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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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भूमिका २५ अपृथग्भूतशक्तित्वाद् ब्रह्माद्वैतं तदुच्यते । तस्य या परमा शक्तिर्ज्योत्स्नेव हिमदीधितेः ॥ (लक्ष्मीतन्त्र २.१०-११) वह सर्वथा प्रशान्त अमृतसागर के समान है, षाड्गुण्य और उज्ज्वल है, उदय और अस्त से विवर्जित है, शान्त है, एक अद्वितीय और चिद्घन है । अर्थात् अपने से अपृथक् रूप रहने वाले सिद्धशक्ति अहंता से विशिष्ट और पृथक् रूप से रहने के कारण विशिष्ट भी एक वह अद्वैतब्रह्म हैं, जैसे चन्द्रमा में रहने वाली ज्योत्स्ना उससे पृथक् तथा अपृथक् रहकर भी उसी में आश्रित रहती है । पाञ्चरात्र आगमों की परम्परा में अन्य संहिता तन्त्र सामान्यतया जयाख्यसंहिता तथा सात्त्वतसंहिता का अनुसरण ही है । सात्त्वतसंहिता, लक्ष्मीतन्त्र एवं अहिर्बुध्न्यसंहिता में अविनाभाव सम्बन्ध है । 'जितं ते' आदि श्लोक इसका प्रमाण है । लक्ष्मीतन्त्र में सात्त्वत संहिता का नाम निर्देशपूर्वक (१.१९) उल्लेख है । सात्त्वत संहिता के बीजमन्त्रों की समीक्षा वासुदेव परमात्मा (हूँ) हैं, सङ्कर्षण जीव के अधिष्ठाता (हसां) हैं, प्रद्युम्न मन के अधिष्ठाता (हूँ) हैं और अनिरुद्ध अहंकार के अधिष्ठाता (ह्रस्वं) हैं । जब मकार का जीवबीज होना युक्त है एवं प्रसिद्ध भी है तब सकार को क्यों जीवबीज कहा गया? केशवादि के द्वादशबीज कथन के प्रसङ्ग में (८.२५-२३) 'त्रिधा हकारं ... त्रिधा त्रिधा' श्लोक द्वारा स्पष्ट होता है । फिर पारमेश्वर संहिता में भी इसी प्रकार सकारपरत्व कहा गया है— नवमं चाष्टमं नेमावराद्यं मातृकान्तिमम् । त्रिधैकैकं क्रमात् कृत्वा बीज द्वादशकं यथा ॥ —२४.७७-७८ लक्ष्मीतन्त्र (१९.३१-३२) में सकार का सङ्कर्षण बीज के रूप में जीवबीजत्व का व्यवहार सुस्पष्ट है । जीव के अधिष्ठाता के रूप में श्रीभाष्य में भी सङ्कर्षण को बताया गया है—'वासुदेवात् सङ्कर्षणो नाम जीवो जायते' (श्रीभाष्य २.२.३९) अतः जीव बीज स है म नहीं । संज्ञामन्त्र, पदमन्त्र एवं पिण्डमन्त्र तथा बीजमन्त्र उसके वाचक १. संज्ञा, २. पद, ३. पिण्ड और ४. बीज भेद से चार प्रकार के कहे गये हैं । अतः साधक बीज एवं पिण्ड इन दोनों मन्त्रों में से एक, अथवा संज्ञा एवं पद इन दोनों के मध्य में से एक, अथवा दोनों प्रकार के मन्त्रों में उभयात्मना दोनों मन्त्रों से अभिन्न एक भगवान् का अर्चन करे । जहाँ पिण्ड मन्त्र से उत्पन्न एक ही बीज से वहाँ उभयात्मना योजना करे । मन्त्र के आदि में बीज जोड़ देवे, अथवा मन्त्र के अन्त में बीज जोड़ देवे, कोई अन्तर नहीं

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