सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 25, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ें२२ सात्वतसंहिता पाञ्चरात्र शास्त्र-विभाग लक्ष्मीतन्त्र के अनुसार पाञ्चरात्र शास्त्र के तीन विभाग हैं—१. दिव्य पाञ्चरात्र, २. मुनिभाषित पाञ्चरात्र और ३. मानुष पाञ्चरात्र । पाञ्चरात्र शास्त्र के तीन ग्रन्थ सात्वतसंहिता, पौष्करसंहिता एवं जयाख्यसंहिता इनमें से दिव्य पाञ्चरात्र के अन्तर्गत आते हैं क्योंकि भगवान् नारायण के द्वारा साक्षात् रूप से यह प्रतिपादित है । इनसे अन्य ब्रह्मादि के द्वारा प्रतिपादित होने से ईश्वरसंहिता, पारमेश्वरसंहिता एवं भारद्वाज आदि संहिता मुनिभाषित पाञ्चरात्र हैं । पाञ्चरात्रशास्त्र से अन्य ग्रन्थ आप्त मनुष्यों द्वारा कहे जाने के कारण मानुष पाञ्चरात्र के अन्तर्गत आते हैं । ये तीनों ही पाञ्चरात्रशास्त्र, दिव्यशास्त्र तथा सिद्धान्त पाञ्चरात्र शास्त्र के नाम से पुकारे जाते हैं । जैसा कि लक्ष्मीतन्त्र में कहा है— दिव्यशास्त्राण्यधीयीत निगमांश्चैव वैदिकान् । सर्वाननुचरेत्सम्यक् सिद्धान्तानात्मसिद्धये ॥ (लक्ष्मीतन्त्र २८.२९) दिव्य शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए । वैदिक निगमों का स्वाध्याय करना चाहिए और आत्मसिद्धि के लिये मन्त्र आगमादि सिद्धान्तों का स्वाध्याय करना चाहिए । आराधना के समय भगवान् वासुदेव एवं सङ्कर्षण आदि व्यूह के भेद से पुनः मन्त्र, आगम, तन्त्र एवं तन्त्रान्तर ये चार भेद पाञ्चरात्र के माने जाते हैं । पाञ्चरात्र आगम में भगवत्, सात्वत, एकान्तिक और परम एकान्तिक इन चार शब्दों का व्यवहार होता है । इनमें से भागवत् शब्द का अर्थ महाभारत में इस प्रकार है— द्वादशाक्षरतत्त्वज्ञश्चतुर्व्यूहविभागवित् । अच्छिद्रपञ्चकालज्ञः स वै भागवतः स्मृतः ॥ (महाभा०, आश्वमेधिक पर्व ११८.३३) द्वादशाक्षर मन्त्र—ॐ नमो भगवते वासुदेवाय के तत्त्व को जानने वाला, वासुदेव, सङ्कर्षण आदि चतुर्व्यूह के विभाग तथा पञ्चकाल का तत्त्वज्ञ साधक भागवत् शब्द से व्यवहृत होता है । सत् शब्द से वासुदेव परब्रह्म को कहा जाता है । उन परब्रह्म वासुदेव से युक्त साधक को सात्वत शब्द से अभिहित किया जाता है । वस्तुतः पाञ्चरात्रशास्त्र में षाड्गुण्य तथा चातुर्व्यूह आदि स्वार्थिक तद्धितान्त शब्दों का प्रयोग बहुशः प्राप्त होता है । उसी प्रकार सत्वन्त इस अर्थ में सात्वत (= वासुदेवाराधक) शब्द का प्रयोग है । इन्हीं प्रयोगों को देखकर ही भगवान् पतञ्जलि ने महाभाष्य में 'प्रियतद्धिताः दाक्षिणात्याः' (महाभाष्य १.१.१) में कहा है । वासुदेव में ही एक मात्र भक्ति होने से एकान्तिक शब्द का व्यवहार होता है । इन्हीं को परम एकान्तिक भी कहा जाता है ।