भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 837 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 292

दशमः परिच्छेदः २३३ पातालशयनान्त छत्तीस देवताओं का, उसके बाहर ईशान से लेकर वायव्यन्त चारों कोनो में किरीट, श्रीवत्स, कौस्तुभ एवं वनमाला का, पीठ के उत्तर दिशा में लक्ष्मी का, दक्षिण दिशा में पुष्टि का, पश्चिम दिशा में दया का, पूर्व दिशा में निद्रा का, ईशानकोण में क्षमा एवं शान्ति का, आग्नेयकोण में सरस्वती एवं धृति का, नैर्ऋत्यकोण में मैत्री एवं रति का, वायव्यकोण में तुष्टि तथा मति का, उसके बाहर पीठ के समीप आगे गरुड़ का तथा पीठ के बाहर ईशान से लेकर वायव्य कोणान्त चारों कोनो में क्रमशः चक्र, शङ्ख, गदा एवं पद्म का, उत्तर दिशा में पाश का, दक्षिण दिशा में अङ्कुश का, पश्चिम दिशा में मुद्गर का, पूर्व दिशा में वज्र का, कोण चतुष्टय में शक्ति का, ईशान कोण समीपस्थ पद से लेकर उसके समीपस्थ द्वितीय पद पर्यन्त अर्ध शोभा एवं पूर्ण शोभा स्थित नीलोत्पल का, रक्तोत्पल नामक षोडश पदों में, फिर प्रदक्षिणा क्रम से कालादि यज्ञान्त भवोपकरण षोडश देवता का, ईशानकोण में विद्या का, नैर्ऋत्यकोण में अविद्या का, अग्निकोण में अग्नि का, वायुकोण में जल का, पूर्व द्वार में वसुधा का, मण्डल से बाहर कोणों में प्रकृति का, उसके बाहर पूर्वादि दिशाओं का विदिशाओं (कोणों) में ऊपर नीचे उपेन्द्रादि दश सिद्धों का और उसके बाहर सभी दिशाओं में उन चक्रराज का न्यास करे जो अपने तेज समूहों से समस्त जगत् को भासित करते हैं ॥ १९-२९ ॥ न्यस्यैवमर्चनं कुर्यान्मन्त्रमुद्रान्वितेन च। निरीक्षणादिशुद्धेन अर्घ्यस्रक्चन्दनादिना ॥ ३० ॥ यथाक्रमेणोदितानामादिदेवं यजेत् ततः। उपरिष्टात् तु सर्वेषां स्वपदस्थं तु पूर्ववत् ॥ ३१ ॥ एवं मण्डलदेवतान्यासानन्तरं तेषां यथाक्रममर्चनम्, मध्ये उपरिष्टात् पद्मनाभार्चनं च कार्यमित्याह—न्यस्येति द्वाभ्याम् । निरीक्षणादिशुद्धेनेत्यत्रादिशब्देन दहनाप्याय- नादिकं संगृह्यते ॥ ३०-३१ ॥ इस प्रकार मण्डल देवताओं का न्यास करने के बाद यथाक्रम मन्त्र एवं मुद्रादि द्वारा निरीक्षण, दहन और आप्यायन से शुद्ध कर अर्घ्य, माला एवं चन्दनादि द्वारा उनका अर्चन करे । मध्य में ऊपर पद्मनाभ का पूर्व के समान अर्चन करे ॥ ३०-३१ ॥ प्राग्वत् सुसंस्कृते कुण्डे ततः संस्कृत्य पावकम् । तन्मध्ये सर्वमन्त्राणां न्यासं कुर्याच्च यागवत् ॥ ३२ ॥ प्राक् समित्सप्तकेनैवं तर्पयेद् वै यथाक्रमम् । मन्त्रपूतं हि निश्शेषं हवनान्तं सकृत् सकृत् ॥ ३३ ॥ भवन्ति सम्मुखा मन्त्राः साधकस्याग्निमध्यगाः । सा० सं० - 19