भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 27

२४ सात्त्वतसंहिता ‘बलदेव’ का पर्याय माना है। महाभारत १.२१९.१२ में इस शब्द को कृष्ण के पर्याय रूप में ग्रहण किया गया है। महाभारत १.२२२.३ में सम्पूर्ण यादवों के लिए भी इस शब्द का प्रयोग हुआ है। वस्तुतः यह शब्द विष्णु के पर्याय के रूप में जाना जाता है। सच्छब्देन सत्त्वमूर्तिर्भगवान्। स उपास्यतया विद्यतेऽस्य इति, मतुप् ततः स्वार्थे अण् इस प्रकार व्युत्पत्ति की जाती है। पद्मपुराण के उत्तर खण्ड १९ अध्याय में ‘सात्वत’ का अर्थ विष्णु का भक्त किया गया है। इसका लक्षण इस प्रकार है— सत्त्वं सत्त्वाश्रयं सत्त्वगुणं सेवेत केशवम्। योऽनन्यत्वेन मनसा सात्वतः समुदाहृतः॥ विहाय काम्यकर्मादीन् भजेदेकाकिनं हरिम्। सत्यं सत्त्वगुणोपेतो भक्त्या तं सात्वतं विदुः॥ इस संहिता (तन्त्र) में महर्षि नारद ने सात्वत (=वासुदेव) आदि चतुर्व्यूह का २५ अध्यायों में प्रवचन किया है। उपनिषद् के समान पाञ्चरात्र आगमों में वासुदेव को ब्रह्म के रूप में वर्णित किया गया है। यही पाञ्चरात्रशास्त्रों का आगम तत्त्व है अर्थात् दार्शनिक परिप्रेक्ष्य है जिसके कारण इन्हें ‘पाञ्चरात्रागम’ की संज्ञा दी जाती है। उन्हें ही विष्णु, नारायण, विश्व और विश्वरूप कहा जाता है। यह सारा विश्व उन्हीं की अहन्ता से व्याप्त है। जिससे अहंभाव का स्मरण होता है वही परमात्मा है, वही भगवान् वासुदेव कहे जाते हैं, जिन्हें पर तथा क्षेत्रज्ञ भी कहा जाता है। इस जगत् में कोई भी ऐसी वस्तु या अवस्तु नहीं है, जो ‘अहन्ता’ से आक्रान्त न हो। इदन्तया प्रतीत होने वाला यह सारा जगत् उस ‘अहन्ता’ से आक्रान्त है। सर्वतः शान्त एवासौ निर्विकारः सनातनः। अनन्तो देशकालादिपरिच्छेदविवर्जितः॥ महाविभूतिरित्युक्तो व्याप्तिः सा महती यतः। तद् ब्रह्म परमं धाम निरालम्बनभावनम्॥ (लक्ष्मीतन्त्र २.८-९) शोक, मोह, जन्म-मृत्यु और सुख-दुःख इन छह तरङ्गों से रहित होने के कारण वह ‘अहन्ता’ सर्वथा शान्त है, निर्विकार और सनातन है। देशकाल आदि से परिच्छिन्न न होने के कारण वह अनन्त है। उस अहन्ता की व्याप्ति महती है, इसलिये उसे ‘महाविभूति’ कहते हैं। उसका कोई आलम्बन नहीं है, इसलिये वही ब्रह्म है, वही परम धाम (तेजःस्वरूप) है। निस्तरङ्गामृताम्भोधिकल्पं षाड्गुण्यमुज्ज्वलम्। एकं तच्चिद्घनं शान्तमुदयास्तमयोज्झितम्॥