भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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षष्ठः परिच्छेदः १३३ सदैव हीति, ध्यातृध्येयाविभागेन यावत्तन्मयतां व्रजेदिति, ब्रह्म सम्पद्यते तदेति च सुस्पष्टं शुद्धाद्वैतमसकृदुपदिश्यते । एतद्वाक्यजातं सर्वमद्वैतमनङ्गीकुर्वतां भवतां विरुद्धम्, भवद्भाष्यादिषु न विचारितं च । अतोऽस्मिन् विषये वयं विप्रतिपद्यामहे, इति चेत्, सत्यम् । स्वशास्त्रतया न तद्वचनजातं भाष्यादिषु(न?) विचारितम्, तथाप्येतत्सजातीय- श्रुतीतिहासपुराणवाक्यानां विचारितत्वादेषामपि चारितार्थ्यं बोध्यम् । विचारितं चैतत् सर्वमपि वेदान्ताचार्यैः पञ्चरात्ररक्षायां द्रष्टव्यम् ॥ २०५-२१४ ॥ अपने हृदयकमल को तत्तत्पद भेद से मध्याह्न सूर्य के समान दीप्तियुक्त शान्त विग्रहों वाले चातुरात्म्य से अधिष्ठित समझ कर जाग्रत्पद पर स्थित अनिरुद्ध के साथ अपनी आत्मा को एकीभूत रूप में ध्यान करते हुए प्रतिदिन अपने अनिरुद्ध मन्त्र का सौ बार जप करे ॥ २०५-२०६ ॥ उस मन्त्र के जप के सामर्थ्य से अनिरुद्ध के साथ तादात्म्य की स्थिति के बन्धन से उनके विषय में सविज्ञान महिमा उत्पन्न हो जाती है । इस प्रकार के अभ्यास से एक संवत्सर पर्यन्त जप करने से प्रद्युम्न का प्रभाव प्रगट होता है । इस प्रकार सङ्कर्षण मन्त्र, वासुदेव मन्त्र, स्वप्न व्यूह के अनिरुद्धादि वासुदेवान्त मन्त्र चतुष्टय तथा सुषुप्तिव्यूह चतुष्टय, इनके एक-एक मन्त्रों को संवत्सर पर्यन्त जपवृद्धि के क्रम से तादात्म्य भावना के साथ अभ्यास करते हुए तत्तन्मन्त्र को तत्तदुत्तर मन्त्र में उपसंहार करते हुए, सुषुप्तिव्यूह वासुदेव को तुर्य स्थान में स्थित परात्पर वासुदेव में उपसंहार करते हुए, उस मन्त्र को ध्याता एवं ध्येय के विभाग से जब तन्मय की स्थिति उत्पन्न हो जावे तब उसके अन्त में जप क्रिया का परित्याग कर देवे । इस प्रकार अभ्यास करने वाला योगी वेद्य-वेदकभाव से रहित जब समाधि की स्थिति प्राप्त कर लेता है तब वह 'ब्रह्म' हो जाता है ॥ २०७-२१४ ॥ ततः श्रमजयं कुर्यात् त्यक्त्वा ध्यानासने क्रमात् । समाप्ते शयनस्थश्च कालं रात्रिक्षयावधि ॥ २१५ ॥ एवं योगानुष्ठानानन्तरं पुनर्ब्राह्ममुहूर्त्तपर्यन्तं विश्राममाह — तत इति ॥ २१५ ॥ तदनन्तर वैष्णव साधक ध्यान एवं आसन का क्रमशः परित्याग करे । फिर शयन कर परिश्रम को दूर करे ॥ २१५ ॥ ब्राह्मे मुहूर्ते सम्प्राप्ते ह्युत्थाय शयनात् ततः । स्नात्वाऽभ्यर्च्य जगन्नाथं समिद्दानं समाचरेत् ॥ २१६ ॥ जुहुयाच्च यथाशक्ति ततस्तिलघृतादि यत् । ऊनातिरिक्तशान्त्यर्थं सर्वकर्मसमाप्तये ॥ २१७ ॥ दद्यात् पूर्णाहुतिं कृत्वा पूर्ववत् सेचनादिकम् । ततो देवं तु पीठस्थं कुण्डस्थमनलं ततः ॥ २१८ ॥