भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 33

३० सात्त्वतसंहिता आदि की मूर्तियाँ भी भगवान् का अवतार मानी जाती हैं । सर्वसाधारण की पूजा में इनका उपयोग होता है । इन्हीं का नाम 'अर्चावतार' है । (४) अन्तर्यामी—भगवान् सब प्राणियों के हृत्पुण्डरीक में वास करते हुए वे उनके समस्त व्यापारों के नियामक हैं । इस रूप का नाम 'अन्तर्यामी' रूप है । यह कल्पना उपनिषदों के आधार पर ही है । शक्तितत्त्व (i) एक तत्त्व से चार तत्त्व— (१) वेदों में आनन्द, ज्ञान, इच्छा, क्रिया एवं आवरण इन पाँच गुणों का समुदाय 'शक्ति' शब्द से अभिहित होता है । उसी को आगमों में ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज—इन षड्गुणों के समुदाय को 'शक्ति' कहा गया है । (२) इनमें अवच्छेद रूप- आवरणशक्ति 'माया' है । माया रूप अवच्छेद से अवच्छिन्न, अखण्ड खण्डवत्, शान्त अशान्तवत्, अद्वय द्वयवत् रूप से भासता है, परन्तु वह प्रतिभान मिथ्या नहीं है । (३) माया (प्रकृति) के गुण भेद से वह तीन रूपों में—सत्त्वगुण से विष्णु, रजोगुण से ब्रह्मा एवं तमोगुण से शिवरूप में प्रकट होता है । इनके कार्य क्रमशः स्थिति, उत्पत्ति एवं प्रलय हैं । (४) धर्म, ज्ञान, वैराग्य एवं ऐश्वर्य इन चार गुणों के योग से वह एक ही क्रमशः वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध—इन चार रूपों में प्रकट हुआ है । (ii) चार से लेकर सोलह तत्त्व— वासुदेव आदि वही चार रूप, चार वर्ण, चार आश्रम, चार युग एवं चार पुरुषार्थ आदि परमात्मा के चार-चार रूप हैं । (५) शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध—इन पाँच गुणों के कारण क्रमशः परमेष्ठि, पुमान्, विश्व, निवृत्ति एवं सर्व—ये परमात्मा के पाँच रूप है । (६) श्रोत्र, चक्षु, घ्राण, रसना, त्वक् एवं मन—ये परमात्मा के ही छह रूप है । वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरत्, हेमन्त एवं शिशिर—इन छह ऋतुओं के रूप में भी वह प्रजापति ही परिणत हुआ है । (७) भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः एवं सत्य—इन सात व्याहृतियों में वही परिणत हुआ है । गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप्, जगती—ये सात छन्द भी उसके ही रूप हैं । अग्निहोत्र, दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य, वाजपेय, अतिरात्र और ज्योतिष्टोम—ये सात रूप हैं, उन रूपों में भी परमात्मा ही परिणत हुए हैं । (८) अव्यक्त, महत्, अहंकार तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध—इन आठ रूपों में परमात्मा ही परिणत होते है । पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, चन्द्र, सूर्य एवं यजमान—इन आठ मूर्तियों के रूप में वही ईश्वर परिणत हुए हैं । इसी प्रकार आठ दिक्पाल, आठ गुण एवं आठ सिद्धियाँ आदि रूपों में भी वही चैतन्य स्थित हैं । (९) नरसिंह, वराह, वामन, राम, कृष्ण, ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य और चन्द्र—ये नौ रूप भी उन्हीं विश्वात्मा की विभूति है । (१०) इन्द्र, अग्नि, यम, निकृति, वरुण, वायु, सोम, ईशान, ब्रह्मा, अनन्त-नाग—इन दस रूपों में भी वही विद्यमान है । (११) पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय एवं मन—ये ग्यारह भी भगवान् विष्णु के ही रूप हैं । (१२) इन्द्र, भग, पूषा, पर्जन्य, अंशु, विष्णु, त्वष्टा, धाता, विवस्वान्, वरुण, अर्यमा,