भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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नवमः परिच्छेदः २०१ एवं प्रणवस्य नित्योदित्वात् सर्वमन्त्राणामप्याधारत्वेनादौ निवेशनम्, तदुपरि तद्विवृत्तस्य बीजस्य न्यासम्, प्रत्यहमाराधनकाले बीजात् तत्परिणामाकारेण संज्ञापद- मन्त्रयोरन्यतरस्योत्थानम्, समाप्ते यजने पुनस्तत्रैव लयं चाह—अविनाशीति त्रिभिः । बीजस्य क्षेत्रज्ञरूपत्वात् तदुपरि स्थितानां वर्णानां क्षेत्ररूपत्वाच्च मूर्त्युत्थानमुक्तम् । विप्रलयं स्मरेदित्यनेन मूर्तिरूपस्य मन्त्रस्य बीजे उपसंहारः, बीजस्य तत्कारणे प्रणवे चोपसंहारो बोध्यः । तथा च जयाख्ये— भोगस्थानगता मन्त्राः पूजिता ये यथाक्रमम् ॥ मुख्यमन्त्रशरीरं तु सम्प्रविष्टांश्च संस्मरेत् । ज्वाला ज्वालान्तरे यद्वत् समुद्रस्येव निम्नगाः ॥ तं मन्त्रविग्रहं स्थूलं सर्वमन्त्रास्पदं द्विज । प्रविष्टं भावयेत् सूक्ष्मे बुद्धयक्षे ह्युभयात्मके ॥ परे प्रागुक्तरूपे तु तं सूक्ष्ममुभयात्मकम् । तं परं प्रस्फुरद्रूपं निराधारपदाश्रितम् ॥ सन्धिमार्गेण हृत्पद्मे सम्प्रविष्टं तु भावयेत् । (१५।२३३-२३७) इति ॥ २४-२६ ॥ वह ॐकार अविनाशी है और बीजों को महान् समृद्धि देने वाला है । अतः साधक सर्वप्रथम सत्य नामक प्रणव से आसन प्रदान करे ॥ २४ ॥ इस प्रकार प्रणव के नित्योदित होने के कारण तथा सभी मन्त्रों का आधार होने के कारण पहले प्रणव का आसन सन्निविष्ट करे । उसके बाद उसके विवर्त्तभूत बीज मन्त्र को आसन देवे । प्रतिदिन आराधन काल में बीज से उसके परिणाम स्वरूप संज्ञामन्त्र, अथवा पदमन्त्र में किसी एक का उत्थान करे । फिर यजन समाप्त होने पर उसी में लय करे । इसलिये वह अविनाशी है । याग का अवसर प्राप्त होने पर पुनः उसकी समाप्ति हो जाने पर मन्त्र उस ॐकार में इस प्रकार सन्निहित हो जाते हैं, जैसे तप्त पत्थर पर जल डालने से जल उसमें लीन हो जाते हैं ॥ २५-२६ ॥ भानुप्रसरसंकोचतुल्यमेतद् महामते । क्रियावशात्तु किन्वत्र भेदमात्रोपलक्षणम् ॥ २७ ॥ (पृथिवीभिन्नस्य?) संज्ञापदमन्त्रयोरन्यतरस्य पूजाकाले बीजात् प्रसरणं तत्समाप्तौ तत्र संकोचश्च कथमुपपद्यत इति शङ्कां किरणसादृश्येन परिहरति— भानुप्रसरेति ॥ २७ ॥ संज्ञा एवं पदमन्त्र में से कोई एक पूजाकाल में कैसे बीज से फैल जाते हैं और कैसे संकुचित हो जाते हैं? इसे किरणों के सादृश्य से कहते हैं—जिस प्रकार सूर्य की किरणें सूर्य से ही विकसित हो कर उसी में लीन हो जाती हैं । यह भेद मात्र उपलक्षण है जो क्रियावश किया जाता है ॥ २७ ॥ सा० सं० - 17