सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठः परिच्छेदः १३५ सोऽपि यायात् परं स्थानं किं पुनर्योऽत्र संस्थितः । यावज्जीवावधिं कालं बद्धकक्ष्यो महामतिः ॥ २२२ ॥ एवमाराधनस्य यथाशक्त्यनुष्ठानेऽपि साफल्यमाह— सकृदिति द्वाभ्याम् ॥ २२१-२२२ ॥ इत्युक्तं चातुरात्म्यं समासादमलेक्षण । सबाह्याभ्यन्तरं सम्यङ्मया ते यजनं शुभम् ॥ २२३ ॥ यज्ज्ञात्वा क्षयमायाति त्वविद्याबीजमक्षयम् । अचिरादेव भविनां भक्तानां भावितात्मनाम् ॥ २२४ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां चतुरात्म्याराधनं नाम षष्ठः परिच्छेदः ॥ ६ ॥ — ❦ — उक्तमर्थं निगमयति—इतीति द्वाभ्याम् ॥ २२३-२२४ ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये षष्ठः परिच्छेदः ॥ ६ ॥ — ❦ — जो साधक यह यजन क्रिया एक दिन, तीन दिन, एक सप्ताह, पक्षभर, मास पर्यन्त भक्तिश्रद्धा से समन्वित हो, इस विधि से सम्पादन करता है, वह भक्त परं पद (विष्णुपद) को प्राप्त करता है । जो बुद्धिमान साधक यावज्जीना- वधि कमर कस कर इस याग को सम्पादन करता है उसके विषय में क्या कहा जाय? ॥ २२१-२२२ ॥ हे अमलेक्षण! इस प्रकार संक्षेप में सबाह्यान्तर चतुरात्मीयात्मक कल्याण- कारी यजन का सम्यक् प्रतिपादन किया गया । जिसे जान लेने मात्र से भवितात्मा संसारी समस्त भक्तों को अक्षय अविद्याबीज का अल्पकाल में विनाश हो जाता है ॥ २२३-२२४ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के चतुरात्म्याराधन नामक षष्ठ परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ ६ ॥ — ❦ —