भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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एकादशः परिच्छेदः २५१ भागं विसृज्य शेषं सर्वमपि खातभागविस्तारसमं तत्र्यंशमर्धं वा निखनेत् । पूर्वोक्त- योनिदैर्घ्यात् सपादकोष्ठद्वयमिता पृष्ठतो गजोष्ठसदृशी पूर्वोक्तमोष्ठं स्पृशन्ती सती (= मेखला) कर्तव्या ॥ ५८-६० ॥ योनिकुण्ड पुनः उस योनि के भीतर मध्य सूत्र के और दक्षिण कोष्ठ में भी कोष्ठक के आधे प्रमाण वाले सूत्र से पूर्ववत् अर्ध चन्द्राकार दो लाञ्छन बना कर पूर्ववत् उनके दोनों शृङ्ग से दो सूत्र प्रसारित करे । इसके बाद खात के चारों ओर ओष्ठ की सिद्धि के लिये, खात के भीतर चारों ओर एक कोष्ठ को चार भागों में विभक्त करे । उसमें एक भाग को छोड़कर शेष सभी खातभाग के विस्तार के समान उसका तीसरा अंश अथवा आधा अंश खने । पूर्वोक्त योनि के विस्तार से लेकर सवा दो कोष्ठ पर्यन्त पीछे की ओर हाथी के ओठ के समान पूर्वोक्त ओष्ठ का स्पर्श करते हुए मेखला निर्माण करे ॥ ५८-६० ॥ पुरोभागचतुर्थांशं योनेरग्राद् विसृज्य तु । दद्यात् प्राक्सूत्रसम्बन्धं सूत्राणां द्वितयं परम् ॥ ६१ ॥ पूर्वोक्तलाञ्छनानुसारेण खातार्थमेकं तद्बहिरोष्ठार्थमेकं तद्बहिर्मेखलार्थमेक- मिति सूत्रत्रयं दद्यादित्याह—पुरोभागेति ॥ ६१ ॥ इस प्रकार से चारों ओर योनि के अग्रभाग में पूर्वोक्त रीति से कोष्ठ का चतुर्थांश त्याग कर खात के लिये, शङ्खाकार सूत्र पूर्व की भाँति लगाकर उसके बाद ओष्ठ निर्माण के लिये एक सूत्र और मेखला के निर्माण के लिये एक सूत्र देवे ॥ ६१ ॥ अनुपातेन वै ताभ्यामग्रात् सङ्कोचमाचरेत् । भागपङ्क्तित्रयेणैव मेखलात्रितयं बहिः ॥ ६२ ॥ सम्पाद्यं चतुरश्रं तु शङ्खं तत्रितयोपरि । आशङ्खं मेखलानां तु प्रोन्नतत्वं स्वविस्तृतेः ॥ ६३ ॥ ओष्ठाद्यङ्गानां क्रमेण संकोचमाह—अनुपातेनेति । एवमुक्तं पारमेश्वरेऽपि— “मेखलावधिपर्यन्तं नीचान्यङ्गानि मीलयेत्” (२६।२३) इति । मेखलात्रयनिर्माणमाह—भागपङ्क्तित्रयेणेति सार्धेन ॥ ६२-६३ ॥ एवं च खातप्रदेशे परितो योन्यग्रे पूर्वोक्तरीत्या कोष्ठचतुर्थांशं विसृज्य खातार्थं शङ्खाकारं सूत्रं पूर्ववद् दत्वा तदनन्तरमोष्ठार्थमेकं सूत्रं मेखलार्थमेकं सूत्रं च दद्यात् । ऊर्ध्वे ओष्ठं तदधो मेखला यथा स्यात् तथा तत्सूत्रयोः पातं संकुचितं कुर्यात् तद्बहिः परितः पङ्क्तित्रयेण चतुरश्रं मेखलात्रयं कुर्यात् । शङ्खान्तानां मेखलानामौन्नत्यं तु कुण्डविस्तारसमं कुर्यात् ॥ इति शङ्खकुण्डलक्षणम् ॥ ६२-६३ ॥