सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ सात्वतसंहिता प्रकरण में कहे गए प्रथम अनन्त की हृदय कमल कर्णिका के मध्य में निराकार का ध्यान करे और अर्चन करे । फिर वहाँ से उठ कर हृदय कमल से नीचे आधारभूत साकार का ध्यान करे और अर्चना करे । फिर हृदय कमलदलाग्र में उनकी अर्चना करे । कर्णिका के मध्य में शक्त्यात्मा के सर स्थान में मधुसूदन, दलाष्टक में विद्यादिदेवाष्टक की अर्चना करे । नादावसान गगन में साकार, निराकार एवं एकार्णवशायी विष्णु का ध्यान कर अर्चन करे । फिर लक्ष्म्यादिशक्ति, किरीटादि, भूषण, चक्रादि लाञ्छन, कालादिभवोपकरण देवता की कमल से बाहर अर्चना करे । कूर्मादिद्वादशार्चन के प्रकरण में कहे गए अनन्त के स्थान में कूर्म, शक्त्यात्म स्थान में वराह, मधुसूदन स्थान में नृसिंह, विद्यादि देवताष्टक स्थान में श्रीपत्यादि अष्टक, एकार्णवशायी स्थान में न्यग्रोधशायी की अर्चना करे । मीनादिद्वादशार्चन प्रकरण में कहे गए कूर्म स्थान में मीन, वराह स्थान में वामन, नरसिंह स्थान में त्रिविक्रम, श्रीपत्याद्यष्टक स्थान में नराद्यष्टक और न्यग्रोधशायि स्थान में पातालशायी की अर्चना करे । इस प्रकार न्यास करने का विधान है ॥ ११४-११८ ॥ मूर्त्तौ मण्डलमध्ये च बहिरग्नौ जलाशये ॥ ११९ ॥ स्वमन्त्रेणाम्बरस्थस्य मूर्तं स्रक्चन्दनादिकम् । दातव्यं कर्णिकामध्ये न्यस्तमन्त्रस्य मूर्धनि ॥ १२० ॥ प्रतिबिम्बति तद् यस्मात् तद् ब्रह्मद्वारदर्पणे । एवं मानसार्चनमुक्त्वा बिम्बादिबाह्यार्चनेऽप्येवमेव देवतान्यासक्रमः । किन्तु गगनस्थमूर्तेरर्चनार्थं पुष्पचन्दनादिकं कर्णिकामध्यस्थितमूर्तेर्मूर्द्धन्येव समर्पयेत् । यतः कर्णिकामध्यस्थितमूर्तिर्ब्रह्मरन्ध्रदर्पणे गगनस्थमूर्तिः प्रतिबिम्बतीत्याह—मूर्त्ताविति द्वाभ्याम् । मूर्त्तौ बिम्बे मण्डलमध्ये वक्ष्यमाणमण्डले, अग्नौ प्रतिष्ठितेऽग्नौ, जलाशये तीर्थमध्य इत्यर्थः । मानसिकत्वनिवृत्त्यर्थं मूर्तमिति स्रक्चन्दनादिकस्य विशेषणमुक्तम् । मूर्तं = बाह्येन्द्रियविषयमित्यर्थः ॥ ११९-१२१ ॥ मानसार्चन करने के बाद बिम्बादि बाह्य अर्चन में भी इसी प्रकार देवता न्यास का क्रम है—मानस पूजा के पश्चात् मूर्त्ति में, मण्डलमध्य में, बाहर अग्नि में, अथवा जलाशय में उन-उन के अपने मन्त्र से अम्बरस्थ मूर्त्ति के लिये स्रक, चन्दनादि कर्णिका के मध्य में स्थापित मूर्त्ति के शिर पर समर्पित करे । क्योंकि गगनस्थ मूर्त्ति नीचे वाले ब्रह्मद्वार दर्पण में प्रतिबिम्बित होती रहती है ॥ ११९-१२१ ॥ यस्य यस्य यदा यस्मिन्नाकारे रमते मनः ॥ १२१ ॥ भोगाप्तये वा मोक्षार्थं तं तं मध्येऽर्चयेत् तदा । तदुद्देशेऽर्चनं कुर्यात् तत्स्थानप्रच्युतस्य वा ॥ १२२ ॥ नानासिद्धिप्रदानाच्च सह संहारमूर्तिना । यस्य साधकस्य यस्मिन् भगवदवतारे विशेषेणाभिरुचिः, तेन स एव भगवान्