भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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५६ सात्वतसंहिता जनों को अभय प्रदान करते हैं तथा अपने बायें हाथ में विद्या के कोशभूत् शङ्खराट् (पाञ्चजन्य) को धारण किये हुए हैं। पीछे वाले अन्य दाहिने हाथ में प्रोद्यत, असि (= तलवार) तथा उसी ओर बायें हाथ में पृथ्वी पर गदा रखी गई है ॥ ९-११ ॥ तथाविधे गदा वामे निषण्णा वसुधातले। सिन्दूरशिखराकारमेकवक्त्रं चतुर्भुजम्॥ १२ ॥ अतसीपुष्पसङ्काशं वासोभृत् ताललाञ्छितम्। मुख्येन पाणियुग्मेन तुल्यमाद्यस्य वै विभोः॥ १३ ॥ सीरं चक्रं च हस्तेऽस्य मुसलं तु गदा करे। अब दूसरे भगवान् सङ्कर्षण के स्वरूप को कहते हैं—एक वक्त्र है जो सिन्दूर के पर्वत के समान विशाल एवं पीला है, चार भुजायें है, अतसी पुष्प के समान वस्त्र है, हाथ में ताल का चिह्न है, उन विभु के हाथ में हंस, चक्र, मुशल और गदा है ॥ १२-१४ ॥ प्रावृण्निशासमुदितखद्योतचयदीधितिम् ॥ १४ ॥ रत्नकौशेयवसनं मकरध्वजशोभितम् । एकवक्त्रं चतुर्बाहुं तृतीयं परमेश्वरम् ॥ १५ ॥ मुख्यहस्तद्वयं चास्य प्राग्वद् ध्येयं महामते । वामे परस्मिन् शार्ङ्गं च दक्षिणे बाणपञ्चकम् ॥ १६ ॥ तृतीय भगवान् प्रद्युम्न का स्वरूप—वर्षा काल की निशा में उदीयमान खद्योत के समान जिनकी कान्ति है, रत्न जड़ित रेशमी वस्त्र समन्वित है तथा जो मयूर- ध्वज से शोभित हैं, जिनके एक वक्त्र और चार भुजाएँ हैं, जो तृतीय परमेश्वर कहे जाते हैं, जिनके दो हाथ पूर्व के समान हैं, जिनके बायें हाथ में शार्ङ्ग धनुष तथा दाहिने हाथ में बाण-पञ्चक है, ऐसे तृतीय परमेश्वर का ध्यान करे ॥ १४-१६ ॥ अञ्जनाद्रिप्रतीकाशं सुसिताम्बरवेष्टितम् । चतुर्भुजं विशालाक्षं मृगलाञ्छनभूषितम् ॥ १७ ॥ आदिवत् पाणियुगलमाद्यमस्यापि कीर्तितम् । दक्षिणादिक्रमेणाथ द्वाभ्यां वै खड्गखेटकौ ॥ १८ ॥ अब चतुर्थ भगवान् अनिरुद्ध स्वरूप को कहते हैं—जिनका स्वरूप कज्जल के पर्वत के समान काला है, जो अत्यन्त श्वेत वस्त्रों से आवेष्टित हैं, जिनकी चार भुजायें तथा कमल के समान विशाल नेत्र है, जिनके हाथ में मृग का चिह्न है, दो हाथ आदि स्वरूप के समान है, शेष दो हाथों में दक्षिणादि क्रम से खड्ग तथा खेटक शोभित हो रहा है ॥ १७-१८ ॥