सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ३१ भिन्न—ये बारह आदित्य भी परमात्मा के ही विभिन्न रूप हैं। (१३) विश्वदेव, (१४) चौदह मनु (१५) पन्द्रह तिथि एवं (१६) सोलह दिशा-विदिशाओं के रूप में वहीं एक तत्त्व परिणत हुआ है। इस प्रकार सभी देवों के आश्रय एवं उपादान कारण विष्णु हैं। विष्णु ही सब देवता हैं। सम्पूर्ण चराचर विष्णु से व्याप्त है। फिर जिनसे सारी सृष्टि हुई है एवं अन्त में जिनमें लीन हो जायेगी, उन पुण्डरीकाक्ष को छोड़कर दूसरा कौन विश्व को व्याप्त करके रह सकता है। भगवान् विष्णु के व्यूह का रहस्य परब्रह्म परमात्मा प्रकृति परे हैं। वह मानव-मनोभूमि से अतीत हैं। किन्तु वह प्रकृति से परे हैं और परे भी नहीं है। परमात्मा प्रकृति से परे भी है और प्रकृति में भी है। त्रिपाद् रूप से वे प्रकृति से परे है और एकपाद्रूप से प्रकृति में हैं। इस प्रकार परमात्मा की दो विभूतियाँ हैं— १. त्रिपाद्विभूति और २. एकपाद्विभूति। त्रिपाद्विभूति को ‘नित्यविभूति’ कहते है और एकपाद्विभूति को ‘लीलाविभूति’ कहते हैं। इस एकपाद्विभूति में भगवान् विष्णु जगत् के उदय, विभव और लय की लीला किया करते है। आत्माराम, आप्तकाम परमात्मा का प्रकृति के साथ यह विहार चिरन्तन है, अनादि तथा अनन्त भी है। इस विहारस्थली के देश-काल का ज्ञान मानव मनीषा में नहीं समाता। मनुष्य यह जान नहीं सकता कि भगवान् जिस प्रकृति-नटी के साथ अपना महारास कर रहे हैं उसका परिमाण केवल इतना है। वस्तुतः प्रकृति के असंख्य ब्रह्माण्ड भाण्डों को अहर्निश बनाने बिगाडने के अनवरत कार्य को समग्ररूप में जानने की शक्ति किसी व्यक्ति के मस्तिष्क में नहीं है। यह जानना भी कठिन है कि प्रकृति के साथ भगवान् का यह विहार कब प्रारम्भ हुआ और कब तब चलेगा। इस जगत् की तीन अवस्थाएँ हैं—सृष्टि, स्थिति और प्रलय। जड प्रकृति में परमात्मा के ईक्षण से—संकल्प से कभी तो विकासोन्मुख परिणाम हुआ करता है, जिसे ‘सृष्टि’ कहते हैं और कभी विनाशोन्मुख, जिसे ‘प्रलय’ कहते हैं। सृष्टि और प्रलय के मध्य की दशा का नाम ‘स्थिति’ है। जब परमात्मा जगत् की रचना करते हैं, तब वे ‘प्रद्युम्न’ होते हैं और जब पालन करते हैं तब ‘अनिरुद्ध’ और जब संहार करते है तब ‘सङ्कर्षण’ कहलाते हैं—इन रूपों की संज्ञा ‘व्यूह’ है। **सङ्कर्षण—**भगवान् विष्णु में यद्यपि अनन्त कल्याण गुण हैं तथापि उनमें छह मुख्य हैं। उन्हीं छह गुणों में से जब वे ‘ज्ञान’ और ‘बल’ का प्रकाशन करते हैं, तब उनका नाम ‘सङ्कर्षण’ होता है। सङ्कर्षण मे अन्य चार गुणों अर्थात् वीर्य, ऐश्वर्य, शक्ति और तेज का निगूहन होता है, अभाव नहीं। सङ्कर्षण का वर्ण पद्मराग के समान है। ये नीलाम्बरधारी हैं। ये अपने चार कर कमलों में क्रमशः हल, मूसल, गदा और अभयमुद्रा धारण करते हैं। ताल इनकी ध्वजा का लक्षण है। ये जीव के अधिष्ठाता होकर भी ‘ज्ञान’ गुण से शास्त्र का प्रवर्तन करते हैं और ‘बल’ नामक गुण से जगत् का संहार करते हैं।