सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ सात्वतसंहिता इसके बाद साधक व्रताचरण करे। केशवादि रूप वाले द्वादशात्मा विभु की पूजा के लिये मार्गशीर्ष मास से आरम्भ कर कौमुद मास पर्यन्त व्रताचरण आदि नियमों का पालन करे ॥ ४७ ॥ मासेशमन्त्रसंजप्तं युक्तं हेमकुशाम्बुना। दशम्यां पञ्चगव्यं च पिबेत् सम्पूज्य केशवम् ॥ ४८ ॥ तन्निवेदितमन्नं च प्राग्भुक्त्वा तु घृतादिकम्। नातीव तृप्तिजनकं दन्तकाष्ठमथाचरेत् ॥ ४९ ॥ शयनं मन्त्रतोयेन प्रोक्षयेत् सकुशं ततः। शयनस्थो जपेन्मन्त्रं शतमष्टाधिकं तु वै ॥ ५० ॥ मार्गशीर्षशुक्लदशम्यां रात्रौ कर्तव्यक्रममाह—मासेति सार्धत्रिभिः। मासेश- मन्त्रसंजप्तम्, प्रकृतमासेशः केशवः, तन्मन्त्राभिमन्त्रितमित्यर्थः ॥ ४८-५०॥ अब मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी की रात्रि का कर्तव्य कर्म कहते हैं—मासेश मन्त्र (केशव मन्त्र) का कुशा के जल से अभिमन्त्रित कर जप करे। केशव का जप कर पञ्चगव्य पान करे। भगवान् को निवेदित अन्न तथा घृतादि का भोजन करे जो बहुत अधिक न हो। इसके बाद दतुअन करे। अपने शयन को सकुश मन्त्र जल से प्रोक्षित करे। फिर शयन पर स्थित हो कर १०८ की संख्या में मन्त्र का जप करे ॥ ४८-५० ॥ एकादश्यां प्रभातेऽथ मध्याह्ने वा दिनक्षये। केशवाय नमस्कुर्याद् बहुशः प्रणवादिकम् ॥ ५१ ॥ एकादश्यां केशवस्य कालत्रयस्यार्चनमाह—एकादश्यामिति सार्धेन। केशवाय नमस्कुर्याद् बहुशः प्रणवादिकमित्यन्तेन ॐ केशवाय नम इति मन्त्रमसकृज्जपेदित्युक्तं भवति ॥ ५१ ॥ फिर एकादशी के दिन प्रातःकाल, अथवा मध्याह्न, अथवा सायङ्काल के समय केशव को नमस्कार करे और अनेक बार प्रणवादि का जप करे ॥ ५१ ॥ तस्य वै पूजनं भक्त्या कुर्यात् कालत्रयं तु वै। सर्वगं परमं ज्योतिरमूर्तममलं हि यत् ॥ ५२ ॥ स एव वासुदेवेति मत्वा सम्यग् यजेत् ततः। चेतसामृतसंकाशैः पुष्पाद्यैरखिलैः प्रभुम् ॥ ५३ ॥ पश्चात् तममलं धाम ध्यायेन्मुक्तमनश्वरम्। श्रोणीतटार्पितकरं सानुकम्प्यमनूपमम् ॥ ५४ ॥ दक्षिणेन तु हस्तेन भक्तानामभयप्रदम्।