सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः परिच्छेदः १५७ अथवा कोई देवता का आश्रम है उसमें शक्ति को निरोध कर शक्ति स्थापित किया है, उसे सर्वेश्वर भगवान् विष्णु का स्थान समझना चाहिये ॥ १११-११३ ॥ अपने मन्त्र से सन्निधि कर जहाँ उस साक्षात्कृत को विग्रह स्वरूप में स्थापित किया है और जो पत्र-पुष्पादि से पूजित है । हे सङ्कर्षण! उसे आप सिद्धायतन समझिए ॥ ११४ ॥ मानुषायतनलक्षणकथनम् फलाप्तये तु विप्राद्यैः स्वकुलोद्धारणाय च । स्थापितं भगवद्विम्बं ज्ञेयमायतनं हि तत् ॥ ११५ ॥ मानुषायतनमाह—फलाप्तय इति ॥ ११५ ॥ अब मानुषायतन कहते हैं—जहाँ अपनी अभीष्ट प्राप्ति के लिये तथा अपने कुल के उद्धार के लिये ब्राह्मणादिकों ने भगवद् बिम्ब (=भक्त) की स्थापना की है उसे भगवदायतन समझना चाहिये ॥ ११५ ॥ क्रियाङ्गभागं यातस्य सर्वगस्य च वै विभोः । विद्धि सर्वेश्वरस्यैवं स्थितं नियतलक्षणम् ॥ ११६ ॥ उक्तमर्थं निगमयति—क्रियेति ॥ ११६ ॥ वैष्णवक्षेत्रप्रमाणम् प्रासादद्वारदेशाच्च यत्र शङ्खध्वनिक्षयः । पूर्वादि सर्वदिक् तावत् क्षेत्रं भवति वैष्णवम् ॥ ११७ ॥ मानुषभगवन्मन्दिरस्य परितो वैष्णवक्षेत्रप्रमाणमाह—प्रासादेति । विमानद्वारसमीपे कृतः शङ्खनादो यावद्दूरं श्रूयते, तावदन्तं परितो वैष्णवक्षेत्रमिति भावः ॥ ११७ ॥ अब उक्त अर्थ का उपसंहार करते हैं—सर्वग भगवान् विभु के तथा सर्वेश्वर के क्रियाङ्ग से उत्पन्न नियत लक्षण में जो स्थित है उस मानुष स्थापित वैष्णव क्षेत्र का प्रमाण कहते हैं—विष्णु के प्रासाद स्थान से तथा द्वार देश से उत्पन्न हो कर जहाँ तक शङ्खध्वनि जाए ऐसा पूर्व से लेकर उत्तर दिशापर्यन्त सभी वैष्णव क्षेत्र कहा जाता है ॥ ११६-११७ ॥ सिद्धावतारिताद् देवात् तदेतद् द्विगुणं स्मृतम् । त्रिगुणं च स्वयंव्यक्ताद् देहान्ते भावितात्मनाम् ॥ ११८ ॥ सैद्धस्थाने तद्द्विगुणं स्वयंव्यक्तस्थाने तत्रिगुणं च वैष्णवक्षेत्रमानमाह— सिद्धावतारितादिति त्रिभिः पादैः ।