भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 837 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 304

एकादशः परिच्छेदः २४५ उसका प्रकार कहते हैं—किसी एक भाग में मध्य सूत्र के दाहिनी ओर दो भागों में बिना व्यवधान के जो दो सूत्र स्थापित हैं, उनके अन्तराल का जितना प्रमाण है उतने अन्तराल के समान दल के आगे वाले मध्य सूत्र में चिह्न बनावे । फिर उस लाञ्छन के भीतर वाले सूत्र से दल के अग्रभाग से आरम्भ कर बायीं एवं दाहिनी दोनों ओर अर्धचन्द्राकार दो रेखा बनावे । फिर अनास्थ सूत्र को उस रेखा से मिला कर वहाँ से शृङ्ग सन्निधान से बाहर पत्र के आगे तक ले जावे। फिर दलाग्र से ब्रह्म देश तक का जितना प्रमाण है, उसके चतुर्थांश से मध्य देश से कर्णिका के लिये, मण्डल घुमाकर, उसके दूने मान से केसर के लिये वृत्त (गोला) घुमाकर दल के अग्रांश के मध्य में गोला (= व्योम) के लिये एक मण्डल घुमावे । इतना करने के पश्चात् उसमें उज्ज्वल एवं पवित्र रङ्ग भर देवे ॥ २१-२६ ॥ उच्चाग्रविततां पीतां सबीजां विद्धि कर्णिकाम् । रेखान्वितानि पत्राणि सर्वाणि सुसितानि च ॥ २७ ॥ केसरत्रितयं कुर्यात् पत्रे पत्रेऽरुणप्रभम् । दलान्तरालमसितं वृत्तबाह्यं ज्वलत्प्रभम् ॥ २८ ॥ सितानि पीठकोणानि रक्तं तद्दिक्‌चतुष्टयम् । राजोपलप्रभां वीथीं पत्रमालाद्यलङ्कृताम् ॥ २९ ॥ पश्चिमांशाद् विना सर्वद्वाराण्यम्बुजपत्रवत् । कृष्णानि सर्वशोभानि द्वारोद्देशस्थितानि च ॥ ३० ॥ तदर्धाकृतितुल्यानि तूपशोभानि गर्भवत् । कोणानि केसराभानि सितशङ्खान्वितानि च ॥ ३१ ॥ शोणहेमादिवर्णं च क्रमाद् रेखागणं बहिः । तत्प्रकारः—कर्णिकां पीतवर्णेन, पीठदिक्‌चतुष्टयं र(ले?क्ते)न, तत्कोणचतुष्कं श्वेतेन, प्रदक्षिणविधिं कृष्णवर्णेनापूर्य, वीथ्यां नानावर्णैः पत्रमालादींश्च विलिख्य, पश्चिमांशं विना सर्वद्वारा(णि) अपि मध्यस्थितकमलदलवत् श्वेतेन, पूर्णशोभा- चतुष्टयमपि कृष्णवर्णेन, अर्धशोभाष्टकं कमलगर्भवत् पीतेन, कोणानि केसरवद् रक्तेन चापूर्य, कोणेषु श्वेतरेखाभिः शङ्खांश्च विलिख्य, रक्तपीतश्वेतवर्णैः क्रमेण रेखात्रयं पूरयेत् । एवं मण्डललेखनप्रकारः ॥ २७-३२ ॥ रंग भरने का प्रकार कहते हैं—ऊपर को उठी हुई कर्णिका पीत वर्ण से रंगे और पीठ की चारों ओर की दिशायें लाल वर्ण से, उसके चारों कोण श्वेत रङ्ग से और प्रदक्षिणा विधि काले वर्ण से पूर्ण करे । वीथी में अनेक वर्ण के पत्र माला आदि का निर्माण करे । पश्चिम दिशा को छोड़कर सभी द्वारों को, मध्य में स्थित कमल दल के समान श्वेत रंग से, पूर्ण शोभा चतुष्टय को कृष्ण वर्ण से, अर्ध शोभाष्टक को कमल गर्भ के समान पीत वर्ण से तथा कोणों को केसर के समान

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक) · पृष्ठ 304, कुल 837 में से · BharatKosha