सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः परिच्छेदः १४३ लेकर इसी प्रकार सर्वदा संवत्सर पर्यन्त वासुदेवान्त अर्चन विहित है ॥ ३० ॥ वैश्य के लिये प्रद्युम्न से प्रारम्भ कर सङ्कर्षण पर्यन्त संवत्सर तक व्रत का विधान है और सच्छूद्र साधक के लिये अनिरुद्ध से अलग कर प्रद्युम्नान्त व्रत का विधान है ॥ ३१ ॥ सङ्कर्षणादीनां लाञ्छनध्यानप्रकारकथनम् मूर्तीनां ध्यानकाले तु विशेषमवधारय । सङ्कर्षणेऽब्जवद् रम्यां दक्षिणे तु करे गदाम् ॥ ३२ ॥ गृहीतां चिन्तयेन्मध्यादधोवक्त्रेण पाणिना । अङ्गुलिद्वितयेनैव त्वङ्गुष्ठाद्येन लीलया ॥ ३३ ॥ प्राग्वद् वामकरे पद्मं प्रद्युम्नस्य निबोधतु । दक्षिणे हेतिराट् तद्वदङ्गुलिद्वितयोपरि ॥ ३४ ॥ पूर्ववत् कमलं वामे चतुर्थस्याधुनोच्यते । आदिवद् दक्षिणे पद्मं गदा वामे यथोदिता ॥ ३५ ॥ इति प्रथममूर्तीनां ध्यानमुक्तं तु सार्चनम् । नित्यनैमित्तिकार्थं तु निःश्रेयसपदाप्तये ॥ ३६ ॥ पूर्वं वासुदेवलाञ्छनध्यानमात्रस्योक्तत्वादिदानीं सङ्कर्षणादीनां लाञ्छनभेदध्यान- माह—मूर्तीनामित्यारभ्य निःश्रेयसपदाप्तय इत्यन्तम् । अब्जवदित्यनेन पूर्वं वासुदेवस्य दक्षिणकरेऽब्जस्य यादृशः सन्निवेशो यादृशो धारणप्रकारश्चोक्तः, इदानीं सङ्कर्षणस्य दक्षिणे करे गदाया अपि तादृश इति बोध्यते, अधोवक्त्रेण लम्बमानेनेत्यर्थः । अङ्गु- ष्ठाद्येन अङ्गुलीद्वितयेन, तर्जन्यङ्गुष्ठाभ्यामित्यर्थः । प्राग्वदित्यनेन वासुदेवकमलदधो- मुखत्वादिकमुच्यते ॥ ३२-३६ ॥ अब मूर्तियों के ध्यान काल में जो विशेषताएं हैं हे सङ्कर्षण ! उसे आप सुनिये । सङ्कर्षण के दाहिने हाथ में, वासुदेव के दाहिने हाथ में जिस प्रकार कमल का सन्निवेश तथा धारण का प्रकार है, उसी प्रकार सङ्कर्षण के हाथ में गदा है जिसे उन्होंने हाथ को नीचा कर मध्य में ग्रहण किया है । वह बायें हाथ के अंगूठे से लेकर दो अङ्गुलियों में लीलापूर्वक कमल धारण किये हुए हैं इस प्रकार सङ्कर्षण का ध्यान करे ॥ ३२-३४ ॥ अब प्रद्युम्न की विशेषता कहते हैं—दाहिने हाथ में दो अङ्गुलियों पर चक्र धारण किये हुए हैं तथा बायें हाथ में पूर्ववत् कमल धारण किये हुए हैं ऐसे प्रद्युम्न का ध्यान करे । अब चतुर्थ अनिरुद्ध के ध्यान का प्रकार कहते हैं—दक्षिण हाथ में पहले की तरह कमल तथा बायें हाथ से पूर्ववत् गदा धारण किये हुए अनिरुद्ध का ध्यान करे ॥ ३२-३५ ॥