भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

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५२ सात्वतसंहिता अथ षोडशसंख्यं यन्नाभेः प्रणवपूर्वकम् ॥ ४२ ॥ 'अथ षोडश संख्यं यन्नाभेः प्रणवपूर्वकम् ' (४२) पर्यन्त चौथे मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार है—'ॐ अः नमो भगवते अनिरुद्धाय' । यह तेरह अक्षर का मन्त्र है ॥ ४२ ॥ पूर्वोक्तलक्षणानां तु पदानां प्राङ्निवेश्यते । अस्मान्मन्त्रत्रयाद् विद्धि द्वयं प्राङ्‌मन्त्रसंख्यया ॥ ४३ ॥ एक एकार्णरहितः पदभेदमतः शृणु । अब इन मन्त्रों में पूर्वोक्त की भाँति पद संख्या का निवेश सुनिए—इन चारों मन्त्रों में पदों की संख्या समान है और मन्त्रों में पहला मन्त्र तेरह अक्षर का है, यह कह आये हैं । शेष तीन मन्त्रों में दो में १३-१३ अक्षर संख्या समान है । केवल दूसरे मन्त्र में अक्षर संख्या बारह है ॥ ४३-४४ ॥ पदद्वयं तु सर्वेषामाद्यमेकाक्षरं स्मृतम् ॥ ४४ ॥ द्व्यक्षरं च तृतीयं तु चतुर्थं चतुरक्षरम् । पञ्चाक्षरं पञ्चमं वै त्रयाणां समुदाहृतम् ॥ ४५ ॥ अब पदों में अक्षर संख्या कहते हैं—सभी मन्त्रों के आदि पद में एक-एक अक्षर समान हैं । दूसरे पद में भी दो अक्षर हैं । तृतीय और चतुर्थ पद चार-चार अक्षर वाले हैं । तीन मन्त्रों में पाँचवाँ पद पाँच-पाँच अक्षर का है । केवल तृतीय मन्त्र के पञ्चम पद 'प्रद्युम्नाय' में चार अक्षर हैं ॥ ४४-४५ ॥ तदेकस्य चतुर्वर्णं प्रद्युम्नाख्यस्य लाङ्गलिन् । एवं स्वप्नपदस्थस्य समासात् परिकीर्तितम् ॥ ध्यानार्चनं समन्त्रं च भक्तानां हितकाम्यया ॥ ४६ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां स्वप्नव्यूहसमाराधनं नाम चतुर्थः परिच्छेदः ॥ ४ ॥ — ५ ❖ २ — इस प्रकार, हे सङ्कर्षण ! स्वप्नपद के चारों मन्त्रों का संक्षेप में यहाँ ध्यान एवं अर्चन भक्तों की हित की दृष्टि से कहा गया है ॥ ४६ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के स्वप्नव्यूहसमाराधन नामक चतुर्थ परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ ४ ॥ — ५ ❖ २ —