सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः परिच्छेदः २४९ इसके बाद, पुनः मध्य से द्वितीय ऊपर में रहने वाला जो मर्म उन तीनों के अन्तर में रहने वाला चतुर्थ दक्षिण पार्श्वस्थ तथा वामपार्श्वस्थ जो मर्म उसमें रहने वाले सूत्र से पूर्ववत् दक्षिण कोष्ठ द्वय तथा वाम कोष्ठद्वय में अर्ध चन्द्राकार दो लाञ्छन तिरछी ओर लिखे । ऐसा करने से पूर्वोक्त द्वादशक के नीचे दोनों पङ्क्ति में रहने वाला भाग द्वादशक एक हो जायेगा । इसके बाद पश्चिम दिशा में मध्य से छठे मर्म को दो सूत्र फैलाकर पूर्वोक्त दक्षिणोत्तर भागस्थ अर्ध चन्द्राकार दोनों लाञ्छनों को शृङ्ग के आगे रहने वाले दोनों किनारों से मिला देवे । ऐसा करने से उस अग्निकुण्ड की शङ्खकुण्ड की आकारता सिद्ध हो जायेगी ॥ ४८-५० ॥ तस्य भागसमा कार्या लाञ्छनैर्मेखला बहिः । पूर्वोक्तमर्मगैः सूत्रैर्यथा तदवधारय ॥ ५१ ॥ द्व्यंशदीर्घेण सूत्रेण नवचन्द्रकलासमम् । चतुर्णामन्तरेशानां प्राग्दिक् कुर्याच्च लाञ्छनम् ॥ ५२ ॥ ईशवह्निपदाभ्यां तु वृत्ततुर्यांशसम्मिते । द्वे लाञ्छने समे कुर्यादेकभागाधिके ततः ॥ ५३ ॥ तत्समे ह्यपरे द्वे वै यत्तदा लाञ्छ्य लाञ्छनैः । दक्षिणोत्तरभागाभ्यां पश्चात् सूत्रद्वयं क्षिपेत् ॥ ५४ ॥ कृत्वा सप्तममर्मस्थं पूर्वोद्दिष्टक्रमेण तु । जीवसूत्रस्य पाश्चात्ये भागे पार्श्वद्वये स्थितम् ॥ ५५ ॥ तत्खातस्य बहिः शङ्खाकारमेखलानिर्माणप्रकारमाह—तस्य भागसमेत्यारभ्य पूर्वोद्दिष्टक्रमेण त्वित्यन्तम् ॥ ५१-५५ ॥ एवं खातार्थं परितो लाञ्छनं कृत्वा तद्बहिस्तथैव शङ्खाकारैकभागमिति मेखलासिद्ध्यर्थं प्राग्दिशि कोष्ठद्वयदीर्घेण सूत्रेण कोष्ठचतुष्टयेऽर्धचन्द्राकारं लाञ्छनं कृत्वा तथैवेशान्यकोण आग्नेयकोणे च कोष्ठपञ्चके लाञ्छनद्वयं कृत्वा तदधः पार्श्व- द्वयेऽपि कोष्ठचतुष्टये पूर्ववद् द्वे लाञ्छने विलिख्य पूर्वोक्तरीत्या पश्चिमभागस्थ- सप्तममर्मणः सूत्रद्वयं प्रसार्य पूर्वोक्तलाञ्छनद्वययोः शृङ्गाग्राभ्यां सह योजयेत् । एवं कृते मेखलारूपं सिद्ध्यति ॥ ५१-५५ ॥ इसी प्रकार खात के लिये भी चारों ओर लाञ्छन निर्माण करे । उसके बाहर शङ्खाकार के एक भाग की मेखला सिद्धि के लिये, पूर्व दिशा में दो कोष्ठक के समान दीर्घ सूत्र से चार कोष्ठों में अर्ध चन्द्राकार लाञ्छन बना कर, उसी प्रकार ईशानकोण, आग्नेयकोण में और पञ्चकोष्ठक में दो लाञ्छन बनाकर, उसके नीचे दोनों पार्श्व में स्थित कोष्ठ चतुष्टक में पूर्ववत् दो लाञ्छन लिख कर, पूर्वोक्त रीति से पश्चिम भाग के सातवें मर्म का दोनों सूत्र फैलाकर पूर्वोक्त दोनों लाञ्छन के शृङ्ग के अग्रभाग से एक में मिला देवे । ऐसा करने से मेखला का रूप सिद्ध हो जायेगा ॥ ५१-५५ ॥ सा० सं० - 20