सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका २७ हवन। सात्वत संहिता में प्रतिमा निर्माण के विषय में पच्चीसवें अध्याय में विस्तृत वर्णन प्राप्त है। सात्त्वतसंहिता में मुख्य रूप से भगवान् विष्णु प्रतिपादित हैं। लक्ष्मी भगवान् विष्णु की शक्ति होने से उनके समकक्ष ही नहीं बल्कि उनसे भी अधिक हैं। आगम की प्राच्य परम्परानुसार लक्ष्मी भगवान् विष्णु की प्रकृति हैं और दिव्य शक्ति है। वह विष्णु के शरीर से छः रूपों में प्रकट होती है—१. ज्ञान (Knowledge), २. ऐश्वर्य (Sovereignty), ३. शक्ति (Potency) ४. बल (Strength), ५. वीर्य (Virility), ६. तेजस् (Splendour). पाञ्चरात्रागम में परब्रह्म के उभय-निर्गुण तथा सगुणभाव स्वीकृत हैं। परमात्मा त्रिविध परिच्छेद शून्य है वह न भूत है, न वर्तमान है और न भविष्य, न ह्रस्व है, न दीर्घ, न स्थूल है, न अणु, न आदि है, न मध्य है और अन्तविहीन भी है। इस प्रकार वह सब द्वन्द्वों से विनिर्मुक्त, सर्व उपाधि से विवर्जित सब कारणों का कारण, षाड्गुण्यरूप परब्रह्म है। षाड्गुण्य विष्णु 'निर्गुण' होकर भी 'सगुण' हैं। वह अप्राकृत गुणों से रहित होने के कारण 'निर्गुण' है और षड्गुण युक्त होने से 'सगुण' हैं। जगत् के व्यापार के लिए कल्पित इन छह गुणों के नाम—१. ज्ञान, २. शक्ति, ३. ऐश्वर्य, ४. बल, ५. वीर्य एवं ६. तेज हैं। १. अजड़, स्वात्म सम्बोधी (=स्वप्रकाश), नित्य सर्वावगाही गुण को 'ज्ञान' कहते हैं। ज्ञान ब्रह्म का स्वरूप भी है तथा उसका गुण भी है। २. शक्ति से अभिप्राय है जगत् का उपादान कारण। ३. ऐश्वर्य का अर्थ है स्वातन्त्र्यपरिबृंहितं जगत्कर्तृत्व। ४. जगत् का निर्माण करने में भगवान् नारायण को तनिक भी आभास नहीं होता। इस श्रमाभाव को 'बल' कहते है। ५. जगत् के उपादान होने पर भी विकार राहित्य की पाञ्चरात्रगत शास्त्रीय संज्ञा 'वीर्य' है। कार्यावस्था में जगत् के समस्त उपादान कारणों में विविध विकार दृष्टिगोचर होते हैं। परन्तु निर्विकार ब्रह्म (=भगवान्) में जगदुपादान होने पर भी किसी प्रकार के विकार का उदय नहीं होता। यही विकार राहित्य है। ६. जगत् की सृष्टि में सहकारी की अपेक्षा न होना अर्थात् अनावश्यकता को 'तेज' कहते हैं। पाञ्चरात्र की ब्रह्मकल्पना इस प्रकार ब्रह्म में जगत् की उभयविध कारणता (=अर्थात् उपादान कारणता तथा निमित्त कारणता) है। ब्रह्म बिना किसी सहायता के स्वतन्त्रतापूर्वक अपने से ही इस दृष्टि