सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ सात्वतसंहिता आदिमूर्तिस्वरूपेण चतुर्मूर्तिमयेन वा। पृथक्त्वेन चतुर्मूर्तेरेकैकाकृतिनाऽप्यथ ॥ १०३ ॥ अथवा वैभवीयेन नानाकृत्यात्मना तु वै। अङ्गसङ्घं तदीयं च न्यसेत् पद्मदलाश्रितम् ॥ १०४ ॥ परिवारं बहिः पद्मात् स्वकं यो यस्य विद्यते । अर्चनार्थं भगवदवतरणक्रममाह—अथेति सार्धैः पञ्चभिः । यः साधको विशेष- व्यक्तिलक्षणं परव्यूहविभवाख्यंतत्तन्मूर्तिविशिष्टं भगवन्तमर्चितुमिच्छेत्, तं साधकं स्वबुद्ध्या संकल्प्य स्वाभिमुखं ज्ञात्वा तत्कालसमनन्तरं तदिच्छानन्तरमेव सामर्थ्यशक्तिः स्वयमेव स्पन्दतामेति । मन्त्री साधकः, यत्र कृतास्पदः, यन्मन्त्रमिच्छति तन्मन्त्रमग्नि- कणवत् सूते च । तत्स्पन्दनमात्रेणाऽग्नेः, स्फुलिङ्गवन्मन्त्रः समुद्भूतो भवतीति भावः । तन्मन्त्रमाकाशात् तारकमिव कर्णिकान्तरे हृत्कमलकर्णिकामध्ये आगतं भावयेत् । तन्मध्यात् मन्त्रमध्यात्, आराध्यं मन्त्रनाथम्, आदिमूर्तिस्वरूपेण परवासुदेवरूपेण । यद्वा चतुर्मूर्तेर्व्यूहस्य पृथक्त्वेन, एकैकाकृतिना केवलमेकैकमूर्तिरूपेण, आहोस्वित्नानाकृ- त्यात्मना वैभवीयेन रूपेण पद्मनाभादिभेदेन, उदितम् उत्पन्नं स्मरेत् ॥ १००-१०५ ॥ अब अर्चन के लिए भगवान् के अवतार का क्रम कहते हैं—जो वैष्णव साधक विशेष व्यक्तिलक्षण परव्यूहविभव नामक उन-उन मूर्तिविशिष्ट भगवान् के विग्रह की अर्चना करना चाहते हैं, उस साधक को अपनी बुद्धि से उन विभवावतारों की कल्पना मन में करके उन्हें अपने सन्मुख हुआ समझकर उसी समय अर्चना की इच्छा मन में होते ही सामर्थ्यशक्ति स्वयमेव मन में स्पन्दित हो जाती है । वैष्णव मन्त्रज्ञ साधक जहाँ कहीं भी उन विभवावतार का सान्निध्य (= आस्पद) चाहता है वहीं पर, मन्त्र रूप अग्नि कण के समान उन्हें उत्पन्न कर लेता है अर्थात् जैसे अग्नि की छोटी सी चिनगारी प्रज्वलित अग्नि बना देती है वैसे ही साधक मन्त्र रूप चिनगारी से उन्हें प्रकट कर देता है । उस मन्त्र रूप आकाश के मध्य तारों के समान हृत् कमल रूप कर्णिका के मध्य में साधक उनकी भावना करे । वह यह भावना करे कि आराध्य मन्त्र के देवता आदि मूर्ति पर वासुदेव रूप से हृत्कमल की कर्णिका में उसी प्रकार प्रगट हो गए हैं जैसे आकाश में तारे प्रगट हो जाते हैं । साधक यदि इच्छा करे तो चतुर्व्यूह में से एक-एक आकृति का एक-एक मूर्ति रूप से स्मरण करे अथवा पद्मनाभादि विभवावतारों में से जिनको चाहे उन्हें स्मरण कर उत्पन्न कर लेवे । इस प्रकार उन स्मृत देवता के अङ्ग-समूह का पद्मदल में न्यास करे । उन स्मृत देवता के जो परिवार हों उन्हें पद्म के बाहर न्यास करे ॥ १००-१०५ ॥ सशक्तिकस्य मन्त्रस्य दिक्क्रमेण हृदादि यत् ॥ १०५ ॥ न्यसेत् केसरजालस्थं पत्रमध्ये तु शक्तयः ।