सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ सात्त्वतसंहिता आएगा क्योंकि दोनों ही अभिन्न हैं। इस प्रकार दोनों प्रकारों से मन्त्र की कल्पना कर अर्चन करे। किन्तु नाम मन्त्र के आदि में ही पिण्डाक्षर अथवा बीज का संयोजन करे। इसी प्रकार पद मन्त्र में भी आदि में बीजाक्षर अथवा पिण्डाक्षर की योजना करे। फिर प्रणव पीठ पर नमस्कार युक्त ध्वज लगावे। दोनों ही शान्त स्वरूप हैं, अतः एक ही हैं। संज्ञा मन्त्र और पद मन्त्र संसिद्धि लक्षण वाले हैं। स्वर से उत्पन्न एक अक्षर तथा व्यञ्जन से उत्पन्न एक अक्षर बीज कहे जाते हैं। एक में मिले हुए स्वर और व्यञ्जन से जो बहुत वर्ण बन जाते हैं, वह पिण्ड मन्त्रराट् है। स्वर वर्ण के आदि के तथा अन्त के दो-दो अक्षर अनुस्वार युक्त हों तो उनमें स्वाभाविक मन्त्रता सिद्ध है। अनुस्वार सहित एक स्वर से युक्त व्यञ्जन अथवा अनुस्वार सहित दो स्वर से युक्त ककारादि व्यञ्जन की भी बीज संज्ञा होती है ॥ २१ ॥ ॐकार शब्द का विवर्त्त सूर्य की किरणों के समान अनेक है अर्थात् ओंकार पर है तथा बीज, पिण्ड एवं संज्ञा मन्त्र क्रमशः तुर्य, सुषुप्ति और स्वप्न के क्रम से सूक्ष्म है। पदमन्त्र वैखरी होने से स्थूल है। उसी ॐकार के उच्चारण करने से परिणाम स्पष्ट जाना जाता है। वह कभी स्तुति सम्बोधन लक्षण वाला तथा बहुत अक्षरों वाला होता है और कहीं बहुत पदों वाला बन जाता है। वह ॐकार अविनाशी है और बीजों को महान् समृद्धि देने वाला है। अतः साधक सर्वप्रथम सत्य नामक प्रणव से आसन प्रदान करे। इस प्रकार प्रणव के नित्योदित होने के कारण तथा सभी मन्त्रों का आधार होने के कारण पहले प्रणव का आसन सन्निविष्ट करे। उसके बाद उसके विवर्त्तभूत बीज मन्त्र को आसन देवे। प्रतिदिन आराधन काल में बीज से उसके परिणाम स्वरूप संज्ञामन्त्र, अथवा पदमन्त्र में किसी एक का उत्थान करे। फिर यजन समाप्त होने पर उसी में लय करे। इसलिये वह अविनाशी है। याग का अवसर प्राप्त होने पर पुनः उसकी समाप्ति हो जाने पर मन्त्र उस ॐकार में इस प्रकार सन्निहित हो जाते हैं, जैसे तप्त पत्थर पर जल डालने से जल उसमें लीन हो जाते हैं। सात्त्वतागम कृष्ण द्वारा कुब्जा से उत्पन्न उपश्लोक ने जो सात्त्वत आगम के प्रवर्तक माने जाते हैं, उन्होंने महर्षि नारद से भक्ति तत्त्व का अध्ययन किया था और सात्त्वत आगम नामक एक ग्रन्थ भी लिखा था जिसका उल्लेख श्रीमद्भागवत् पुराण की श्लोकबद्ध टीका 'नारायणीयम्' में मेलपुत्तूर नारायणभट्ट ने किया है। 'कृष्णगीति' नामक ग्रन्थ में भी मानवेद ने इस सात्वत परम्परा का उल्लेख किया है। आगम के क्रिया, चर्या आदि चार विभागों में से चर्या नामक विभाग का बहुत कम वर्णन मिलता है। आगमों में ज्ञानपाद की मुख्य चर्चा की गई है और मन्त्र शास्त्र (शब्द ब्रह्म) को पूर्ण रूप से पोषित किया गया है। क्रियापाद मात्र प्रतिमा की प्रतिष्ठा एवं उसकी चार रूप से पूजा में प्रतिपादित है। चार रूप है—विग्रह, अर्घ पात्र, मन्त्र एवं