भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 305

२४६ सात्वतसंहिता रक्त वर्ण से पूर्ण कर कोणों पर श्वेत रेखा से शङ्ख बना कर रक्त, पीत एवं श्वेत वर्णों से क्रमशः तीन रेखाओं को पूर्ण करे । यहाँ तक मण्डल लेखन का प्रकार कहा गया ॥ २७-३२ ॥ कृत्वैवमनुसन्धाय सर्वात्मत्वेन देहवत् ॥ ३२ ॥ रजांसि विद्धि भूतानि सितपीतादिकानि च । तन्मात्राण्युपशोभानि शोभानि करणानि तु ॥ ३३ ॥ एवं सर्वाणि कोणानि सद्द्वाराणीन्द्रियाणि च । बहिरावरणं यद्वै सत्त्वाद्यं त्रितयं हि यत् ॥ ३४ ॥ मनः सुवितता वीथी गर्वः पीठमुदाहृतम् । धीः पद्मं तदधिष्ठाता बीजात्मा चिन्मयः पुमान् ॥ ३५ ॥ एतन्मण्डलस्य भगवच्छरीरतयाऽत्रापि प्रसिद्धदेहवद् भूततन्मात्राणि दर्शयति— कृत्वैवमित्यादिभिः ॥ ३२-३५ ॥ यतः यह मण्डल भगवान् का शरीर है इसलिये प्रसिद्ध देह के समान इसमें भी भूत और तन्मात्रायें है । इसे कह रहे हैं—रजादिकों को पञ्चभूत समझे और सित पीतादि वर्णों को तन्मात्रा समझे तथा उपशोभाओं को शोभा और करण समझे । इसी प्रकार सभी कोणों को द्वार सहित इन्द्रियाँ समझे, जो बाहर के आवरण हैं । वही सत्त्वादि त्रितय हैं, मन विस्तृत वीथी है, पीठ गर्व है, पद्म धी (= बुद्धि) है और उसका अधिष्ठाता पुमान् चिन्मय बीजात्मा है ॥ ३२-३५ ॥ अमूर्त ईश्वरश्चात्र तिष्ठत्यानन्दलक्षणः । यस्य सन्दर्शनादेव शश्वद्भावः प्रसीदति ॥ ३६ ॥ ससङ्गानामसङ्गानां वपुष्पाते कृते सति । प्रायशो मुक्तिभाजां च त्विह जन्मैकशेषिणाम् ॥ ३७ ॥ देव आस्ते ज्ञतां हित्वा बहिरन्तश्च कर्मिणाम् । अन्यथा दृष्टमात्राद् वै कथमाह्लादमेति वै ॥ ३८ ॥ अन्तः संवेदनसमम् अस्तित्वप्रतिपादकम् । यद्यत् स्वलक्षणं तत्त्वं तत्तत् सर्वत्र सिद्धिगम् ॥ ३९ ॥ मण्डले भगवदवस्थानं सहेतुकमाह—अमूर्त इत्यादिभिः ॥ ३६-३९ ॥ इस प्रकार आनन्द लक्षण ईश्वर बिना मूर्त्ति के इस मण्डल में स्थित है । जो सहेतुक है इसके दर्शन मात्र से शाश्वत भाव प्रसन्न हो जाता है । सङ्ग युक्तों के एवं सङ्ग रहितों के, प्रायः मुक्तिभाजों के, अथवा एक जन्म मात्र शेष लोगों के कर्म कर्त्ताओं के शरीर पात कर देने पर भी इसमें बाहर और भीतर ज्ञान को