भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 837 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 26

भूमिका २३ पाञ्चरात्रशास्त्र में पादविभाग इस शास्त्र के ग्रन्थ 'संहिता' 'उपनिषद्' या 'तन्त्र' शब्द से व्यवहित होते हैं। उनमें पाद्मसंहिता आदि में ज्ञान, योग, क्रिया एवं चर्या-इन चारों पादों का प्रतिपादन मिलता है। संक्षिप्त रूप से इन्हीं चार विषयों का प्रतिपादन पाञ्चरात्र आगम ग्रन्थों में प्राप्त होता है। ज्ञानपाद में वासुदेव आदि चतुर्व्यूह एवं व्यूहान्तर के स्वरूप एवं उनकी महिमा के संबन्ध में विचार किया गया है। योगपाद में उनकी उपासना का प्रकार वर्णित है। क्रियापाद में उनके अर्चा विग्रह एवं मन्दिर निर्माण का विवेचन है। चर्यापाद में उनकी आराधना की विधि बताई गई है। पाञ्चरात्रागमों में भगवदर्चा का अधिकार पाञ्चरात्रागमों में भगवत्पूजा तो सर्वसाधारण है। यह पूजा पाञ्चरात्र तान्त्रिक मन्त्रों के द्वारा की जा सकती है। यहाँ विशेष यह है कि पाञ्चरात्रशास्त्रों में भगवद् अर्चा में वैदिक एवं तान्त्रिक दोनों ही मन्त्रों का विधान है। जहाँ वैदिक मन्त्रों में तीन वर्णों का ही अधिकार था वहाँ तान्त्रिक मन्त्रों में त्रैवर्णिकों या अत्रैवर्णिकों सभी का अधिकार है। पाञ्चरात्रागमों के प्रवक्ता पाञ्चरात्रागम ईश्वर द्वारा स्वयं प्रोक्त हैं। जैसा महाभारत में कहा भी है— सांख्यस्य वक्ता कपिल.....पाञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वक्ता नारायणः स्वयम्—शान्तिपर्व ३५९.६५-६८ इस प्रकार स्वयं ही नारायण ने इस शास्त्र को आविष्कृत किया है। महाभारत में वहीं पर यह भी कहा गया है कि वेदान्त के सार को लेकर भगवान् लक्ष्मीनारायण ने भक्तों के ऊपर अनुग्रह करके इस पाञ्चरात्रशास्त्र को प्रवर्तित किया— इदं महोपनिषदं चतुर्वेदसमन्वितम्। सांख्ययोगकृतान्तेन पञ्चरात्रानुशब्दितम् ॥ वेदान्तेषु यथासारं संगृह्य भगवान् हरिः । भक्तानुकम्पया विद्वान् संचिक्षेप यथासुखम् ॥ —महाभारत, शान्तिपर्व ३४८.६३-६४ पाञ्चरात्रशास्त्र का काल 'वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन्' ४.३.९८ इस सूत्र में पाणिनि द्वारा भगवान् वासुदेव की पूजा का उल्लेख होने से पाणिनि के काल अर्थात् ईसा से दो हजार वर्ष पूर्व इस शास्त्र का अस्तित्व विद्यमान था। वासुदेव यह नाम 'संज्ञैषा भगवतः' इस प्रकार महाभाष्य में उल्लेख होने से भगवान् वासुदेव की पूजा पाञ्चरात्रान्तर्गत होना निर्विवाद है। पाणिनि का काल विद्वानों ने ईसा से पूर्व चतुर्थ शतक स्वीकार किया है। सात्वतसंहिता एवं पाञ्चरात्रागम सात्वत शब्द वासुदेव के भक्त के लिए प्रयुक्त हुआ है। हेमचन्द्र ने इन्हें