सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमः परिच्छेदः ५७ सामान्यलक्षणानि वनमालाधराः सर्वे श्रीवत्सकृतलक्षणाः । शोभिताः कौस्तुभेनैव रत्नराजेन वक्षसि ॥ १९ ॥ किरीटमुकुटै रम्यैर्हारकेयूरनूपुरैः । ललाटतिलकैश्चित्रैः स्फुरन्मकरकुण्डलैः ॥ २० ॥ सामान्यलक्षणमाह—वनमालाधरा इति त्रिभिः ॥ १९ - २१ ॥ यहाँ तक भगवान् के चारों स्वरूपों की विशिष्टता कही गई । अब उनके सामान्य स्वरूप का वर्णन करते हैं—ये चारों प्रकार के सभी भगवान् विष्णु वनमाला धारण किये हुए हैं, श्रीवत्स के चिह्न से भूषित हैं तथा सभी अपने वक्षःस्थल पर रत्नराज कौस्तुभ धारण कर शोभित हो रहे हैं । ये विचित्र रत्नजड़ित केयूर मुकुट, मनोहर केयूर नूपुर तथा देदीप्यमान मकरा-कृति कुण्डल, ललाट में विचित्र तिलक से शोभित हैं ॥ १९-२० ॥ स्रग्वरैर्विविधैर्माल्यैः कर्पूराद्यैर्विलेपनैः । रम्यैरलङ्कृताश्चैव भावनीयाः सदैव हि ॥ २१ ॥ ये सभी अनेक प्रकार की पुष्प मालाओं से सुशोभित तथा कपूर आदि के आलेपन से तथा सुरम्य रत्नादि अलङ्कारों से समन्वित हैं । इस प्रकार के स्वरूप वाले चारों विष्णु का सदैव ध्यान करना चाहिये ॥ २१ ॥ पुनरप्यययोगेन प्रागुदङ्मध्ये दले । सितकृष्णेन वपुषा चानिरुद्धं स्मरेत् प्रभुम् ॥ २२ ॥ ईशानाद्याग्नेयान्तमप्यधःक्रमेण स्थितानां तेषां शबलरूपमाह— पुनरित्यादिभिः ॥ २२-२७ ॥ इसके बाद पुनः संहार क्रम से पूर्व और उत्तर दिशा के मध्य वाले दल में सित और कृष्ण शरीर वाले प्रभु अनिरुद्ध का स्मरण करे ॥ २२ ॥ उदक्पश्चिममध्यस्थे प्रद्युम्नं भावयेच्छदे । रूपेण कृष्णपीतेन ह्याप्यायावसरे तु वै ॥ २३ ॥ उत्तर और पश्चिम के मध्य वाले दल में कृष्ण पीत शरीर वाले प्रभु प्रद्युम्न का स्मरण करे ॥ २३ ॥ प्रत्यग्दक्षिणमध्यस्थे पीतरक्तवपुर्धरम् । स्मरेत् सङ्कर्षणं देवं प्रतिस्रोतः क्रियाविधौ ॥ २४ ॥ पश्चिम और दक्षिण के मध्य वाले दल में पीत रक्त शरीर वाले संहार क्रम में सङ्कर्षण देव का स्मरण करे ॥ २४ ॥ सा० सं० - 8