सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका २९ (१) व्यूह—पूर्वोक्त षड्गुणों में से दो-दो गुणों की प्रधानता होने पर तीन व्यूहों की सृष्टि होती है— सङ्कर्षण में ज्ञान तथा बल गुण का प्राधान्य रहता है। प्रद्युम्न में ऐश्वर्य तथा वीर्य गुणों का आधिक्य रहता है। अनिरुद्ध में शक्ति तथा तेज का उद्रेक विद्यमान रहता है। इन तीनों के सर्जनात्मक तथा शिक्षणात्मक द्विविध कार्य होते हैं— (क) सङ्कर्षण का कार्य जगत् की सृष्टि करना तथा ऐकान्तिक मार्ग (= पाञ्चरात्र तत्त्व) का उपदेश करना है। (ख) प्रद्युम्न का कार्य ऐकान्तिक मार्ग सम्मत क्रिया की शिक्षा देना है। (ग) अनिरुद्ध का कार्य क्रियाफल (मोक्ष तत्त्व) का शिक्षण करना है। वैषम्य दशा में गुण-प्रधान भाव से षड्गुणों की व्यवस्था की जाती है। षाड्गुण्य चारों व्यूहों में सामान्यतः विद्यमान रहता है। वासुदेव को मिलाकर इन्हें ‘चतुर्व्यूह’ कहते हैं। चतुर्व्यूह भगवद्रूप ही है। परन्तु शङ्कराचार्य के अनुसार वासुदेव से सङ्कर्षण अर्थात् जीव की उत्पत्ति होती है। सङ्कर्षण से प्रद्युम्न अर्थात् मन की तथा प्रद्युम्न से अनिरुद्ध अर्थात् अहंकार की सृष्टि होती है। यही चतुर्व्यूह सिद्धान्त पाञ्चरात्र का विशिष्ट सिद्धान्त माना जाता है। जयाख्य आदि संहिताओं में यह मत नहीं मिलता। परन्तु महाभारत के नारायणीयोपाख्यान तथा लक्ष्मीतन्त्र में निर्दिष्ट होने से यह पाञ्चरात्र का एकदेशीय मत ही प्रतीत होता है। (२) विभव—विभव का अर्थ है ‘अवतार’। ये संख्या में ३९ (सात्त्वतसंहिता में ३८) माने जाते हैं। विभव (= अवतार) मुख्य तथा गौड़ दो प्रकार के होते हैं— (क) मुख्य—जिनकी उपासना भुक्ति के लिए की जाती है। (ख) गौड़—जिनकी पूजा मुक्ति के लिए की जाती है। ये ३९ विभव इस प्रकार हैं— १. पद्मनाभ, २. ध्रुव, ३. अनन्त, ४. शक्त्यात्मा, ५. मधुसूदन, ६. विद्याधिदेव, ७. कपिल, ८. विश्वरूप, ९. विहङ्गम, १०. क्रोडात्मा, ११. वडवावक्त्र, १२. धर्म, १३. वागीश्वर, १४. एकाम्भोनिधिशायी, १५, भगवान् कमठेश्वर, १६. वराह, १७. नरसिंह, १८. पीयूषहरण, १९. श्रीपतिभगवान् देव, २०. कान्तात्मा, २१. अमृतधारक, २२. राहुजित्, २३. कालनेमिघ्न, २४. पारिजातहर, २५. लोकनाथ, २६. शान्तात्मा, २७. महाप्रभु दत्तात्रेय, २८. न्यग्रोधशायी, २९. भगवान् एकशृङ्गतनु, ३०. वामनदेह, ३१. सर्वव्यापी त्रिविक्रम, ३२. नर, ३३. नारायण, ३४. हरि, ३५. कृष्ण, ३६. ज्वलत्परशुधृक्-राम (=परशुराम), ३७. धनुर्धर राम, ३८. वेदविद् भगवान् कल्की, ३९. पातालशयन। (३) अर्चावतार—पाञ्चरात्र विधि से पवित्रित किए जाने पर भगवान् की प्रस्तर