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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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८ सात्वतसंहिता सात्वतसंहिता पाञ्चरात्र आगम की प्रमुख संहिताओं में से एक है । लक्ष्मीतन्त्र एवं अहिर्बुध्न्य संहिता से प्रस्तुत संहिता का अविनाभाव सम्बन्ध है । जैसे 'जितन्ता' श्लोक मन्त्र का स्वरूप लक्ष्मीतन्त्र में है किन्तु अहिर्बुध्न्य एवं सात्वतसंहिता में मात्र प्रतीक का ग्रहण किया गया है । इस संहिता को बिना पारमेश्वर संहिता, ईश्वर संहिता और जयाख्य संहिता के नहीं समझा जा सकता है । सौभाग्य से अलशिङ्ग का भाष्य सात्वत संहिता पर प्राप्त है जिससे इस संहिता को समझने में सरलता होती है । अलशिङ्ग का भाष्य आदरणीय गुरुकल्प प्रो० व्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा अत्यन्त विद्वत्तापूर्ण रूप से सम्पादित है जिसके लिए मैं और पाञ्चरात्र आगम के समस्त विद्वान् पाठक अत्यन्त ऋणी हैं । यह भाष्य सामने न होता तो सम्भवतः इसकी हिन्दी ही न हो पाती । अहिर्बुध्न्य संहिता की हिन्दी व्याख्या में कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा यह मैं क्या कहूँ ? बस गुरु स्मरण ही कल्प है । पाञ्चरात्र आगम की संहिताओं को बचाना ही मेरा उद्देश्य है । मैं अनुवाद इसीलिए करता हूँ कि मुझे आगम ग्रन्थों की विरासत में जो शास्त्र प्राप्त हुए हैं उन्हें out of Print (मूल्य देकर भी सहजता से प्राप्त न हो सके) होने से बचाया जा सके । इन ग्रन्थों की हिन्दी करना और प्रयोग-पद्धति को जानकर प्रयोग करना अलग- अलग पहलू हैं । मैं प्रयोग पद्धति बिलकुल नहीं जानता । फिर भी जो अनुवाद करके ग्रन्थों को बचाने का प्रयास मैं कर रहा हूँ उसमें (पद्धति न जानकर भी अनुवाद करना) गुरु कृपा ही कारण है । अतः पद्धति जानने के लिए भक्तगण किसी गुरु की खोज करें । एक सन्त का दूरभाष पर मुझे आग्रह प्राप्त हुआ कि आपके पास जो भी इस प्रकार के ग्रन्थ हों उनकी फोटो प्रति आप मुझे दे दें । मेरे पास ऐसे कोई ग्रन्थ नहीं हैं जो पहले छपे न हों और अभी तक मैंने जो अनुवाद भी किए हैं, उन्हीं छपे हुए ग्रन्थों के अनुवाद किए हैं । मैं एक पुस्तक (जो बाजार में उपलब्ध न हो) उसे प्राप्त कर तुरन्त अनुवाद में संलग्न हो जाता हूँ और मेरे प्रकाशक 'चौखम्बा' के श्रेष्ठीगण सहयोग प्रदान कर देते हैं । अतः विद्वान् पाठकों से निवेदन है कि पद्धति के लिए गुरु खोजें और अनुपलब्ध तन्त्रग्रन्थों को मुझे उपलब्ध कराएँ । मेरे पास हैं नहीं । इसीलिए तो निवेदन है । इससे हमारी संस्कृति की रक्षा हो सकेगी । शास्त्रों की रक्षा करना समस्त मानवमात्र का कर्तव्य है । यह आश्चर्य है कि मुझे श्री सर्वजीत सिंह जी ने (जो लखनऊ में पेशे से डॉक्टर हैं और सरदार हैं) पाराशर संहिता के विषय में यह फोन पर बताया कि यह ग्रन्थ तिरुपति से १९६७ में मात्र १०० कापी ही छपा था, जिसकी अत्यन्त जीर्ण प्रति मैंने किसी के हाथ में सारनाथ में ३०.५.२००७ को देखी है । दुःख है कि इसकी फोटो कापी जीर्णता के कारण नहीं की जा सकी । यह ग्रन्थ ८०० पृष्ठों का है जिसमें हनुमानजी के चार अष्टोत्तर शतनाम हैं । इनमें से एक विभीषण कृत भी है । हनुमान