सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ सात्त्वतसंहिता का उत्पादक है। 'सर्वकारणकारण' विशेषण इसी सर्वशक्तिमत्ता तथा स्वतन्त्रता को द्योतित करता है। वासुदेव का ज्ञान ही उत्कृष्ट रूप है, शक्त्यादि अन्य पाँच गुण ज्ञान के गुण भगवान् की शक्ति होने से सर्वदा तत्सम्बद्ध रहते हैं। भगवान् की शक्ति भगवान् की शक्ति को सामान्यतः 'लक्ष्मी' नाम से अभिहित किया गया है।१ भगवान् शक्तिमान् हैं तथा लक्ष्मी उनकी शक्ति है। भगवान् तथा लक्ष्मी का पारस्परिक सम्बन्ध आपाततः द्वैत प्रतीत होता है। परन्तु दोनों में द्वैत नहीं है। नारायणी शक्ति का रूप प्रलय दशा में जब प्रपञ्च का क्षय हो जाता है तब भी भगवान् तथा लक्ष्मी का नितान्त ऐक्य नहीं होता। उस समय भी नारायण तथा नारायणी शक्ति मानो३ एकत्व धारण करते हैं। शक्ति तथा शक्तिमान् का सम्बन्ध धर्म तथा धर्मी, अहन्ता तथा अहं, चन्द्रिका तथा चन्द्रमा, आतप तथा सूर्य के समान ही शक्ति तथा शक्तिमान् में अविनाभाव या समभाव सम्बन्ध स्वीकृत किया गया है। किन्तु मूल में तो भेद रहता ही है। भगवान् की शक्ति भगवान् की आत्ममूला शक्ति आरम्भकाल में किसी अचिन्त्य कारण के वश कहीं उन्मेष प्राप्त करती है और वह जगद् रचना व्यापार में प्रवृत्त होती है। विष्णु की स्वातन्त्र्य रूपी शक्ति भिन्न-भिन्न गुणों के कारण विभिन्न नामों से पुकारी जाती है। आनन्दा, स्वतन्त्रा, लक्ष्मी, श्री, पद्मा आदि उसी के नामान्तर हैं। उसी लक्ष्मी के सृष्टिकाल में दो रूप हो जाते हैं—१. क्रियाशक्ति, तथा २. भूतशक्ति। भगवान् की जगत् सिसृक्षा (जगत् उत्पन्न करने के संकल्प) को 'क्रियाशक्ति' कहते हैं और जगत् की परिणति (भवनं भूतिः) की संज्ञा 'भूतशक्ति' है। अहिर्बुध्न्य संहिता में ही लक्ष्मी को इच्छाशक्ति तथा सुदर्शन को 'क्रियाशक्ति' कहा गया है। इन दोनों शक्तियों के अभाव में भगवान् स्वयं अकिञ्चित्कर हैं। शक्तिद्वय के सद्भाव में ही भगवान् जगत् की सृष्टि, स्थिति, तथा संहति व्यापार के उत्पादक हैं। लक्ष्मी शक्ति के उस प्रथम आविर्भाव को 'शुद्ध-सृष्टि' या गुणोन्मेष कहते हैं। तब तरङ्गरहित प्रशान्त समुद्र में प्रथम बुद्बुद् के समान परब्रह्म में ज्ञानादि षड्गुणों का प्रथम उदय होता है। इसी शक्ति के विकास से जगत् की सृष्टि सम्पन्न होती है। सृष्टि शुद्ध और शुद्धेतर भेद से दो प्रकार की होती है। इसी के भीतर जयाख्य संहिंतानुसार शुद्ध सर्ग, प्राधानिक सर्ग तथा ब्रह्म सर्ग का अन्तर्भाव किया जाता है। शुद्ध सृष्टि भगवान् जगत् के परम मङ्गल के लिए अपने ही आप चार रूपों की सृष्टि करते हैं—१. व्यूह, २. विभव, ३. अर्चावतार तथा ४. अन्तर्यामी अवतार।