भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 196

सप्तमः परिच्छेदः १३७ अनुग्रहार्थं भविनां नानाकृत्या तु वै पुनः । देहकान्तिमनुज्झित्य दिक्क्रमेण तु वै सह ॥ ६ ॥ पौरुषेण तु रूपेण प्रत्येकेन त्रिधा त्रिधा । वासुदेवादिकेनैव व्यक्तचक्रादिना युतम् ॥ ७ ॥ उत्कृष्टादिगुणाढ्यानामा सृष्टेर्नान्ययाजिनाम् । वर्णानां जनकत्वेन व्यक्तिमभ्येति शाश्वतीम् ॥ ८ ॥ पूर्वोक्तं परात्परं नित्योदितव्यूहाख्यं वासुदेवादिचतुष्टयमेव पूर्वोक्तजाग्रद्व्यूह- रूपेणाविर्भूतम्, तज्जीवात्मनां संसारखेदनिवृत्त्यर्थं तेनैव रूपेण च व्यक्तीभूय जाग्रत्पदे विदिक्ष्वप्यव्ययक्रमेणावतीर्णं पुरुषादिमूर्तिचतुष्टयं स्वात्मनुसंहृत्य पुनः संसारिणामनुग्रहार्थं प्रत्येकं त्रिधा त्रिधा वासुदेवः केशवादित्रिकरूपेण, सङ्कर्षणो गोविन्दादित्रिक रूपेण, प्रद्युम्नस्त्रिविक्रमादित्रिकरूपेण, अनिरुद्धो हृषीकेशादित्रिकरूपेण व्यक्तचक्रादिलाञ्छनैः सह भगवदेकान्तिनां पोषकत्वेन शाश्वतीमभिव्यक्तिमभ्येतीत्याह—परं ब्रह्मेति षड्भिः । देहकान्तिमनुज्झित्येत्यनेन जाग्रद्व्यूहवासुदेवादिचतुष्टयस्य पूर्वं यादृशो वर्णभेद उक्तः, केशवादित्रिकचतुष्टस्यापि तादृश एवेत्युक्तं भवति ॥ ३-८ ॥ परात्पर नित्योदित व्यूहाख्य वासुदेवादि चतुष्टय ही पूर्वोक्त जाग्रदादि अवस्थाओं में व्यूहरूप से अन्तर्विभूत, वही जीवात्माओं के संसार रूप खेद की निवृत्ति के लिये, उसी रूप से प्रगट होकर जाग्रत्पद में, कोणों में, अव्यय क्रम से आविर्भूत होता है और पुरुषादि चतुष्टय को अपने में उपसंहृत कर पुनः संसारी जीवों के कल्याण के लिये प्रत्येक व्यूह तीन-तीन रूपों में विभक्त हो जाता है। वासुदेव केशवादि तीन रूपों में, सङ्कर्षण गोविन्दादि त्रिक रूप में, प्रद्युम्न त्रिविक्रमादि तीन रूप में और अनिरुद्ध हृषीकेशादि तीन रूपों में व्यक्त चक्रादि चिह्नों के साथ भगवद् भक्तों का पोषक होकर शाश्वती अभिव्यक्ति के रूप में वही प्रगट होता है। जिस प्रकार जाग्रद व्यूह वासुदेवादि चतुष्टय में पहले जैसा वर्णभेद कहा गया है, केशवादि त्रिक चतुष्टय में भी उसी प्रकार का वर्ण भेद विद्यमान रहता है ॥ ३-८ ॥ व्यूहान्तराभिव्यक्तिप्रयोजनम् यां समालम्ब्य संसारादचिरादेव यान्ति च । सुप्रबुद्धः परं धाम दानधर्मव्रतादिना ॥ ९ ॥ एवं केशवादिरूपेणाभिव्यक्तेः प्रयोजनमाह—यामिति ॥ ९ ॥ अब केशवादिरूप से अपनी अभिव्यक्ति का कारण कहते हैं—जिसका आश्रय लेकर सुप्रबुद्धजन दान एवं धर्म का आचरण करने से शीघ्र ही परंधाम को प्राप्त कर लेते हैं ॥ ९ ॥ सा० सं० - 13