथा धैर्य की आवश्यकता है। अध्यात्मिक साधक को बाह्य एवं आन्तरिक रूप से शुद्ध रहना चाहिए। ये यथेष्ट आचरण कलियुग में सम्भव नहीं है। तन्त्र में इसकी इतनी आवश्यकता नहीं है। फिर तन्त्र में तो स्त्री तथा शूद्र दोनों का अधिकार होता है। निगम के क्रियाकलाप त्रिवर्ण के लिए सीमित हैं और फिर उनमें से अधिकांश क्रियाएँ कलिवर्ज्य भी हैं। किन्तु आगम ने अपना द्वार प्रत्येक वर्ण के लिए खोल रक्खा है। तन्त्र या आगम का यही सार्वभौम तथा सार्ववर्णिक रूप उसकी लोकप्रियता का कारण है। समर्थ एवं योग्य गुरु और योग्य अधिकारी शिष्य ही तन्त्र विद्या की चरितार्थता में प्रधान हेतु हैं। क्योंकि तान्त्रिक गुरु प्रयोग के द्वारा अधिकारी शिष्य को ही शास्त्र की सत्यता का प्रमाण देकर उसे 'तन्त्र' की व्यावहारिक शिक्षा देते हैं। फलतः तन्त्र का मार्ग सर्वसाधारण के लिए उन्मुक्त होने पर भी अधिकारी की अपेक्षा रखता है। योग्य गुरु की शिक्षा की उचित समीक्षा की जाय तो फल की सिद्धि में विलम्ब नहीं होता और इसी प्रयोगात्मकता के कारण तन्त्र भी आधुनिक विज्ञान के समकक्ष ठहरता है। आज दोनों की ही मानव मात्र को आवश्यकता है—व्यवहार में विज्ञान की तथा आध्यात्म विद्या में तन्त्र की। महानिर्वाणतन्त्र में कहा भी है—विना ह्यागममार्गेण कलौ नास्ति गतिः प्रिये । सात्त्वतसंहिता का प्रस्तुत संस्करण अलशिङ्ग कृत संस्कृत भाष्य एवं इदं प्रथमतया कृत हिन्दी व्याख्या के साथ भगवान् विष्णु एवं उनकी शक्ति महालक्ष्मी के उपासकों के सम्मुख प्रस्तुत है। प्रस्तुत संस्करण का मूल एवं संस्कृत भाष्य सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से मुद्रित, आचार्य श्रीव्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा सम्पादित संस्करण पर आधृत है। 'सुधा' हिन्दी व्याख्या में पूर्णरूप से इसी संस्करण से सहायता ली गई है। इसके लिए मैं गुरुवर्य आचार्य श्रीव्रजवल्लभ द्विवेदी का हृदय से आभारी हूँ।

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